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रविवार, 01 जुलाई, 2007 को 09:07 GMT तक के समाचार
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क्या उत्तर प्रदेश से सबक लेगी भाजपा?

आडवाणी और राजनाथ
राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आडवाणी ने उत्तर प्रदेश की हार को लेकर राजनाथ को आईना दिखाने की कोशिश की
बहुत ज़्यादा समय नहीं बीता है जब उत्तर प्रदेश से भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा में करीब 60 सांसद हुआ करते थे और विधानसभा में भी उसके विधायकों की संख्या 225 के आसपास हुआ करती थी.

आज हालात ये है कि पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी बमुश्किल 50 का आंकड़ा पार कर पाई है.

हार के बाद पार्टी के प्रभारी कल्याण सिंह ने तो अपने पद से इस्तीफ़ा दिया लेकिन पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने, जो ख़ुद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, मसले को बहुत हल्के ढंग से निपटाने की कोशिश की.

पार्टी की तरफ़ से आधिकारिक स्पष्टीकरण आया कि वो अपने आप को मुलायम सिंह के सशक्त विकल्प के रूप में पेश नहीं कर पाए.

पार्टी की महासचिव सुषमा स्वराज कहती हैं, ''हमने तात्कालिक विश्लेषण यह किया कि लोग समाजवादी पार्टी को हराने का मन बना चुके थे और अपने मत को बांटना नहीं चाहते थे. उन्होंने बहुजन समाज पार्टी को विकल्प के रूप में स्वीकार किया था. क्योंकि हमने विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने में विलंब कर दिया.''

कहीं न कहीं यह संदेश गया कि भाजपा मुलायम सिंह की विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी पार्टी है. इसलिए लोगों ने भाजपा को भी सज़ा देने के लिए मायावती के पक्ष में मतदान किया.

'विकल्प नहीं बन सके'

भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चा के संयोजक शहनवाज़ हुसैन का मानना है, ''हमसे कहीं न कहीं ये ग़लती तो हुई कि समाजवादी पार्टी के ख़िलाफ़ हम स्वयं को मज़बूती से खड़े नहीं दिखा सके. लोगों में ये संदेश चला गया कि हम समाजवादी पार्टी की मदद कर रहें हैं. इसकी वज़ह से कुछ दुश्वारियां ज़रूर हुईं. लेकिन हम ये मानते हैं कि अब उत्तर प्रदेश में जो भी चुनाव होगा वो बीजेपी और बसपा के बीच ही होगा.''

लेकिन सिर्फ़ यह सफ़ाई देने भर से बात ख़त्म नहीं हो जाती. आडवाणी ने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से बिल्कुल सही सवाल पूछा कि भाजपा उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के ख़िलाफ़ एक मज़बूत और विश्वसनीय विकल्प के रूप में अपने आप को क्यों नहीं प्रस्तुत कर पाई और इसके लिए किसको ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए.

 ''राजनाथ सिंह ने सफ़ाई दी कि हम अपने आप को एक सशक्त विपक्ष या विकल्प के तौर पर पेश नहीं कर पाए. ऐसा कहकर राजनाथ अपना बचाव कर रहें हैं. ये वैसी ही बात हैं कि हम ताले को इसलिए नहीं खोल पाए, क्योंकि चाबी हमारे पास नहीं थी.
दिवाकर, राजनीतिक संपादक, टाइम्स ऑफ इंडिया

राजनाथ सिंह तुरंत तो इसका कोई जबाव नहीं दे पाए, लेकिन इस पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया के राजनीतिक संपादक दिवाकर कहते हैं, ''राजनाथ सिंह ने सफ़ाई दी कि हम अपने आप को एक सशक्त विपक्ष या विकल्प के तौर पर पेश नहीं कर पाए. ऐसा कहकर राजनाथ अपना बचाव कर रहें हैं. ये वैसी ही बात हैं कि हम ताले को इसलिए नहीं खोल पाए, क्योंकि चाबी हमारे पास नहीं थी.

जिस तरह से टिकट बांटे गए, जिस तरह से अभियान चलाया गया, राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाजपा की एक महत्वपूर्ण नेता का यह कहना था कि हर उम्मीदवार के लिए दस-दस लाख रुपए मुकर्रर किए गए थे लेकिन उनके लोकसभा क्षेत्र के उम्मीदवारों को सिर्फ़ तीन-तीन लाख रुपए ही दिए गए. ये आरोप अपने आप में पार्टी के कुप्रबंधन का नमूना भी है.''

ज़िम्मेदार कौन ?

सवाल उठता है कि पार्टी की इस हार के लिए पार्टी अध्यक्ष ज़िम्मेदार हैं या पार्टी का पूरा नेतृत्व, जिसमें स्वयं लालकृष्ण आडवाणी भी शामिल हैं. वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय के मुताबिक इस हार की ज़िम्मेदारी सबको मिलकर लेनी चाहिए.

वे कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश में जो नतीजा आया है उसकी ज़िम्मेदारी पूरे बीजेपी नेतृत्व पर है. आडवाणी तो राजनाथ सिंह को सिर्फ़ आईना दिखाना चाहते थे. अगर दो साल पहले वाले आडवाणी होते तो वो इस पर नहीं बोलते. चेन्नई की मीटिंग के बाद आडवाणी को हटना पड़ा और मुंबई में राजनाथ सिंह को अध्यक्ष पद सौंपना पड़ा. तभी से आडवाणी इस मौक़े का इंतज़ार कर रहें थे.''

रामबहादुर कहते हैं ''इसी बात को एक दूसरे तरीक़े से देखना चाहिए. राजनाथ सिंह जब अध्यक्ष बने तो पंजाब, उत्तराखंड जैसे छोटे-छोटे राज्यों में चुनाव हुए और राजनाथ सिंह ने अपने आप को कुछ ज़्यादा ही आंक लिया. उन्होंने यह प्रचार करवाया कि राजनाथ सिंह के अध्यक्ष बनने से भाजपा की तकदीर संवर गई है.

 आडवाणी तो राजनाथ सिंह को सिर्फ़ आईना दिखाना चाहते थे. अगर दो साल पहले वाले आडवाणी होते तो वो इस पर नहीं बोलते. चेन्नई की मीटिंग के बाद आडवाणी को हटना पड़ा और मुंबई में राजनाथ सिंह को अध्यक्ष पद सौंपना पड़ा. तभी से आडवाणी इस मौक़े का इंतज़ार कर रहें थे.
रामबहादुर राय, वरिष्ठ पत्रकार

उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों ने उनके इस प्रचार पर विराम लगा दिया. बल्कि सवाल भी खड़ा कर दिया कि राजनाथ सिंह तकदीर वाले नेता नहीं हैं और भाजपा की तकदीर भी संवर नहीं रही है. इसी मौक़े का इंतज़ार आडवाणी कर रहे थे और उन्होंने जो कुछ भी कहा वो सब राजनाथ सिंह और आरएसएस को ही संबोधित है.''

ज़हन में एक यह बात भी आती है कि आडवाणी ने अपनी बात कहने के लिए यही समय और यही मंच क्यों चुना? वो यह बात चुनाव के नतीजे आने के तुरंत बाद भी तो कह सकते थे.

दिवाकर मानते हैं,''आडवाणी इस मौक़े के लिए काफ़ी लंबे समय से इंतज़ार कर रहे थे. राजनाथ के काम करने के तौर-तरीक़ों से पार्टी के आम कार्यकर्ता का मोह भंग हो चुका था. उत्तर प्रदेश के चुनावों के ज़ख़्म बड़े गहरे थे और जिन्ना प्रकरण की याद थोड़ी धुंधली पड़ती जा रही थी.

ऐसे में आडवाणी ने जो बातें कहीं, उससे तीर एकदम सहीं निशाने पर लगा. जैसा कि कहा भी जाता है कि तालियाँ सही समय पर बजाई जाएं तो ही अच्छी लगती हैं, समय से पहले तालियाँ बेसुरी लगती हैं.''

राजनाथ पर हमला ?

 भाजपा के मन में यह बात आ गई है कि जिस तरह एक अच्छी सरकार चलाने के बावजूद वे हार गए, इसी तरह से पाँच साल बाद पका फल सीधे इनकी झोली में गिरेगा. भाजपा को इस मानसिकता से ऊपर उठना होगा.
दिवाकर, राजनीतिक संपादक, टाइम्स ऑफ इंडिया

ये भी देखने वाली बात होगी कि क्या आडवाणी वाकई पार्टी को सही दिशा देने की कोशिश कर रहें हैं या वो राजनाथ सिंह पर उस समय वार कर रहें हैं जब वो राजनीतिक रूप से बहुत कमज़ोर हैं. क्या भाजपा में अभी भी वो ताकत है कि हिंदुत्व के मुद्दे को भुनाकर देश में एक बार फिर सरकार बनाने का सपना देख सके.

वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ऐसा नही मानते. वे कहते हैं, ''अब यदि किसी मंदिर या मस्जिद को आधार बनाकर हिंदुत्व के मुद्दे को उठाने की कोशिश होगी तो शायद वह वोट में तब्दील नहीं होगी. लेकिन हिंदुत्व को अगर आध्यात्मिक अर्थ में यानी समाज को जोड़ने के अर्थ में इस्तेमाल करेंगे और उसके लिए आपके पास वैसी ऊंचाई होनी चाहिए तो संभवत उस तरह की राजनीति लंबी होगी. फ़िलहाल तो इसके कोई लक्षण नहीं दिखाई दे रहें हैं.''

रामबहादुर राय कहते हैं, ''एक तरफ़ तो सामाजिक-राजनीतिक धुर्वीकरण हुआ है और इससे मायावती को ताक़त मिली है वहीं दूसरी तरफ जिस हिंदुत्व के आधार पर भाजपा ने अपनी ताक़त बढ़ाई थी, उस हिंदुत्व के बारें में लोगों ने माना कि यह किसी के ख़िलाफ़ है. यह जो किसी के ख़िलाफ़ वाला हिंदुत्व है, वह अब नहीं चल सकता है.''

भारतीय जनता पार्टी में एक ऐसी मनोवृत्ति भी घर कर रही है कि बिना कुछ किए सत्ता विरोधी रुझान उन्हें 2009 में उसी तरह से सरकार में लाएगा जैसे 2004 में कांग्रेस को सत्ता में लाया था.

इस बारे में दिवाकर कहते हैं, ''भाजपा के मन में यह बात आ गई है कि जिस तरह एक अच्छी सरकार चलाने के बावजूद वे हार गए, इसी तरह से पाँच साल बाद पका फल सीधे इनकी झोली में गिरेगा. भाजपा को इस मानसिकता से ऊपर उठना होगा.''

दिवाकर मानते हैं कि कांग्रेस को ज़रूर एक बार इस तरह के सत्ता विरोधी रुझान से फ़ायदा हुआ है लेकिन इसके बाद उसने एक अच्छी रणनीति चुनी, अच्छे सहोगी खोजे और इनकी कमज़ोरियों का फ़ायदा भी उठाया.

वे कहते हैं,'' इस तरह हाथ पर हाथ रखकर बैठना और यह सोचना कि एक दिन गेंद ख़ुद ही बल्ले पर आकर लगेगी, भाजपा को इस मानसिकता को छोड़ना होगा. भाजपा की एक ख़ास पहचान है और वैचारिक विशिष्टता है, उसको ये नहीं खोएं क्योंकि बहुत से लोग इनसे जुड़ते ही इस लिए हैं कि इन्हें दूसरों से अलग माना जाता है.''

अब देखना ये है कि भारतीय जनता पार्टी के नेता पार्टी के किले के कमज़ोर हिस्सों की मरम्मत करते हैं या इन कमज़ोर हिस्सों का इस्तेमाल पार्टी के भीतर अपने विरोधियों को सबक सिखाने के लिए करते हैं.

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