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'सामरिक कार्यक्रम की निगरानी नहीं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्पष्ट किया है कि भारत के सामरिक कार्यक्रम की अंतरराष्ट्रीय निगरानी नहीं होगी और यह 'अपनी ज़रूरतों पर आधारित होगा'. लोकसभा में भारत-अमरीका परमाणु समझौते पर जारी चर्चा के बीच में हस्तक्षेप करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा देश के सामरिक कार्यक्रम का क्या दायरा है, इस बारे में न तो अमरीका और न ही किसी अन्य देश के साथ कोई बातचीत हुई है. दूसरी ओर विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने आरोप लगाया कि अमरीकी संसद से जो विधेयक पारित हुआ है, उसके आधार पर समझौता होने का मतलब है कि भारत पर कई तरह के नियंत्रण लगाए जाएँगे. आश्वासन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने समझौते से जुड़ी आशंकाओं को दूर करने की कोशिश करते हुए कहा, "हमारा सामरिक कार्यक्रम हमारे अपने फैसलों के मुताबिक होगा. इसमें किसी अन्य देश की दखलंदाज़ी नहीं होगी." उन्होंने सदन को भरोसा दिलाया कि अमरीका के साथ असैनिक परमाणु समझौते का असर आणविक ऊर्जा विभाग के अनुसंधान और विकास कार्यक्रम पर नहीं पड़ेगा.
प्रधानमंत्री का कहना था कि जिस लक्ष्य को लेकर परमाणु ऊर्जा आयोग का गठन हुआ, वो पूरा नहीं हो सका है. उन्होंने ध्यान दिलाया कि सत्तर के दशक से अब तक परमाणु रिएक्टरों से सिर्फ़ 3600 मेगावाट बिजली निकालने में सफलता मिली है. उन्होंने कहा कि समझौते से परमाणु रिएक्टरों की क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी. प्रधानमंत्री ने कहा कि अब भारत के बारे में दुनिया की सोच बदल रही है और बहुत सारे देश भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र का दर्जा देने के लिए तैयार हैं. उन्होंने आगाह किया कि परमाणु समझौते पर बातचीत का पेचीदा दौर अब आने वाला है. प्रधानमंत्री ने कहा कि समझौते के दौरान वो संसद में दिए गए अपने आश्वासन से पीछे नहीं हटेंगे. विपक्ष का आरोप विपक्ष के नेता आडवाणी का कहना था कि मौजूदा स्वरूप में समझौता होने से भारत अमरीका का 'ग्राहक देश' बन कर रह जाएगा. उन्होंने एनडीए सरकार के कार्यकाल में 1998 में हुए पोखरण परमाणु समझौते पर मनमोहन सिंह की आपत्तियों को याद दिलाते हुए कहा, "ऐसा संदेह है कि प्रधानमंत्री अब कोई और पोखरण नहीं चाहते." सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता रूपचंद पाल ने भी प्रधानमंत्री से कहा कि समझौते की पिछली शर्तों में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए. उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री को आश्वासन देना चाहिए कि वो 17 अगस्त को संसद में दिए गए आश्वासन से पीछे नहीं हटेंगे." | इससे जुड़ी ख़बरें 'सामरिक कार्यक्रम में दख़ल नहीं होगा'12 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस भाजपा ने परमाणु संधि का विरोध किया10 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस आश्वस्त नहीं हैं भारत के परमाणु वैज्ञानिक10 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस समझौते को अमरीकी संसद की मंज़ूरी09 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना परमाणु समझौते के मसौदे पर सहमति08 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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