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सोमवार, 05 फ़रवरी, 2007 को 13:38 GMT तक के समाचार
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भारत के परमाणु कार्यक्रम का सफ़र

भारत का परमाणु संयंत्र
भारत को परमाणु कार्यक्रम में अनेक बाधाओं का भी सामना करना पड़ा है
नेहरू काल से ही भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व करता रहा जिसके कारण देश परंपरागत रूप से परमाणु हथियारों के विरोध में हमेशा खड़ा रहा.

भारतीय परमाणु कार्यक्रम की बात की जाए तो 50 के दशक में अमरीका के एटम्स फॉर पीस कार्यक्रम के तहत मुंबई के पास ट्रॉम्बे में भाभा परमाणु केंद्र की स्थापना की गई और इसका मक़सद परमाणु ऊर्जा के असैनिक इस्तेमाल को बढ़ावा देना था.

रक्षा विशेषज्ञ कॉमोडोर उदय भास्कर कहते हैं, '' भारत का परमाणु कार्यक्रम करीब 55-56 साल पुराना है. जब विश्व के सामने एक भीषण चुनौती थी हिरोसिमा और नागासाकी के ऊपर एटमी हमले के रूप में. उसी के बाद पंडित नेहरू के लिए ये हादसा एक चिन्ह था कि भारत को उस रस्ते पर नहीं जाना चाहिए और विश्व में परमाणु क्षमता का प्रयोग असैनिक कार्यों यानि शांति और उन्नति के लिए ही होना चाहिए.''

जहाँ तक परमाणु हथियारों की तो शुरुआती दिनों में भारत की परमाणु हथियारों को विकसित करने की दिलचस्पी का कोई प्रमाण नहीं. लेकिन जल्द कुछ ऐसा होने वाला था जिसने सारे समीकरण बदल दिए.

सन 1962 में चीन ने भारत के ख़िलाफ़ छेड़ युद्ध दिया और भारत की सैन्य क्षमता को ख़ासा नुकसान भी पहुँचा. हार के बाद सैन्य ज़रूरतों पर तो बहस छिड़नी ही थी.

सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के ब्रह्म चेलानी का मानना है,'' हिंदुस्तान का परमाणु शस्त्रों का कार्यक्रम शुरू से ही चीन को ध्यान में रखकर हुआ क्योंकि चीन ने जिस तरह से 1962 में हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ आक्रमण किया और दो साल बाद 1964 में उसने अपना पहला परमाणु परीक्षण कर डाला, उससे भारत में असुरक्षा की भावना बढ़ गई.''

कहना ग़लत नहीं होगा कि इसके बाद छिड़ी बहस ने भारत के परमाणु कार्यक्रम को एक निश्चित दिशा प्रदान की.

परमाणु विस्फोट

चीनी विस्फोट के बाद भारत ने थार के मरुस्थल में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया और इसे एक ज़िम्मेदार परमाणु विस्फोट की संज्ञा दी गई.

इंडियन डिफेंस रिव्यू नामक पत्रिका के संपादक भरत वर्मा कहते हैं,'' भारत की फिलॉसफी में परमाणु शस्त्रों की कोई भूमिका नहीं है. दूसरे भारत का मानना रहा है कि हम दुनिया के दोयम दर्जे के नागरिक नहीं रहेंगे. तो जब दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों के पास है तो हमारे पास भी होना चाहिए. इसीलिए 1974 का परीक्षण हुआ.''

शायद ये वजह रही कि जब मई 1998 में पोखरण में दूसरा परमाणु परीक्षण हुआ तो दुनिया हक्की-बक्की रह गई. ताक़तवर पश्चिमी देशों के चप्पे-चप्पे पर तैनात खोजी उपग्रह भी इसको पकड़ न सके. और तो और भारत में ही इसकी जानकारी सिर्फ़ कुछएक लोगों को थी.

 मेरा मानना है कि चूंकि अमरीका और भारत परमाणु संधि को पूरा होने में कुछ अहम चीज़ें बाक़ी हैं, इसलिए यह कह पाना कि ये संधि पूर्णतया लागू हो भी जाएगी या नहीं, अभी मुश्किल है
ब्रह्म चेलानी, रक्षा विशेषज्ञ

पत्रकार और परमाणु मामलों के जानकार प्रफुल बिदवई भी इससे सहमति रखते हैं,'' हम जानते हैं कि 1998 में परमाणु विस्फोट करने का जो निर्णय लिया गया वो कैबिनेट में बिना चर्चा के हुआ. रक्षा मंत्री को विस्फोट के दिन ही बताया गया. इसके बारे में और तीनों सुरक्षा बलों के प्रमुखों को भी दो दिन पहले इस शर्त पर बताया गया कि जॉर्ज फर्नांडिस को हरगिज़ मत बताइएगा.''

परमाणु परीक्षण के असर के बारे में भरत वर्मा कहते हैं, '' मुझे शाम को साढ़े छह या सात बजे एक ब्रिगेडियर साहब का फ़ोन आया कि हमने थर्मो न्यूक्लियर टेस्ट तक का विस्फोट कर लिया है, टीवी पर आ रहा है. मैंने टीवी पर ये भी देखा कि बिल क्लिंटन साहब जो उस समय अमरीकी राष्ट्रपति थे, उनको ये ख़बर मिलते ही उनका मुँह लटक गया.''

इन पाँच परमाणु धमाकों के बाद तीखी अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया तो होनी ही थी. अमरीका और जापान ने तुरंत ही भारत पर कड़े प्रतिबंध थोप दिए.

हालाँकि भारत को इन सबसे ज़्यादा फिक्र पाकिस्तान की थी, और पाकिस्तान की प्रतिक्रिया और 28 मई 1998 को चंगई की पहाड़ियों में एक परमाणु परीक्षण के रूप में आई.

ब्रह्म चेलानी के अनुसार,'' भारत ने परीक्षण किए इसलिए पाकिस्तान को परमाणु परीक्षण करना एक राजनीतिक मजबूरी बन गया. पाकिस्तान ने 1980 के दशक में अपना परमाणु शस्त्रीकरण कार्यक्रम शुरू किया था. यह पाकिस्तान का पूरे विश्व को एक संकेत था कि वो भी पीछे नहीं रहेगा.''

दक्षिण एशिया पर तो सारे विश्व की निगाहें गड़ी हुई थी. चिंता यही थी अब परमाणु तकनीक का हथियारों के रूप में गैर ज़िम्मेदाराना प्रयोग शुरू हो जाएगा.

कितने हथियार?

पर भारत की बात की जाए तो उसके पास कितने परमाणु हथियार है, इसका कोई भी सही आँकड़ा नहीं, क्योंकि अमरीका और रूस की तरह भारत ने कभी कोई आधिकारिक घोषणा नही की.

फिर भी कॉमोडोर उदय भास्कर कहते हैं,'' इसका तकनीकि दृष्टि से आकलन किया जा सकता है. ये एक अंदाज़ा है कि भारत के पास करीब सौ हो सकते हैं और करीब पचास पाकिस्तान के पास.''

भारत का परमाणु संयंत्र
भारत ने अमरीका के साथ असैनिक परमाणु क्षेत्र में समझौता किया है

भारत के परमाणु हथियारों के अलावा, आजकल चर्चा में है भारत-अमरीका का असैनिक परमाणु समझौता. इस संधि पर अमरीका की अंतिम मुहर लगते ही भारत को न्यूक्लियर सप्लाइज ग्रुप में दाखिला मिल जाएगा.

ये उन देशों का गुट है जो असैनिक कार्यों के लिए आपस में परमाणु तकनीक का आदान-प्रदान करते हैं.

जानकारों का मानना है कि इस संधि से बढ़ने वाली परमाणु ऊर्जा भारत के विकास के लिए वरदान साबित होगी. आम धारणा ये है कि भारत को एक ज़िम्मेदार परमाणु शक्ति का दर्ज़ा भी मिल जाएगा.

भरत वर्मा बताते हैं,'' जिस तरह से ये क़ानून अमरीका ने मंजूर कराया है और आप राष्ट्रपति बुश की नीतियों से सहमत हो या न हो, लेकिन जहाँ भारत को लेकर जो भूमिका बुश की रही वह काबिलेतारीफ़ है.''

क्या यह एक सार्थक संकते है. इस पर ब्रह्म चेलानी कहते है, '' मेरा मानना है कि चूंकि अमरीका और भारत परमाणु संधि को पूरा होने में कुछ अहम चीज़ें बाक़ी हैं, इसलिए यह कह पाना कि ये संधि पूर्णतया लागू हो भी जाएगी या नहीं, अभी मुश्किल है.''

जाहिर सा सवाल उठता है कि आखिर एक परमाणु शक्ति के रूप में भारत का क्या कद है. क्या दुनिया वाकई में भारतीय परमाणु क्षमताओं को गंभीरता से ले रही है?

जबाव में कॉमोडोर उदय भास्कर कहते हैं,'' विश्लेषक होते हुए मेरा यह मानना है कि भारत ने परमाणु निशस्त्रीकरण में एक ख़ास भूमिका निभाई. मैने देश भर में लोगों से जा जाकर बात की है और आम राय है कि परमाणु हथियार विनाशकारी है और परमाणु तकनीक का इस्तेमाल उन्नति के लिए ही होना चाहिए. और मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि भारत ने इस क़दम में अपना योगदान दिया है.''

अगर कहा जाए कि आपका भारत, ख़ासतौर पर एक परमाणु भारत दुनिया भर का ध्यान आकर्षित कर रहा है. परमाणु हथियारों और उनके आगे इस्तेमाल किए जाने की शंका से नहीं बल्कि अपनी विकसित परमाणु तकनीक के कारण.

अभी तक तो भारत एक ज़िम्मेदार परमाणु शक्ति का ही बर्ताव करता रहा है. लेकिन आगे आने वाले दिनों में क्या होगा भारत का नज़रिया. इस मसले पर कुछ कह पाना अभी मुश्किल है.

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