कोरोना से कैसे लड़ रहे हैं महानगरों से दूर दराज़ वाले शहर -बीबीसी विशेष

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    • Author, प्रियंका दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत में कोरोनावायरस के मामले

17656

कुल मामले

2842

जो स्वस्थ हुए

559

मौतें

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

कोविड-19 की मामलों की टेस्टिंग के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तक़रीबन 5 करोड़ जनसंख्या की एकमात्र उम्मीद के तौर पर उभरे अलीगढ़ के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज (जेएनएमसी) की वर्तमान स्थिति भारत की कोरोना के ख़िलाफ़ जंग की एक चौंकाने वाली और भयावह तस्वीर पेश करती है.

बीते महीने दिल्ली समेत देश के तमाम महानगरों से प्रवासी मज़दूरों की हुई वापसी के बाद कोरना वायरस का प्रकोप ग्रामीण भारत तक फैलने का ख़तरा लगतार बना हुआ है.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के परिसर में संचालित जेएनएमसी, उत्तर प्रदेश में कोविड-19 के मामलों की जांच के लिए सरकार द्वारा घोषित किए गए 8 अस्पतालों में से एक है.

ऐसे में दिल्ली-बम्बई के आगे कोविड-19 की जांच और इलाज के प्रमुख केंद्र के तौर पर उभर रहे जेएनएमसी जैसे केंद्रो पर साफ़ तौर पे भारत के टू और थ्री टीयर शहरों में कोरोना के प्रसार को रोकने की बड़ी ज़िम्मेदारी भी आ पड़ी है.

लेकिन कोरोना जांच के लिए ज़रूरी टेस्टिंग किट से लेकर पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विप्मेंट (पी.पी.ई) तक के लिए संघर्ष कर रहे यहां के डॉक्टरों के लिए कोरना के ख़िलाफ़ लड़ाई का रास्ता आसान नहीं हैं.

हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन यह दावा कर रहा है कि स्वास्थ्यकर्मियों को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराया जा रहा है. विश्वविद्यालय के अधिकारियों के मुताबिक नए वेंटिलेटर मंगाए गए हैं, एन-95 मास्क मंगाया जा रहा है और हाईड्रोक्सलीक्लोरोक्वीन दवा भी उपलब्ध है.

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इमेज कैप्शन, अहमदाबाद के एक रिहायशी इलाक़े में जांच के लिए नमूने लेता स्वास्थ्यकर्मी

80 से ज़्यादा मामले पॉज़िटिव

आगरा, बुलंदशहर, कासगंज, रामपुर, मुरादाबाद, हाथरस, संभल, एटा, नोएडा और अलीगढ़ समेत तक़रीबन पाँच करोड़ की जनसंख्या को मुफ़्त कोविड टेस्टिंग की सुविधा उपलब्ध करवाने वाले जेएनएमसी में अब तक कोविड के 2000 से ऊपर संदिग्ध मामलों की जांच हो चुकी है.

ताज़ा आँकड़ों से अनुसार अब तक यहां 80 से ज़्यादा मरीज़ों के सैम्पल पॉज़िटिव पाए गए हैं जिनमें से 51सैम्पल सिर्फ़ नोएडा के हैं. बाक़ी पॉज़िटिव मामले रामपुर, हाथरस, बुलंदशहर, मुरादाबाद, आगरा, अलीगढ़ और बदायूँ के हैं.

कोरोना के आसपास अब तक हुए शोध के अनुसार वायरस के फैलाव को रोकने के लिए संदिग्ध मामलों की ज़्यादा से ज़्यादा और कुशल टेस्टिंग के सिवा कोई दूसरा चारा नहीं है.

लेकिन जेएनएमसी के डॉक्टरों का कहना है कि उनके पास संदिग्ध मरीज़ों की जांच के लिए पर्याप्त टेस्टिंग किट मौजूद नहीं हैं.

नाक और मुँह दोनों से सैम्पल लेने की ज़रूरत

वीडियो कैप्शन, क्या भारत में कोरोना संदिग्ध संक्रमितों के नहीं हो रहे हैं पर्याप्त टेस्ट

जेएनएमसी के रेज़िडेंट डॉक्टर एसोसिएशन (आरडीए) के महासचिव डॉक्टर मोहम्मद काशिफ़ कहते हैं, "कोरोना के बढ़ते कर्व को चपटा करने के लिए ज़रूरी है कि हर संदिग्ध की जाँच हो. कई बार कोरना के मरीज़ों के तुरंत लक्षण दिखाई नहीं देते. इसलिए जांच के नतीजों को पुख़्ता बनाने के लिए ज़रूरी है कि नाक और मुँह दोनों से सैम्पल लिया जाए. लेकिन यह स्वॉब आम रुई के टुकड़ों पर नहीं, सिर्फ़ रेलोन के बने टुकड़ों पर लिया जा सकता है."

जेएनएमसी जैसे महत्वपूर्ण अस्पताल रेलोन के साथ साथ कोरोना की जांच करने वाली पूरी टेस्टिंग किट के लिए जूझ रहे हैं. डॉक्टर काशिफ़ जोड़ते हैं, "कोरोना की जांच करने के लिए ज़रूरी मीडिया और कल्चर अभी हमारे पास पुणे के वाइरलॉजी संस्थान से बनकर आता है. इन टेस्टिंग किट्स की यहां बहुत कमी है जिसकी वजह से हम उतने टेस्ट नहीं कर पा रहे हैं जितने करना चाहते हैं."

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इमेज कैप्शन, डॉक्टर मोहम्मद काशिफ़

टेस्टिंग किट्स की कमी

कोरोना से लड़ने में टेस्टिंग को सबसे ज़रूरी हथियार बताते हुए डॉक्टर काशिफ़ जोड़ते हैं कि अभी जनता को सिर्फ़ यह बताया जा रहा है कि कोरोना से बचना है. लेकिन कैसे बचना है, इसके बारे में पुख़्ता जानकारी टेस्टिंग के ज़रिए ही दी जा सकती है.

वे कहते हैं, "बिना जाँच के घूमता एक संक्रिमित व्यक्ति 406 लोगों को कोरोना से संक्रमित कर सकता है जबकि जांच के बाद आइसोलेट कर देने पर यही व्यक्ति सिर्फ़ 2.6 लोगों को संक्रमित कर पाएगा. साथ ही साउथ कोरिया की तर्ज़ पर जांच के बाद हम संक्रमित लोगों का एक अनुमानित मैप बनाकर बाक़ी लोगों को भारी संक्रमण वाले इलाक़ों से दूर रहने के बारे में सूचित कर सकते हैं. इस तरह से हम अधिक से अधिक टेस्टिंग के द्वारा अंत में कोरना मरीज़ों की बढ़ती संख्या पर क़ाबू पा सकते हैं. लेकिन इसके लिए सबसे पहले पर्याप्त मात्रा में टेस्टिंग किट्स की उपलब्धता सुनिश्चित करना ज़रूरी है."

चालीस बिस्तरों के कोरोना वार्ड में मात्र 4 वेंटिलेटर

1200 बिस्तरों वाले जेएनएमसी अस्पताल ने फ़िलहाल कोरोना के मरीज़ों को देखने के लिए 40 बिस्तरों और मात्र 4 वेंटिलेटरों का एक कोरोना वार्ड चिन्हित किया है.

इस वार्ड में काम करने वाले सभी डॉक्टर, नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों के लिए पीपीई पहनना अनिवार्य है. इस किट में एन 95 मास्क, गॉगल और पूरे शरीर के साथ साथ जूतों को भी ढँकता हुआ एक हाज़्मैट सूट भी शामिल है. लेकिन एक ओर जहाँ डॉक्टर अपने लिए ख़ुद ही सुरक्षा गियर ख़रीदने को मजबूर हैं वहीं नर्स और अन्य पैरा-मेडिकल स्टाफ़ बिना नियत सुरक्षा कवच या पीपीई के ही काम करने के लिए मजबूर हैं.

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इमेज कैप्शन, जेएनएमसी के रेज़िडेंट डॉक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर हमज़ा मालिक

डॉक्टरों को ख़ुद ही ख़रीदनी पड़ रही है पीपीई

जेएनएमसी के रेज़िडेंट डॉक्टर एसोसिएशन (आरडीए) के अध्यक्ष डॉक्टर हमज़ा मालिक कहते हैं, "पिछले एक महीने से हम अलीगढ़ यूनिवेर्सिटी से लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय तक को चिट्ठियाँ लिख चुके हैं कि हमें पर्याप्त मात्रा में पीपीई उपलब्ध करवाया जाए. कोरोना से लड़ने के लिए जो लॉकडाउन हो रहा है, वह बहुत अच्छा क़दम है. लेकिन अगर सरकार इस लड़ाई में अपने योद्धाओं को असलहा ही नहीं मुहैया करवाएगी - यानी अगर डॉक्टरों को इलाज और जांच के दौरन पहनने के लिए ज़रूरी पीपीई जैसी मूलभूत चीज़ें ही नहीं दी जाएँगी तो हम कोरोना की लड़ाई कैसे जीतेंगे? इतना कहने के बाद अभी यहां डॉक्टरों को मास्क मिलना तो शुरू हुए हैं लेकिन स्टॉक नहीं है. इसलिए आरडीए में हमने ख़ुद ही पैसे जुटाकर 150 पीपीई किट ख़रीद लिए हैं ताकि काम चलता रहे."

बिना सुरक्षा के काम कर रही हैं नर्सें

संक्रमण का ख़तरा मोल लेकर आइसोलेशन वार्ड में काम कर रहे नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ़ कोरोना के ख़िलाफ़ इस जंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.

लेकिन पीपीई किट की उपलब्धता के मामले में उनकी हालत डॉक्टरों से भी गई गुज़री है.

डॉक्टर हमजा कहते हैं "नर्सें और मरीज़ रजिस्टर करने वाले पैरामेडिकल स्टाफ़ एचआइवी मरीज़ों के लिए इस्तेमाल होने वाले साधारण किट पहन कर काम कर रहे हैं जो कोरोना से कोई बचाव नहीं देते. वैसे भी अभी तक देश में 200 से अधिक डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ़ कोरोना इंफ़ेक्शन का शिकार हो चुके हैं. इस तरह से बिना व्यवस्थित सुरक्षा कवच के तो आगे भी मेडिकल स्टाफ़ संक्रमित होता रहेगा."

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इमेज कैप्शन, हाईड्रोक़्सीक्लोरोक्वीन की गोलियां

डॉक्टरों के लिए ही उपलब्ध नहीं है हाईड्रोक़्सीक्लोरोक्वीन

22 मार्च को जारी किए गए इंडियन काउन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च के दिशा निर्देशों के अनुसार कोरोना के संदिग्ध मरीज़ों की जांच और आइसोलेशन वार्ड में काम करने वाले सभी स्वास्थ्य कर्मचारियों को बचाव की तरह हाईड्रोक़्सीक्लोरोक्वीन की निश्चित खुराक खाने की सलाह दी गई है.

लेकिन भारत में बड़ी तादाद में उत्पादित होने के बाद भी ज़मीन पर काम कर रहे डॉक्टरों को यह दवा उपलब्ध नहीं हो पा रही है.

जेएनएमसी की रेसिडेंट डॉक्टरस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष डॉक्टर शाहनवाज़ इक़बाली ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि कई बार कहने के बाद भी प्रशासन अब तक डॉक्टरों को हाईड्रोक़्सीक्लोरोक्वीन की गोलियां उपलब्ध नहीं करवा पाया है.

उन्होंने बताया, "हमारा मेडिकल कॉलेज अभी तक इस दवा को न तो व्यापक तौर पर ख़रीद पाया है और न ही स्वास्थ कर्मचारियों के बीच में इसका बड़े पैमाने पर वितरण ही कर पाया है. हालाँकि कोरना के संदर्भ में हाईड्रोक़्सीक्लोरोक्वीन के असर पर अभी शोध जारी हैं लेकिन जब भारत समेत दुनिया भर की इतनी स्वास्थ्य एजेंसियां डॉक्टरों को इसके इस्तेमाल की लिखित अनुशंसा कर रही हैं तो सरकार को यह दवाई हमें उपलब्ध करवानी चाहिए."

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इमेज कैप्शन, जेएनएमसी की रेसिडेंट डॉक्टरस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष डॉक्टर शाहनवाज़ इक़बाली

एनेस्थीसिया के डॉक्टरों का संकट

बीबीसी से बातचीत के वक़्त जेएनएमसी में कार्यरत एनेस्थिसिया विशेषज्ञ डॉक्टर वैनलऊब्दीन कोरोना आइसोलेशन वार्ड में एक हफ़्ते काम करने के बाद 14 दिन के सेल्फ़ क्वारंटीन में जाने ही वाले थे.

काम की वजह से महीने भर से अपने परिवार और नवजात बच्चे से दूर वैनलऊब्दीन बताते हैं, "गंभीर मरीज़ों की उखड़ती सांस को वेंटिलेटर के ज़रिए वापस स्थिर करना हमारे काम का हिस्सा है. जांच के दौरान भी कई बार हमें संक्रमित और संदिग्ध मरीज़ों के मुँह के ठीक पास आकर इलाज करना पड़ता है. ऐसे में हमारे संक्रमित होने का ख़तरा बहुत ज़्यादा है. वीडियो लरेंजोस्कोप जैसी तकनीकों से काम करके हम इस ख़तरे को थोड़ा कम कर सकते हैं लेकिन यह मशीनें हमारे यहां बहुत कम संख्या में उपलब्ध है. कोरोना के ख़तरे को देखते हुए आइसीयू को बढ़ाने की बात की जा रही हैं लेकिन एनेस्थिसिया विशेषज्ञ तो उतने ही हैं! आज यहां एक एक एनेस्थिसिया का डॉक्टर आइसीयू में दस से बारह मरीज़ देखने को मजबूर है जो स्थापित मापदंड का दोगुना है."

कोरना से लड़ाई लंबी है

डॉक्टर वैनलऊब्दीन की बात को ही आगे बढ़ाते हुए डॉक्टर काशिफ़ कहते हैं कि कोरोना से जंग जीतने के लिए संसाधनों के साथ-साथ इस परिस्थिति से निपटने में सक्षम प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ़ की भी ज़रूरत है.

उन्होंने बताया, "हम अभी ठीक ठीक नहीं कह सकते की यह लड़ाई कितनी लंबी होने वाली है. इसलिए एक ओर जहाँ हमें अपने सभी मौजूदा संसाधनों को संभाल कर इस्तेमाल करना होगा. वहीं दूसरी ओर सरकार से यह उम्मीद है कि वह ज़रूरी संसाधन उपलब्ध करवाने के साथ साथ माइक्रोबायलॉजी और एनेस्थिसिया जैसे विभागों में प्रशिक्षित स्टाफ़ की संख्या में भी इज़ाफ़ा सुनिश्चित करेगी."

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ओपीडी बंद

कोरना के डर से बड़ी संख्या में डॉक्टरों के संक्रमित हो जाने के भय की वजह से जेएनएमसी में सभी ओपीडी फ़िलहाल बंद हैं.

डॉक्टरों की शिफ़्ट्स टुकड़ों में लगाई जा रही है और एक हफ़्ते की शिफ़्ट के बाद हर डॉक्टर को 3 हफ़्ते क्वारंटीन में बिताने पड़ रहे हैं. यहां काम कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि ओपीडी के बंद होने का सबसे बड़ा असर गुर्दे और दिल जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज़ों के रोज़मर्रा के इलाज पर पड़ रहा है.

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 1351153 1049947 35751
आंध्र प्रदेश 681161 612300 5745
तमिलनाडु 586397 530708 9383
कर्नाटक 582458 469750 8641
उत्तराखंड 390875 331270 5652
गोवा 273098 240703 5272
पश्चिम बंगाल 250580 219844 4837
ओडिशा 212609 177585 866
तेलंगाना 189283 158690 1116
बिहार 180032 166188 892
केरल 179923 121264 698
असम 173629 142297 667
हरियाणा 134623 114576 3431
राजस्थान 130971 109472 1456
हिमाचल प्रदेश 125412 108411 1331
मध्य प्रदेश 124166 100012 2242
पंजाब 111375 90345 3284
छत्तीसगढ़ 108458 74537 877
झारखंड 81417 68603 688
उत्तर प्रदेश 47502 36646 580
गुजरात 32396 27072 407
पुडुचेरी 26685 21156 515
जम्मू और कश्मीर 14457 10607 175
चंडीगढ़ 11678 9325 153
मणिपुर 10477 7982 64
लद्दाख 4152 3064 58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 3803 3582 53
दिल्ली 3015 2836 2
मिज़ोरम 1958 1459 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

ये कोरोना के ख़िलाफ़ जारी युद्ध का एक नया मोर्चा है जिसकी चुनौती वक़्त से साथ बढ़ती ही जा रही है.

प्रशासन का पक्ष

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार अब्दुल हामिद ने बीबीसी को बताया कि प्रशासन संसाधनों के बेहतर इंजताम की लगतार कोशिश कर रहा है.

उन्होंने बताया, "फ़िलहाल हमने 40 बेड कोरोना के आइसोलेशन वार्ड के लिए रखे हैं और इस वार्ड में फ़िलहाल हमारे पास 4 वेंटिलेटर हैं. नए वेंटिलेटरों के लिए प्रशासन ने सरकार के सामने माँग रख दी है और हमें उम्मीद है कि इस महीने के अंत तक नए वेंटिलेटर उपलब्ध हो जाएँगे. जहाँ तक पीपीई और एन-95 मास्क का सवाल है, आप जानती ही हैं कि उसकी कमी हर जगह है. फिर भी हमने अपने स्तर पर विक्रेताओं के साथ साथ राज्य सरकार और केंद्र सरकार के सामने भी अर्ज़ी डाल दी है. रक्षा विभाग की ओर्डिंनेसं फ़ैक्टरी भी यह मास्क और किट बना रही हैं, उनके पास भी हमने रिक्वेस्ट डाल दी है. हम प्रक्रिया में हैं और हर स्तर पर सारे संसाधन उपलब्ध करवाकर बेहतर तरीक़े से कोरोना से लड़ने की कोशिश कर रहे हैं,"

हाईड्रोक़्सीक्लोरोक्वीन की उपलब्धता को मसला न मानते हुए उन्होंने आगे कहा, "हाईड्रोक़्सीक्लोरोक्वीन हमारे पास है और जल्द ही उपलब्ध करा दी जाएगी. पीपीई किट भी कोरोना की जाँच और इलाज से संबंधित सभी स्वास्थ्य कर्मचारियों को उपलब्ध कराया जाएगा. हमने अपनी तरफ़ से टीम वर्क की तैयारी तो की है, बड़ी संख्या में मरीज़ों के आने के बाद ही इस तैयारी की परीक्षा होगी."

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बहराइच में जारी है संदिग्ध मरीज़ों की तलाश

अलीगढ़ से आगे ग्रामीण और क़स्बाई भारत में कोरोना के ख़िलाफ़ जारी लड़ाई का जायज़ा लेने के लिए बीबीसी ने बहराइच के महसी सामुदायिक अस्पताल में कार्यरत मेडिकल ऑफ़िसर डॉक्टर ऐश्वर्या मिश्रा से बात की.

यूं तो बहराइच में अभी तक कोरोना का एक भी पॉज़िटिव मरीज़ नहीं पाया गया है. ग़ौरतलब है कि बीते महीने हुए पलायन के दौरान बाहर काम करने वाले प्रवासी मज़दूर बड़ी संख्या में बहराइच वापस आए हैं.

इन पलायन करके आए लोगों में संभावित कोरोना करियर को ढूँढना ऐश्वर्या जैसे स्वास्थ्य कर्मियों की सबसे बड़ी प्राथमिकता है. ज़िले में एक ओर जहाँ सैकड़ों लोग अपने घरों में बंद हो अपने क्वारंटीन का समय गुज़ार रहे हैं, वहीं यहां के 9 क्वारंटीन केंद्रों में अब भी 430 लोग रह रहे हैं.

इन लोगों के रहने और खाने पीने की व्यवस्था की ज़िम्मेदारी ज़्यादातर मामलों में संबंधित ग्राम प्रधान की होती है.

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ग्रामीण स्तर पर कैसे खोजे जा रहे हैं कोरोना के मरीज़

संदिग्ध कोरोना मरीज़ों की तलाश की प्रक्रिया को समझाते हुए डॉक्टर ऐश्वर्या कहती हैं, "आशा कार्यकर्ताओं की मदद से हम गांव में नए वापस आए लोगों को तलाशने और उनके बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश करते हैं. हर सुबह 11.30 बजे तक हमारे पास ऐसे लोगों के नामों की एक लिस्ट आ जाती है. ब्लॉक और ग्रामीण स्तर पर कार्यरत हमारे डॉक्टर और दवा कर्मी जाकर उन लोगों की प्राथमिक जाँच करते हैं. उन्हें क्वारंटीन रहने के लिए तो कहा ही जाता है..साथ ही ज़रा भी संदिग्धता महसूस होने पर मरीज़ को अस्पताल लाया जाता है."

लेकिन ग्राउंड ज़ीरो पर कोरोना के संदिग्ध मरीज़ों को खोजना ग्रामीण स्तर पर काम कर रहे स्वास्थ्य कर्मियों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं हैं.

गांव-गांव तक फैल रहे इस संघर्ष के बारे में बहराइच ज़िले में कोरोना के नोडल ऑफ़िसर डॉक्टर जेएन मिश्रा बताते हैं, "हमने ज़िले को एल 1, एल 2 और एल 3 की तीन श्रेणियों में बाँटा है. हल्के तौर पर संदिग्ध मरीज़ों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में एल 1 श्रेणी के तहत रखा जाएगा. थोड़े गंभीर लक्षण वाले मरीज़ों को ज़िला अस्पताल में एल 2 श्रेणी के तहत रखा जाएगा और पॉज़िटिव मरीज़ों को ज़िला मेडिकल कॉलेज के आइसोलेशन वार्ड में. संसाधनों की सीमाएँ तो हैं लेकिन ग्रामीण स्तर पर गहरी जाँच करके कोरोना के संभावित करियरों को ढूँढने की पूरी कोशिश की जा रही है."

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कोरोना वायरस हेल्पलाइन

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