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पार्टी का असली चेहरा रहे हैं आडवाणी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इस बात को लेकर इतिहास में बहुत-सी बहसें दर्ज हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी का मुखौटा हैं या नहीं. लेकिन इस बात पर कोई बहस नहीं है कि लालकृष्ण आडवाणी पार्टी का असली चेहरा नहीं हैं. वाजपेयी के मुखौटा होने की बहस ही इसीलिए थी क्योंकि आडवाणी असली चेहरा थे. भले ही भाजपा की स्थापना के समय पार्टी के अध्यक्ष वाजपेयी थे और सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री भी वाजपेयी बने लेकिन पार्टी को दो से 182 सांसदों तक पहुँचाने के पीछे कोई था तो वे आडवाणी ही थे. इसके लिए 90 के दशक में राम मंदिर का आंदोलन और उनकी विवादास्पद रथयात्रा उनका हथियार बनी. बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के वे प्रत्यक्षदर्शी थे और अकारण नहीं था कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में वे मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती के साथ अभियुक्त भी बनाए गए. तेज़ राजनीतिज्ञ लालकृष्ण आडवाणी का जन्म कराची में 1929 में हुआ था और विभाजन के समय उनका परिवार राजस्थान आ गया और यहीं उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ काम करना शुरु किया.
1952 से 57 तक वे राजस्थान भारतीय जनसंघ के संयुक्त सचिव रहे और 1973 में वे जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए. 1970 में वे पहली बार राज्यसभा से सदस्य चुने गए और लगातार चार बार राज्यसभा के सदस्य चुने जाते रहे. 1989 में पहली बार उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा और इस समय वे पाँचवीं बार लोकसभा के निर्वाचित सदस्य हैं और प्रतिपक्ष के नेता भी. 1986 में वे पहली बार भाजपा के अध्यक्ष बने और 91 तक इसी पद पर बने रहे. दो साल के अंतराल के बाद एक बार फिर वे अध्यक्ष बने तो 1998 तक अध्यक्ष रहे. यानी पार्टी के 25 साल के इतिहास के आधे से ज़्यादा समय में अध्यक्ष का पद आडवाणी ने ही संभाले रखा. शायद इसीलिए क्योंकि वे जितने चतुर और कुटिल रणनीतिकार के रुप में जाने जाते हैं उतने ही कुशल संगठक के रुप में भी. लेकिन यह भी तथ्य है कि भाजपा के भीतर साफ़ तौर पर दो खेमे हैं. एक आडवाणी खेमा और एक वाजपेयी खेमा. और वाजपेयी का खेमा आज भी यह ज़िक्र करना नहीं भूलता कि आडवाणी तो वाजपेयी के राजनीतिक सचिव थे. छवि का सवाल कट्टर हिदुत्व के प्रचारक आडवाणी की छवि आमतौर पर भाजपा के तीनों विवादित मुद्दों के कट्टर समर्थक के रुप में रही है जिसमें धारा 370, समान नागरिक संहिता और राम मंदिर हैं.
इसी छवि के कारण वे मुसलमान और आख़िरकार पाकिस्तान विरोधी के रुप में देखे जाते रहे. आगरा की शिखर बैठक जब विफल हो गई तो परवेज़ मुशर्रफ़ ने इसका परोक्ष दोष आडवाणी पर ही मढ़ा था. लेकिन 1998 में भाजपा गठबंधन की सरकार बनने के बाद जब वे उपप्रधानमंत्री बने तब तक ये साफ़ हो चुका था कि भारत में आने वाले कई बरसों तक गठबंधन की ही राजनीति चलने वाली है तो आडवाणी ने आहिस्ता आहिस्ता अपनी छवि बदलने का क्रम शुरु किया. लिब्राहन आयोग के सामने उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद का गिरना उनके जीवन का सबसे दुखद दिन था. इसके बाद उन्होंने देश विदेश में कई ऐसे बयान दिए जिसे उनकी छवि बदलने की कोशिश के रुप में देखा गया. शायद यही कारण था कि संघ परिवार के बाक़ी संगठनों को आडवाणी का नेतृत्व भी खटकने लगा था. और हाल ही में संघ प्रमुख सुदर्शन ने युवा नेतृत्व का जो सवाल उठाया उसे भी विश्लेषकों ने इसी रुप में देखा. लेकिन जून के पहले सप्ताह में पाकिस्तान यात्रा के दौरान उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताया तो मानों घट भर गया..... ...और लालकृष्ण आडवाणी के लिए उनके चहेते हिंदू नेताओं ने उन्ही विशेषणों का उपयोग किया जिसका उपयोग वे कभी मुसलमानों के लिए तो कभी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए करते रहे थे. पता नहीं, 76 साल के आडवाणी अब भारतीय जनता पार्टी के भीतर कितने उपयोगी रह जाएँगे या कितने प्रासंगिक बने रहना चाहेंगे, लेकिन इसमें किसी को शक नहीं हो सकता कि यह उनके राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन और पीड़ादायक क्षणों में से एक है. |
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