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'मनमोहन सिंह सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भारत अमरीका परमाणु समझौते पर रुख़ नरम करने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आलोचना की है और उन्हें सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री बताया है. परमाणु समझौते पर अपना रुख़ बदलने के लिए जहाँ वामपंथी दलों ने प्रधानमंत्री की सराहना की है वहीं भाजपा ने उन्हें आड़े हाथों लिया है. आडवाणी ने जारी एक बयान में कहा कि परमाणु समझौते पर अपने रुख़ में परिवर्तन करके मनमोहन सिंह ने इस पद की वजह से जो थोड़ी बहुत विश्वसनीयता हासिल की थी, वह भी गवां दी है. विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी का कहना था कि मनमोहन सिंह का यह कहना कि परमाणु समझौता न होने से जीवन ख़त्म नहीं हो जाता, उन्हें देश का अब तक का सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री साबित करता है. 'कमज़ोर प्रधानमंत्री' आडवाणी ने कहा कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार मई, 2004 में गठन के समय से ही कमज़ोर रहा है और शुक्रवार के बदलाव के बाद उसका पतन होता चला जाएगा. उन्होंने कहा कि डॉ मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एकाएक पीछे हटकर यह साबित कर दिया है कि उनका कोई सिद्धांत नहीं है. आडवाणी का कहना था कि जैसे ही उन्हें इसका अहसास हो गया कि यह समझौता सरकार को ले डूबेगा, उन्होंने अपने रुख़ में परिवर्तन कर लिया. आडवाणी का कहना था कि संसद के अधिकांश सदस्य ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक समुदाय, सुरक्षा विशेषज्ञ और विदेश नीति विशेषज्ञ भी इस समझौते के ख़िलाफ़ थे. उन्होने कहा कि वामदल भी इसके विरोधी थे, लेकिन उनका विरोध अमरीका को लेकर था. इसके विपरीत भाजपा ने अपने विरोध में कहा था कि इस समझौते में राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों की अनदेखी की गई है. उन्होंने कहा कि भाजपा का यह मत है कि यह समझौता बराबरी के आधार पर होना चाहिए और अमरीका के सामने सामरिक सुरक्षा, संप्रभुता और आत्मनिर्भरता को गिरवी नहीं रखा जाना चाहिए. |
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