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रविवार, 10 दिसंबर, 2006 को 00:06 GMT तक के समाचार
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आश्वस्त नहीं हैं भारत के परमाणु वैज्ञानिक

भारत का एक परमाणु संयंत्र
वैज्ञानिक इस समझौते को पूरी तरह से भारत के हित में नहीं मानते
भारत अमरीका परमाणु समझौते को अमरीकी संसद से तो मंज़ूरी मिल गई और दोनों देश इस पर ख़ुश हैं लेकिन भारतीय परमाणु वैज्ञानिक इसके नतीजों को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं दिखाई पड़ रहे हैं.

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह कहना सही नहीं है कि इससे भारत के परमाणु हितों की रक्षा ही होगी.

उल्लेखनीय है कि भारत के साथ परमाणु समझौते के लिए आवश्यक विधेयक को अमरीकी संसद ने पारित कर दिया है और अब केवल राष्ट्रपति बुश के हस्ताक्षर होने बाक़ी हैं. फिर करार लागू हो जाएगा.

परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डा. ए गोपालकृष्णन कहते है "हमें इस परमाणु समझौते पर शक है क्योंकि भारत बहुत समय से स्वदेशी परमाणु तकनीक तैयार करने मे लगा हुआ है, और हम 80 फ़ीसदी सफल भी हो चुके हैं, पर समझौते के तहत अगर हम बाहर से परमाणु रिएक्टर खरीदना चाहें तो अव्वल तो वह बहुत महंगे होंगे और हम अमरीका जैसे देशों से परमाणु ईंधन तो लेना ही होगा."

 भारत का यूरेनियम भण्डार सीमित है और ये कमी ज़्यादा परमाणु ईंधन आयात करके ही दूर की जा सकती है
डॉ के संथानम

गोपालकृष्णन पूछते हैं, "कहीं अमरीका से सम्बन्ध आगे चल कर बिगड़ गए तो क्या होगा. हमारे करोड़ों रूपए के रिएक्टर बिना ईंधन चलेंगे कैसे? "

साफ़ है कि परमाणु वैज्ञानिक अमरीका से एक ऐसे वादे की उम्मीद रखते हैं जिसमें हामी भरी जाए की भारत को बिना शर्त एक लम्बे समय तक परमाणु ईंधन की सप्लाई जारी रहेगी.

हालांकि पूर्व परमाणु वैज्ञानिक और रक्षा मामलों के जानकार डा. के. संथानम इस बात से इत्तफाक नहीं रखते की यह समझौता अमरीका के ही पक्ष में है पर साथ ही साथ मानते हैं कि भारत का यूरेनियम भण्डार सीमित है और ये कमी ज़्यादा परमाणु ईंधन आयात करके ही दूर की जा सकती है.

डॉ संथानम मानते हैं, "भारत को अपने परमाणु संयंत्रों को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के लिए खोलने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए."

 भारत ने इस समझौते के बाद अपने परमाणु परीक्षण को गिरवी रख दिया हैं
पल्लव बागला

लेकिन डॉ संथानम की बातों का समर्थन करने वाले वैज्ञानिकों की कमी है.

प्रतिष्ठित पत्रिका साइंस से जुड़े पल्लव बागला कहते हैं, "आपत्तियाँ कई तरह की हैं और पहली है परमाणु संयंत्रों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन को लेकर है. अमरीका ईंधन में इस्तेमाल में आने वाली रॉड्स को नष्ट कर देता है लेकिन भारत इसको दोबारा इस्तेमाल करके बिजली पैदा करता है. और यह संधि इस महत्वपूर्ण बिंदु पर कोई प्रकाश नहीं डालती."

वे कहते हैं, "दूसरा यह कि भारत ने इस समझौते के बाद अपने परमाणु परीक्षण को गिरवी रख दिया हैं."

भारत सरकार इस समझौते को अपने हित में बता रही है पर विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार से लिए कठिनाई की शुरुआत तब होगी जब सरकार वैज्ञानिकों को बुलाकर परियोजना के विवरण देगी और सहमति बनाने के लिए उनको एकमत करना होगा.

शायद इसीलिए परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोडकर ने 15 दिसंबर को आयोग के पूर्व अध्यक्षों की एक अहम बैठक बुलाई है ताकि इस मसले पर आमराय पर पहुँचा जा सके.

यह और बात है कि परमाणु वैज्ञानिकों के जैसे तेवर दिखाई पड़ रहे हैं उसमें आमराय बना पाना बहुत कोई आसान कार्य नहीं लगता.

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