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भाजपा मुसलमानों के ख़िलाफ़ नहीं: आडवाणी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इंटरव्यू के सिलसिले में लालकृष्ण आडवाणी से मुलाक़ात लगभग एक वर्ष बाद हुई. पिछली मुलाक़ात का अवसर था उनकी आत्मकथा के विमोचन के बाद के दिनों में, जब वह मीडिया से मुख़ातिब हो साक्षात्कार दे रहे थे. आडवाणी आज भी हमेशा की तरह चुस्त और फ़्रेश नज़र आ रहे थे. पर कहीं न कहीं चुनावों की मुहिम और व्यक्तिगत रूप से उनके लिए यह सियासी दंगल कितना महत्वपूर्ण है, इसकी भी एक ख़ास टेंशन उनकी बॉडी लैंग्वेज में झलक रही थी. बात समझ में भी आती है. यह पहला चुनाव है जब पार्टी के प्रधानमंत्री पद के मैस्कट (शुभंकर) में अटल बिहारी वाजपेयी नहीं हैं. और कोई कुछ भी कहे पर कम से कम मेरा मानना यह है कि भाजपा और आडवाणी जी के सत्ता के नज़दीक पहुँचने की संभावना पिछले वर्ष जब मैं उनसे मिला था, उस समय आज की तुलना में ज़्यादा थी. वह नए-नए भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित हुए थे. जिन्ना के मामले पर उनकी पार्टी ने उन्हें ज़बरदस्ती रिटायर सा कर दिया था. उस वनवास से भी उनकी काफ़ी गरिमामयी वापसी हुई थी. पुस्तक भी चर्चा में थी. यूपीए सरकार आपसी झगड़ों में फंसी हुई थी और तीसरे मोर्चे का कोई नामलेवा नहीं था. बदला हुआ समय कुल मिलाकर आडवाणी जी में तब लोगों को एक नए तरह का आभामंडल दिखता था, आज हालात कुछ बदले हुए नज़र आते हैं. संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन( यूपीए) के मुक़ाबले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी ज़्यादा साथ निभा रहे थे. लेकिन बीजू जनता दल के झटके से भाजपा अभी तक उभर नहीं पाई है और तीसरे मोर्चे की संभावना आज पिछले वर्ष से अधिक है. इससे तो कोई भी इनकार नहीं करेगा. आडवाणी जी लेकिन आशावान थे. उनका कहना था, "हर मोर्चे पर विफल यूपीए सरकार को तो लोग निश्चित ही नकार देंगे और तीसरा मोर्चा बग़ैर भाजपा या कांग्रेस के समर्थन से सरकार नहीं बना सकती है, इसलिए तीसरे मोर्चे की बात बेमानी है." प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और आडवाणी में जो पिछले महीनों में तीखी और सार्वजनिक नोक-झोंक हुई है, उससे आडवाणी जी क्षुब्ध दिखे और उन्होंने इस इंटरव्यू के दौरान कहीं भी सीधे मनमोहन सिंह की बात नहीं की और अपने निशाने पर सरकार को ही अधिक रखा. आडवाणी का कहना था, "पाँच साल में इस सरकार की एक भी उपलब्धि नहीं है." जब मैंने कहा कि सरकार इस बात का लगातार श्रेय ले रही है कि 26 नवंबर की मुंबई वारदात के बाद इस सरकार ने पहली बार इतना दबाव बनाया कि पाकिस्तान को यह स्वीकार करना पड़ा है कि उनके नागरिक या उनकी भूमि की कुछ न कुछ भूमिका मुंबई के चरमपंथी हमलों में थी. इस सवाल पर उनका कहना था, "सरकार ने इसमें क्या किया है. यह तो अंतरराष्ट्रीय दबाव का नतीजा है. हमारी तो यह हालत हो गई है कि हम इन तरह की घटनाओं के बाद अमरीका के पास भागते हैं, जैसे वॉशिंगटन नहीं हमारी रपट लिखने वाला पुलिस स्टेशन है." मंत्रिमंडल का 'अपराधीकरण' सरकार पर प्रहार करते हुए आडवाणी का कहना था, " इस सरकार में तो मंत्री की छवि ऐसी है कि हम ये भी नहीं कह सकते की ये राजनीति का अपराधीकरण है, बल्कि यूपीए ने तो मंत्रिमंडल का अपराधीकरण कर दिया है." बकौल आडवाणी, "प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर कभी भी कोई कार्रवाई करने के बजाए हमेशा यही कहा कि उनका मंत्रिमंडल गठबंधन राजनीति की मजबूरी का उदाहरण है." इस बातचीत में आडवाणी ने बार-बार भारतीय मुसलमानों की तरफ हाथ बढ़ाने की कोशिश की और एक से ज़्यादा बार इस बात पर बल देने का प्रयास किया कि वह और उनकी पार्टी मुसलमान विरोधी नहीं है. उनका कहना था, "भारतीय मुसलमानों से भी कहीं ज़्यादा, कुछ लोगों ने मुझे पाकिस्तान में हौवे कि तरह पेश कर रखा था. वह सब कुछ वर्ष 2006 में हुई मेरी पाकिस्तान यात्रा में बदल गया, जब मैंने जिन्ना साहब को सेक्युलर बताते हुए उनकी प्रशंसा की." मैंने पूछा कि पाकिस्तान के अवाम को तो आपने जीत लिया था पर उस मुद्दे पर आपकी पार्टी, संघ परिवार और आप ही के ज़रिए बनाए गए नेताओं ने तो आपका साथ छोड़ दिया. फिर कोई विकल्प नहीं दिखा तो आपको फिर अपना लिया. इस सवाल के उत्तर में उनका कहना था, "ऐसा नहीं है. हमारी पार्टी लोकतांत्रिक मिज़ाज की पार्टी है. सबको लगा कि मैंने ऐसा क्या कह दिया. ग़लती का एहसास हुआ तो भूल सुधार ली." पाकिस्तान में छवि बदली उनका ये भी कहना था, "इस यात्रा के दौरान पाकिस्तान में मेरी छवि बदल गई. धीरे-धीरे ही सही लेकिन भारत में भी मुसलमानों की यह समझ में आ जाएगा कि मैं और भाजपा उनके ख़िलाफ़ नहीं हैं. बस हममें और अन्य दलों में यह फ़र्क है कि उनके वोटों के लिए वह ग़लत को भी सही कह सकते हैं. मैं और भाजपा ऐसा कभी नहीं कहेंगे." उनका कहना था, "भारतीय राजनीति की त्रासदी है कि हिंदू मतदाताओं को रिझाने के लिए राजनीतिक दल जाति और भाषा का कार्ड खेलते हैं और मुसलमानों को अपनी ओर करने के लिए धर्म का. यह दोनों ही बाते हमें मंज़ूर नहीं हैं." वरुण गांधी प्रकरण पर वह कुछ बोलना नहीं चाहते थे. ज़्यादा कुरेदने पर उनका सिर्फ़ यह कहना था, "अगर वरुण गांधी ने वही कहा है जिसकी मीडिया में चर्चा है तो उनको यह नहीं कहना चाहिए था. पर पहले बात साबित होनी चाहिए. वरुण गांधी को दी जा रही सज़ा किसी भी मापदंड पर बिल्कुल ग़लत है." जब उनसे पूछा गया कि अगर भाजपा चुनाव हार जाती है तो क्या आप राजनीति छोड़ने का सोच सकते हैं. इस पर उनका कहना था, "ऐसा क्यूँ. मेरे राजनीतिक करियर के 60 में सिर्फ़ आठ वर्ष ही मैं सत्ता में रहा हूँ और विपक्ष में रहते हुए मुझे यह कभी नहीं लगा कि मैं कुछ कम सार्थक काम कर रहा हूँ. मेरी सिर्फ़ एक इच्छा है. मैं जब भी राजनीति से अवकाश लूँ, स्वस्थ रहूँ, ज़रूरी नहीं टॉप पर रहूँ लेकिन स्वस्थ रहूँ." |
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