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आडवाणी कैसे निभाएँगे नई ज़िम्मेदारी? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अपने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढाव देख चुके लालकृष्ण आडवाणी को इंतज़ार की शायद आदत सी पड गई है. दशकों से पार्टी की सेवा में लगे आडवाणी को लंबे समय तक अटल बिहारी वाजपेयी के पीछे खडा रहना पडा. अस्सी की उम्र पार कर चुके आडवाणी अगले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे. हालाँकि इसकी चर्चा अगस्त से ही शुरू हो गई थी. फिर भारतीय जनता पार्टी की भोपाल कार्यकारिणी में घोषणा होते-होते रुक गई. पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अंतिम समय में एक जादूगर की तरह अपनी जेब से निकाला - तथाकथित रूप से बिना हस्ताक्षर वाला वाजपेयी का संदेश. उन्होंने पढा - "मैं फिर वापस लौटूँगा. इस संदेश ने एक बार फिर आडवाणी की आशाओं पर पानी फेर दिया." विरोधियों की बधाई फिर जिस तरह से उनका जन्मदिन मनाया गया, उससे साफ़ हो गया कि घोषणा का वक़्त दूर नहीं है. लेकिन जितने अनापेक्षित तरीक़े से गुजरात में चुनाव से ठीक पहले यह अपेक्षित घोषणा हुई, उससे इसकी मंशा पर सवाल ज़रूर उठे. लंबे समय बाद पार्टी में उनके विरोधी खेमें में गिने जाने वाले मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं को भी उन्हें मिठाई खिलाकर बधाई देनी पडी. अपना आभार प्रकट करते हुए लालकृष्ण आडवाणी ने कहा, " मैं भारतीय जनता पार्टी के प्रति, अध्यक्ष के प्रति और विशेषकर अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति अंतर्मन से आभार प्रकट करता हूँ, जिनके नेतृत्व में वर्षों से मैंने और पार्टी ने कार्य किया है, भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि मुझे सामर्थ्य प्रदान करें ताकि मैं उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप यह दायित्व निभा सकूं." वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय कहते हैं, "अगर गुजरात चुनाव में फ़ायदे की मंशा थी तो इसका कोई ख़ास असर नहीं होगा. मुझे नहीं लगता कि इससे भारतीय जनता पार्टी को गुजरात चुनाव में कोई फ़ायदा होगा. गुजरात में पूरे चुनाव अभियान में केवल मोदी ही मोदी हैं. रामबहादुर राय कहते हैं, "इस घोषणा का यह परिणाम हो सकता है कि यदि नरेंद्र मोदी जीत गए, जिसकी ज़्यादा संभावना है, तो आडवाणी के समर्थक इस बात को बढा-चढाकर कहेंगे. वे लोग दावा करेंगे कि मोदी की जीत में आडवानी का भी सहयोग है. मोदी पिछले एक दो वर्षो से कोशिश कर रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद के सहयोग के बिना विकास और मोदी के नाम पर चुनाव जीता जाए." अंदरूनी कलह भारतीय जनता पार्टी में इतना महत्वपूर्ण फ़ैसला तभी हो सकता था जब अटल बिहारी वाजपेयी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसा चाहते और पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को इस फ़ैसले पर वीटो न करने के लिए राज़ी कर लिया गया होता. दस दिसंबर को ऐसा हुआ भी. लेकिन भारतीय जनता पार्टी की नज़र न केवल गुजरात पर बल्कि आगामी लोकसभा चुनाव पर भी थी. ऐसे में अंदरूनी कलह से जूझ रही भारतीय जनता पार्टी को चुनावी समर की तैयारी के लिए एक क़द्दावर नेता की ज़रूरत थी. इंडियन एक्सप्रेस अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कौशल कहते हैं, "भारतीय जनता पार्टी के भीतर धारणा है कि चुनाव अवश्यंभावी है. पहले माना जा रहा था कि दिसंबर या जनवरी में चुनाव हो सकते हैं, ऐसा नहीं हुआ, तब भी वे मानते हैं कि एक लोक लुभावने बजट को प्रस्तुत करने के बाद कांग्रेस चुनाव कराना चाहेगी. इसके बाद वाम मोर्चा भी अपना समर्थन वापस ले सकता है." प्रदीप कौशल कहते हैं, 'भारतीय जनता पार्टी ने सोचा कि क्यों न इससे पहले अपने घर को दुरूस्त कर लिया जाए. काफ़ी समय से जनता में यह संदेश जा रहा था कि नेतृत्व के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी बंटी हुई है. पार्टी ने सोचा कि समय रहते नेतृत्व के सवाल को भी हल कर लिया जाए तो बेहतर होगा."
भारतीय जनता पार्टी में आडवाणी एक बडे नेता हैं. इस दावे को शायद ही कोई झुठलाए. तभी तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी आडवाणी की दावेदारी पर चुप नहीं रह सके. मनमोहन सिंह ने कहा," भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व को भी मोदी जी से कोई ख़तरा है. वे चाहते हैं कि दिल्ली की गद्दी पर गुजरात के चुनाव से पहले ही किसी की ताजपोशी कर दें." शायद इसके पीछे यह कारण भी था कि संसद के अंदर विपक्ष के नेता के रूप में और संसद के बाहर दोनों नेताओं में हाल में कई बार टकराव भी हुआ. राजनाथ सिंह से संघ परिवार को कई आशाएं थीं. उन्हें आशा थी कि चाहे उत्तर प्रदेश के चुनाव हो या फिर पार्टी की अंदरूनी कलह, राजनाथ सिंह पार्टी के लिए एक मज़बूत नेता सिद्ध होंगे. उम्मीद थी कि वे ऐसे नेताओं पर अंकुश लगा सकेंगे जो आडवाणी के राज में आगे बढ रहे थे और जिन्हें संघ परिवार पसंद नहीं करता था. लेकिन राजनाथ ऐसा कर न सके. संघ के पास कोई और रास्ता नहीं बचा था और उसे मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ़ करने वाले आडवाणी का हाथ दोबारा थामना पडा. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता राम माधव अब सफ़ाई देते हुए कहते हैं, "ये बहुत पुरानी बाते हैं. तीन वर्ष बीत चुके हैं. वह सिद्धांत संबंधी विषय था जिस पर भिन्न भिन्न राय थी. आज वह निर्णय लिया जाएगा जो पार्टी के लिए उचित है." राम नाम की धुन राम के नाम पर रथ पर सवार होकर लोकसभा में सीटें हासिल करने वाली पार्टी सत्ता की दावेदार पार्टी बनी. यह वक्त आडवानी ने देखा. उन्हें लौह पुरुष की संज्ञा दी गई. हालाँकि जब वे गृहमंत्री थे, तब उनके कामकाज का तरीक़ा लौह पुरुष की छवि से मेल नहीं खाया. लेकिन अब उनकी राजनीति कैसी होगी, इस पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं. वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय आडवाणी का आकलन कुछ इस तरीके से करते हैं, "आडवानी के राजनीतिक जीवन के मोटे तौर पर दो हिस्से हैं. पहला हिस्सा आकर्षक है, चमकदार है, त्याग-तपस्या वाला है और नैतिक बल वाले राजनेता का है. यह चमक वर्ष 1995 में अपने चरम पर था. 1995 के नवंबर में मुंबई में उन्होंने घोषणा दिया कि यदि भारतीय जनता पार्टी को बहुमत मिलता है तो अटल बिहारी वाजपेयी हमारे प्रधानमंत्री होंगे." राम बहादुर राय का मानना है, "उस दौर के आडवाणी आज नहीं हैं. आडवाणी में आज वो कुव्वत नहीं है जो उनमें वर्ष 1995 में थी. उनमें आज वो चमक नहीं है, जो उनमें तब थी. आडवाणी उन्हीं नेताओं में से एक हैं और उन्हीं नेताओं में शुमार हो गए हैं जो सत्ता के लिए, कुर्सी के लिए हमेशा गिद्ध दृष्टि लगाए रहते हैं." लेकिन संघ परिवार को आडवाणी से क्या आशाएँ हैं? क्या भारतीय जनता पार्टी हिंदुत्व के एजेंडे पर चलेगी ? क्या गठबंधन के इस दौर में उसे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के घटक दलों को साथ रखने के लिए नए एजेंडे तलाश करने पडेंगें? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता राम माधव कहते हैं, " राष्ट्रहित के संदर्भ में हम चाहते हैं कि हमारे विचारों को सभी राजनीतिक दल स्वीकार कर लें. ख़ासतौर पर भारतीय जनता पार्टी, क्योंकि उसमें बडी मात्रा में संघ के स्वयंसेवक हैं. आज की तिथि में जैसे रामसेतु का प्रश्न है, तुष्टिकरण की नीति है और परमाणु समझौते जैसे मुद्दों पर हम राष्ट्रहित का विचार रखते हैं. हम मानते हैं कि देशहित में सभी दलों को इन्हें स्वीकार करना चाहिए. राम मंदिर, कश्मीर और अनुच्छेद 370 पर हमारे विचार जैसे थे, वैसे ही रहेंगे." राजग का भविष्य राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन घटक दल के एक प्रमुख नेता शरद यादव को गठबंधन में कोई दिक्कत नज़र नहीं आती. पर वे यह भी जानते हैं कि उनकी पार्टी को बिहार में मुसलमानों और दलितों ने बडी संख्या में मत दिए थे. उनके लिए हर वह नीति मुश्किलों का कारण बन सकती है जो इन तबकों के हितों को ध्यान में नहीं रखती. शरद यादव कहते हैं, "हमारे और उनके बीच रिश्ते राष्ट्रीय एजेंडे पर निर्भर हैं. वह एजेंडा जब तक चलेगा, हमारे उनके रिश्ते बने रहेंगे. यदि वे एजेंडे से अलग चलेंगे, जैसे कि गुजरात में, तो हम भी अलग लड़ रहे हैं." लेकिन कुछ विश्लेष्कों का मानना है कि भारत में दो गठबंधनों की राजनीति का दौर है. कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वालों गठबंधनों में नीतिगत बहुत अधिक भिन्नता नहीं है. वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय कहते हैं, "आडवानी ने वर्ष 1998 से अब तक भारतीय जनता पार्टी को सत्ता की स्वाभाविक दावेदार पार्टी बना दिया है. यह स्वाभाविक नहीं है, यह उनका दावा है. मुद्दों के बारें में भी पार्टी नेतृत्व और कार्यकर्ता अलग-अलग सोचते हैं. ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही है. इसलिए भारी ऊहापोह की स्थिती रहेगी. आडवाणी कहेंगे क्या, मैं यह नहीं जानता, लेकिन उनके मन में एक बात ज़रूर बैठी है कि सिर्फ़ एक मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस से अलग दिखना चाहिए. बाकी वह पूरी तरह से कांग्रेस है." उन्होंने कहा, "सेक्यूलरिज़्म़, धर्मनिरपेक्षता और पंथ निरपेक्षता तीन अलग-अगल शब्द हैं और इनके तीन अलग-अलग अर्थ हैं. जो जिस शब्द का इस्तेमाल करता है, उसी से सेक्यूलरिज़्म़ परिभाषित होता है. सेक्यूलरिज़्म़ ही एक ऐसा विषय रहेगा जिससे भारतीय जनता पार्टी स्वयं को कांग्रेस से भिन्न दिखाने की कोशिश करेगी." राजनाथ की मुश्किलें भारतीय जनता पार्टी के लिए आडवाणी का नेतृत्व शायद पार्टी के अंर्तकलह को रोक पाए. लेकिन गुजरात में यदि नरेंद्र मोदी जीतते हैं, तो राजनाथ सिंह द्वारा उन्हें पार्टी के संसदीय बोर्ड से बाहर करना याद रहेगा. अरूण जेटली और सुषमा स्वराज जैसे नेताओं की पार्टी अध्यक्ष से अनबन भी खुलकर सामने आ सकती है. हालाँकि पत्रकार प्रदीप कौशल मानते हैं कि शायद ऐसा न हो. वे कहते है, ''राजनाथ सिंह पार्टी नेताओं से कहीं अलग-थलग हैं. उन्हें अपनी पार्टी के वरिष्ठ सहयोगियों का समर्थन हासिल नहीं है. आडवाणी चूँकि निर्विवादित नेता हैं, उन्होंने दूसरी पीढी के नेताओं की एक पूरी खेप तैयार की है. इसलिए उन्हें सहज ही सबका भरपूर समर्थन और सहयोग मिलेगा. इससे आडवाणी पार्टी के भीतर सभी नेताओं का भरपूर उपयोग कर पाएंगे." चुनाव की तैयारी के रूप में भारतीय जनता पार्टी ने आडवाणी की प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में ताजपोशी कर दी है. पर क्या आडवाणी भारतीय जनता पार्टी को फिर सत्ता की स्वाभाविक पार्टी बना पाएंगे या यह ताज उनके लिए कांटों भरा होगा. | इससे जुड़ी ख़बरें प्रतिभा संपत्ति की जानकारी दें: आडवाणी02 जुलाई, 2007 | भारत और पड़ोस आडवाणी की 'अंतरात्मा वोट' की अपील05 जुलाई, 2007 | भारत और पड़ोस ख़त से गर्म हुआ अटकलों का बाज़ार21 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस आडवाणी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार होंगे10 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'मनमोहन सिंह सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री'13 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस प्रधानमंत्री राजनीति नहीं समझते: आडवाणी14 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस लालकृष्ण आडवाणीः एक संक्षिप्त परिचय10 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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