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आडवाणी का बयान बनाम सत्ता की राजनीति | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लालकृष्ण आडवाणी और मोहम्मद अली जिन्ना, दोनों एक दूसरे के प्रतिबिम्ब की तरह दिखाई देते हैं. जिन्ना की ख़ासियत यह थी कि वे जब सत्ता से दूर होते थे तो धर्मनिरपेक्ष होते थे और सत्ता पाते ही सांप्रदायिक हो जाते थे. जबकि आडवाणी जी जब तक सत्ता में होते हैं, जब तक वे देश में रहें या विदेश में धर्मनिरपेक्ष होते हैं और सत्ता छूटते ही सांप्रदायिक हो जाते हैं. और आडवाणी जी का जो बयान आया है वह सत्ता की राजनीति का ही हिस्सा है. इसे गंभीरता से नहीं लेना चाहिए क्योंकि इसमें विचारधारा कहीं नहीं है. ये और बात है कि इस बार उन्हें सत्ता के न होते हुए भी धर्मनिरपेक्ष दिखना पड़ रहा है. ये साबित करता है कि धर्मनिरपेक्षता भी एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दे की तरह है, डॉलर की तरह है. विदेश में तो डॉलर ही चलाना होगा इसलिए आडवाणी जी धर्मनिरपेक्षता की बात कर आए. जिन्ना की धर्मनिरपेक्षता जहाँ तक मोहम्मद अली जिन्ना का सवाल है तो जिन्ना तो पूरी ज़िंदगी धर्मनिरपेक्ष थे.
लेकिन गाँधी जी के आने के बाद जब उन्हें सत्ता हासिल करने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ी तो वे सांप्रदायिक हो गए. और जब उन्हें सत्ता फिर से मिल गई तो वे एक बार फिर से धर्मनिरपेक्ष हो गए. आडवाणी जी बात तो सही कह रहे हैं कि जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे लेकिन वे इस बहाने से अपने आपको भी धर्म निरपेक्ष कह रहे हैं. आडवाणी जी को समझ में आ गया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदुत्व की मुद्रा नहीं चलती. फिर चाहे वो पाकिस्तान हो या लंदन हो. वहाँ तो धर्मनिरपेक्षता का डॉलर ही चलता है. जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष कहकर वे अपने आपको भी धर्मनिरपेक्ष साबित करना चाह रहे हैं. ग़लत प्रचार संघ(आरएसएस) की जो प्रतिक्रिया है वह पचास-साठ सालों की ख़ुद की बाँटी हुई ग़लत शिक्षा का परिणाम है. संघ ही ग़लत प्रचार करता रहा है कि भारत पाकिस्तान का बँटवारा किस तरह से हुआ. हक़ीकत तो थी नहीं वो. सच यह है कि भारत और पाकिस्तान का बँटवारा धर्म के आधार पर हुआ नहीं हुआ था वह तो चुनावी राजनीति के तहत हुआ था. जो चुनावी राजनीति वर्ष 46 से पहले थी वह सांप्रदायिक आधार पर थी और जब 46 में असेंबली का चुनाव हुआ तो चार-पाँच सौ विधायकों से पूछा कि क्या आप विभाजन चाहते हो जिसपर उन्होंने कह दिया कि वे विभाजन चाहते हैं. विभाजन हो गया. सीमांत प्रांत में किसी से पूछा भी नहीं गया कि वे क्या चाहते हैं. तो विभाजन की प्रक्रिया तो धर्म के आधार पर नहीं थी लेकिन इन्होंने उसका प्रचार किया कि ये धर्म के आधार पर हुआ और इसे ही अपनी विचारधारा के फ़िट कर लिया. 1948 के बाद उन्होंने सांप्रदायिक आधार पर बँटवारे का सिद्धांत प्रचारित कर दिया. हिंदुत्व के बदले लालकृष्ण आडवाणी को पता चल चुका है कि हिंदुत्व के दिन अब लद गए हैं इसलिए वे सत्ता पाने के लिए अपने आपको एडवांस में ही धर्मनिरपेक्ष साबित करने में लगे हुए हैं. जहाँ तक आरएसएस, विश्व हिदू परिषद और भाजपा के भीतर हो रहे विरोध की बात है तो जब सत्ता पाने का समय आएगा तो उन्हें समझा दिया जाएगा. ऐसा खेल संघ और भाजपा हमेशा खेलते आए हैं. हिंदुत्व की विशेषता यही है कि हर बात का एक जवाब उसी के भीतर मौजूद है क्योंकि वह बहुसंख्या पर आधारित है. यही भाजपा की भी रणनीति है कि भाजपा से एक बात आती है और उसकी विरोधाभासी बात भी भाजपा के भीतर से ही आ जाती है. लेकिन हिंदुत्व में यह बात चल जाती है, लोकतंत्र में नहीं चलती और विरोधाभासी दिखाई देने लगती है. कट्टरपंथी-उदारपंथी आडवाणी जी वैसे तो कट्टरपंथी हैं और यदि उन्हें वाजपेयी की जगह सत्ता पानी है तो उन्हें उदारवादी दिखाई देना पड़ेगा.
संघ को पता है कि सत्ता पाने से कितना लाभ होता है इसलिए जब सत्ता पाना होगा तो वे आख़िरकार आडवाणी को स्वीकार कर लेंगे. उन्हें भी तो सत्ता में आना ही है इसलिए इस झगड़े को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए. आडवाणी जी के इस बयान से पाकिस्तान में उनकी छवि पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है. वे लोग वास्तविकता को पहचानते हैं. और न इससे लंबे समय में भाजपा की राजनीति में कोई फ़र्क पड़ने वाला है. सत्ता पाने के लिए आडवाणी और सिंघल के बीच जो खींचतान चल रही है वो सत्ता पाने तक चलती रहेगी और फिर सब ठीक हो जाएगा. यदि संघ चाहता कि सिंघल सत्ता संभालें तो विहिप अबतक पार्टी बना चुका होता. इसलिए साफ़तौर पर यह दिखाई देता है कि सत्ता पाने के क़रीब पहुँचने के समय वे आडवाणी को फिर स्वीकार कर लेंगे. |
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