कोरोना से निवेशकों में दहशत, 10 लाख करोड़ गंवाए

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- Author, दिनेश उप्रेती
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
कोरोना वायरस का कहर भारतीय शेयर बाज़ार पर भी जारी है. सोमवार को भारत के शेयर बाज़ार में भारी गिरावट देखने को मिली.
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक सेंसेक्स 3,934.72 अंकों की गिरावट के साथ 25,981.24 पर और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक निफ़्टी 1,135.20 अंकों की गिरावट के साथ 7,610.25 पर बंद हुआ.
कोराना वायरस न फैले, इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारें लॉकडाउन समेत कई कोशिशें कर रही हैं.
कई कंपनियों ने भी उत्पादन बंद कर दिया है या बंद करने की तरफ बढ़ रही हैं.
नतीजा शेयर बाज़ार में शेयर ताश के पत्तों की तरह गिर रहे हैं.
सोमवार के दिन बाज़ार में इस कदर हाहाकार मचा रहा कि सोमवार को 10 फ़ीसदी का लोअर सर्किट लगने के बाद कारोबार 45 मिनट के लिए रोक दिया गया.
9 बजकर 58 मिनट पर बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज ने कारोबार रोकने की घोषणा की.

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बाज़ार खुलने के एक घंटे के भीतर ही निवेशकों को तक़रीबन 10 लाख करोड़ रुपए की चपत लग चुकी थी.
रुका कारोबार
मार्च के महीने में ये दूसरा मौक़ा है जब लोअर सर्किट के कारण बाज़ार में कारोबार रोकना पड़ा है.
इससे पहले कोरोना ने 13 मार्च 2020 को भी डराया था और 10 फ़ीसदी गिरावट के बाद बाज़ार में कारोबार रोकना पड़ा था.
भारतीय शेयर बाज़ार के इतिहास में ये पहली बार है जब एक ही महीने में दो लोअर सर्किट लगे हैं और इस कारण कारोबार रोकना पड़ा है.
इससे पहले, हर्षद मेहता घोटाला सामने आने पर 28 अप्रैल 1992 को बाज़ार में निचला सर्किट लगा था.
- 17 मई 2004 को चुनावी अनिश्चितताओं के कारण बाज़ार में लोअर सर्किट लगा.
- 17 अक्टूबर 2007 को पी-नोट्स इश्यू के चलते बाज़ार में लोअर सर्किट लगा था.
- 22 जनवरी 2008 को सबप्राइप संकट के दौर में बाज़ार में निचला सर्किट लगा था.
इस गिरावट में वैसे तो उंगलियों पर गिने जाने वाले शेयर ही खुद को संभाल पा रहे हैं, लेकिन सबसे बुरा हाल बैंकिंग शेयरों का है.

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क्या निजी बैंक और क्या सरकारी बैंक, दोनों ही लगातार और बुरी तरह पिट रहे हैं. इंडेक्स में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले रिलायंस इंडस्ट्रीज़, इंफोसिस और टाटा कंसल्टेंसी के शेयरों में भी भारी बिकवाली आई.
पिछले एक महीने के दौरान अधिकतर बैंकिंग शेयर 50 फ़ीसदी गिर चुके हैं और आधे भाव पर भी निवेशक इन्हें ख़रीदने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं.
दिल्ली स्थित एक ब्रोकरेज फ़र्म में रिसर्च एनालिस्ट आसिफ़ इक़बाल का मानना है कि कोरोना वायरस महामारी में भारत बेहद मुश्किल और नाज़ुक दौर में है.
आसिफ़ इकबाल कहते हैं, "भारत में कोरोना से हालात चीन या इटली की तरह हो सकते हैं. दुनियाभर के शेयर बाज़ारों पर इसका असर दिख रहा है और भारत भी इससे नहीं बच सकता. अब तो कोरोना वायरस के संक्रमण पर नियंत्रण और इसके मामलों में कमी ही दलाल स्ट्रीट को बचा सकती है."

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कोरोना संकट से उपजे वैश्विक कारणों के अलावा सरकारों ने इसका फैलाव रोकने के लिए जो क़दम उठाए हैं, अब उनका असर बाज़ार पर दिख रहा है.
दिल्ली, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पंजाब, उत्तराखंड, झारखंड, बिहार, जम्मू-कश्मीर और चंडीगढ़ समेत कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने 31 मार्च तक लॉकडाउन घोषित कर दिया है.
मारुति सुज़ुकी इंडिया और महिंद्र एंड महिंद्रा ने उत्पादन गतिविधियां रोक दी हैं. इलेक्ट्रॉनिक कंपनी एलजी समेत कई दूसरी कंपनियों ने उत्पादन में कटौती की है.
शेयर बाज़ार के जानकार विवेक मित्तल का मानना है कि ये हाहाकार अभी थमने वाला नहीं है.
विवेक कहते हैं, "परेशानी ये है कि ये गिरावट घरेलू वजहों से नहीं है. यानी इसके लिए मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों को सीधे-सीधे दोष नहीं दिया जा सकता. कोरोना की दहशत दुनिया के तकरीबन 190 देशों में पहुँच चुकी है. कोरिया, जापान, भारत, चीन समेत एशियाई बाज़ार तो मंदड़ियों के शिकंजे में हैं ही, अमरीकी वॉल स्ट्रीट और यूरोपीय बाज़ारों में भी क़त्लेआम चल रहा है."

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क्या कुछ रास्ता भी है
जब डॉलर के मुक़ाबले रुपया लगातार गिर रहा है और ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँच चुका है, मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां रुकी हुई हैं, कोरोना को लेकर अनिश्चितता का माहौल है और विदेशी संस्थागत निवेशक लगातार बिकवाली कर रहे हैं, तो शेयर बाज़ारों पर असर तो दिखेगा ही.
बाज़ार नियामक संस्था सेबी ने वायदा बाज़ार के लिए कुछ नई शर्तें जोड़ी हैं. कई शेयरों में वायदा कारोबार पर रोक लगा दी गई है ताकि बाज़ार में भारी उतार-चढ़ाव को रोका जा सके. हालाँकि इसका तात्कालिक असर अभी दिखता नज़र नहीं आ रहा है.
वैसे कहा जाता है कि जो भी ऊँची ख़तरनाक लहरों में तैरने का माद्दा रखता है, वो ही शेयर बाज़ार में विजेता बनता है, लेकिन अभी जो हालात हैं, उसमें बहुत कम ऐसे होंगे जो ये हिम्मत दिखा सकें.
विवेक मित्तल कहते हैं, "इसका अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है कि शेयर बाज़ार में और कितनी उथल-पुथल बाकी है. ऐसे माहौल में निवेशकों का रुझान व्यावहारिक की बजाय भावनात्मक हो जाता है."

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