|
आडवाणी की आत्मकथा का विमोचन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
'माई कंट्री-माई लाइफ़' यानी 'मेरा देश-मेरा जीवन' भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा है. इस आत्मकथा का विमोचन बुधवार को देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने दिल्ली में किया. समारोह का समाँ किसी भी अवार्ड फंक्शन से कम नहीं था. चाहे उद्योग जगत से अनिल अंबानी हों या फ़िल्मी दुनिया से संजय दत्त और सोनू निगम या फिर चो रामास्वामी जैसे मीडिया के दिग्गज. बड़े लोगों की इस समारोह में कोई कमी नहीं थी. भाजपा के भी लगभग सभी वरिष्ठ नेता इस विमोचन समारोह में मौजूद थे. फिर वो चाहे वरिष्ठ पीढ़ी के जसवंत सिंह, भैरव सिंह शेखावत और मुरली मनोहर जोशी हों या फिर नई पीढ़ी के नरेन्द्र मोदी और राजनाथ सिंह. सभी ने इस विमोचन के लिए समय निकला. इसके अलावा एनडीए के संयोजक जॉर्ज फ़र्नांडिस, आरएसएस के मोहन भगवत और एनसीपी के शरद पवार भी इस समारोह में नज़र आए. महत्वपूर्ण इस किताब में लालकृष्ण आडवाणी ने भारत की पिछले 60 सालों की राजनीति के कई महत्वपूर्ण मोड़ और अहम् घटनाओं का उल्लेख किया है. जिसमें भारत का विभाजन, इमरजेंसी और भाजपा की रथ यात्रा शामिल है. आडवाणी ने इस पुस्तक में बाबरी मस्जिद और 2002 के गुजरात दंगों जैसे कई संवेदनशील मुद्दों पर भी लिखा है. इस समारोह में जसवंत सिंह ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आडवाणी को कई मायनों में ग़लत समझा जाता है. उन्होंने कहा, "आज की राजनीति में मुझे लगता है कि आडवाणी जी को ग़लत ढंग से समझा और प्रस्तुत किया गया है. अपने व्यक्तिगत अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि वे वास्तविकता में अपनी इस छवि से बहुत अलग हैं." इस मौक़े पर आडवाणी ने अपने निजी परिवार और अपने वैचारिक परिवार आरएसएस को अपने जीवन में सार्थकता और संतुष्टि का स्रोत बताया. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इस कार्यक्रम में शामिल नहीं थे लेकिन आडवाणी ने उनके प्रति भी अपना आभार प्रकट किया. और फिर अंत में कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि एपीजे अब्दुल कलाम ने आडवाणी को एक रचनात्मक नेता बताते हुए किताब के बारे में कहा, "अटल बिहारी वाजपेयी ने इस किताब की भूमिका में जो लिखा है, मैं उससे सहमत हूँ कि एक संवेदनशील मनुष्य और एक बड़े नेता के जीवन का सबसे अच्छा समय अभी आना बचा हुआ है." भारत के बहुत ही कम नेता हैं जिन्होंने सक्रिय राजनीति में रहते हुए अपनी आत्मकथा लिखी है. आडवाणी उनमें से एक हो गए हैं. लेकिन इस बात की अटकलें लगाई जा रही हैं कि जब अगले साल होने वाले आम चुनावों के बादल अभी से मंडराने लगे हैं तब कहीं-न-कहीं इस किताब के विमोचन का समय देश के राजनीतिक वातावरण को देखकर किया गया है. कारण चाहे जो हो, लालकृष्ण आडवाणी की जो भूमिका देश की राजनीति में रही है उस संदर्भ में यह किताब शायद देश की कई ऐतिहासिक घटनाओं पर नई रोशनी डाल सकती है. |
इससे जुड़ी ख़बरें चुनाव के लिए कमर कसने की अपील29 जनवरी, 2008 | भारत और पड़ोस 'गुजरात चुनाव राजनीति में मुख्य मोड़'23 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस प्रधानमंत्री राजनीति नहीं समझते: आडवाणी14 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस आडवाणी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार होंगे10 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'मनमोहन सिंह सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री'13 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'संन्यास' लेना चाहते हैं वाजपेयी02 मई, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||