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परमाणु मुद्दे पर गिर सकती है केंद्र सरकार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत-अमरीका परमाणु क़रार पर जारी गतिरोध के बीच मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) पोलित ब्यूरो की सदस्य वृंदा करात ने कहा है कि इस मुद्दे पर केंद्र की यूपीए सरकार पर ख़तरा बरक़रार है. “आपकी बात बीबीसी के साथ” कार्यक्रम में सांसद वृंदा करात ने कहा, "सरकार और वामपंथी दलों के बीच गतिरोध दूर करने के लिए समिति बनने के बावज़ूद ‘बात जहाँ से शुरू हुई थी, अब भी वहीं अटकी है." उन्होंने कहा है कि गतिरोध इसी तरह जारी रहा तो यूपीए सरकार समय से पूर्व गिर भी सकती है. माकपा नेता ने कार्यक्रम में श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि सरकार ने अभी तक परमाणु क़रार को लेकर वामदलों की चिंताओं पर सकारात्मक रुख़ नहीं दिखाया है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमरीका के साथ परमाणु क़रार संपन्न कराने पर इस क़दर तुले हैं कि केंद्र की गठबंधन सरकार को भी दाँव पर लगाने को तैयार हैं. उन्होंने शिकायती लहजे में कहा कि मनमोहन सिंह जब वित्तमंत्री थे तब से अभी तक भारत के परमाणु कार्यक्रम के लिए सबसे कम संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं. उन्होंने दलील दी कि ‘एएन प्रसाद’ जैसे बड़े वैज्ञानिक भी इस क़रार के ख़िलाफ हैं. क़रार पर तकरार कार्यक्रम के दौरान एक श्रोता ने वृंदा करात से जानना चाहा कि वामपंथी दल कहीं चीन को फायदा पहुंचाने के लिए तो इस समझौते का विरोध नही कर रहे? जवाब में उन्होंने कहा कि वामपंथियों के लिए देश का हित सबसे ऊपर है. उन्होंने बताया कि चीन चाहता था कि भारत पहले परमाणु अप्रसार संधि ‘एनपीटी’ पर दस्तख़त करे, लेकिन वामदलों ने हमेशा इसका जमकर विरोध किया. उनका कहना था कि भारत सरकार अमरीकी दबाव में काम कर रही है और इसी कारण भारत अब ईरान के साथ गैस पाइपलाइन परियोजना से अलग हो गया है. उन्होंने आशंका जताई कि चीन इसका सीधा फ़ायदा उठा सकता है. भारत-अमरीका असैन्य परमाणु समझौते पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के सवाल पर उनका कहना था कि संसद मे बहुमत इस क़रार के ख़िलाफ़ है लेकिन सरकार बहुमत का सम्मान नहीं कर रही है. उनसे पूछा गया कि समझौते का विरोध कर रही भारतीय जनता पार्टी अगर इस मुद्दे पर संसद मे अविश्वास प्रस्ताव लाती है तो क्या वामदल ऐसे किसी प्रस्ताव का समर्थन करेंगे? इस पर उन्होंने कहा कि फिलहाल ये मुद्दा नहीं है. आम आदमी के लिए यह मुद्दा कितना मायने रखता है? यह पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि पार्टी का मानना है कि आम आदमी इस परमाणु क़रार से बुरी तरह से प्रभावित होगा. लेकिन वो इस सवाल को टाल गईं कि क्या अगला चुनाव इसी मुद्दे पर ही लड़ा जा सकता है. इस पर उन्होंने संकेत दिया कि सरकार पर ख़तरा बरक़रार है और इस बात की संभावना कम है कि सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर पाएगी. | इससे जुड़ी ख़बरें अमरीका परमाणु समझौते के लिए अडिग01 जून, 2007 | भारत और पड़ोस 'भारत-ईरान गैस लाइन पर मतभेद दूर'29 जून, 2007 | भारत और पड़ोस 'गठबंधन चलाना कांग्रेस की ज़िम्मेदारी'13 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस 'सामरिक संप्रभुता पर कोई असर नहीं'13 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस नौसैनिक अभ्यास के ख़िलाफ़ 'जत्था'04 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस सीपीएम ने लिखा सांसदों को खुला पत्र07 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस परमाणु समझौते पर कांग्रेस की 'सफ़ाई'21 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'परमाणु समझौते पर कोई समझौता नहीं'29 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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