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मायावती के आगे सबने मानी हार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की जीत ने राज्य के सभी राजनीतिक दलों को तगड़ा झटका दिया है. हो सकता है कि सबने अपेक्षा की होगी कि मायावती की पार्टी आगे रहेगी लेकिन वह अकेले अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में पहुँच जाएँगीं यह किसी की कल्पना में नहीं था. शाम होते-होते तक सभी राजनीतिक दलों ने सच्चाई को स्वीकार कर लिया और अपनी हार मान ली है. यह और बात है कि निवर्तमान मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अपनी हार स्वीकार करते हुए इस दोष चुनाव आयोग पर मढ़ दिया. उल्लेखनीय है कि 403 सीटों वाली उत्तरप्रदेश विधानसभा में बहुजन समाज पार्टी ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है. वहाँ भारतीय जनता पार्टी को पिछले चुनावों में 93 सीटें मिली थीं लेकिन इस बार वह सिर्फ़ 51 सीटों पर सिमट गई है. पार्टी ने स्वीकार किया है कि चुनाव में हार के पीछे रणनीति में खामियाँ रही हैं. लेकिन राजनाथ सिंह ने कहा कि इसकी एक और वजह है, "प्रदेश की जनता जोड़तोड़ की सरकार देखकर उकता चुकी थी और इस बार उसने किसी एक पार्टी को मत देने का मन बना लिया था." उत्तर प्रदेश में इतनी करारी हार की कल्पना शायद राजनाथ सिंह को भी नहीं रही होगी. हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा है कि यदि पार्टी ने उनकी रणनीति को स्वीकार कर लिया होता तो कुछ सीटें और मिल जातीं. उनका कहना था कि पार्टी को सभी विधायकों को फिर से टिकट नहीं दी जानी चाहिए थी. सपा की हार दूसरे विपक्षी दलों को देखें तो वे इस बात से ख़ुश लग रहे थे कि समाजवादी पार्टी हार गई. राहुल गाँधी का जादू नहीं चला इस पर चिंता से ज़्यादा कांग्रेस को तसल्ली है कि मुलायम सिंह का शासन तो ख़त्म हुआ. कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी कहते हैं, "मतदाताओं ने समाजवादी पार्टी सरकार के कुशासन और जनहित के ख़िलाफ़ नीतियों को नकार दिया है और ख़ुशी है कि राज्य में जनता ने साम्प्रदायिक पार्टी बीजेपी को नकार दिया है." उन्होंने कहा कि मतदाताओं ने कांग्रेस को विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है.
वैसे कांग्रेस के एक और नेता कपिल सिब्बल ने भी इसे मायावती की जीत से ज़्यादा मुलायम सिंह की हार कहना उचित समझा. उनका कहना था कि मतदाताओं के सामने एक ही लक्ष्य था कि किसी भी तरह समाजवादी पार्टी को हराया जाए और इसके लिए मतदाताओं ने बसपा को विकल्प के रुप में देखा. वैसे कांग्रेस के सामने अब यह सवाल होगा कि वह राहुल गाँधी के बाद वह कौन सा पत्ता उत्तरप्रदेश में आजमाए. उधर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी मायावती की जीत का स्वागत किया है. पोलित ब्यूरो की सदस्य वृंदा करात कहती हैं, "हम इन नतीजों को राज्य से सांप्रदायिक ताक़तों की समाप्ति की तरह देखते हैं." अभी राजनीतिक दलों में हार के कारणों की पड़ताल शुरु होगी और पार्टियों के भीतर आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चलेगा. लेकिन अपनी रणनीति के भरोसे जीत हासिल कर चुकीं मायावती के सामने होगी उत्तर प्रदेश की जनता की उम्मीदें और उत्तरप्रदेश जैसे राज्य को संभालना, जिसे वे मुख्यमंत्री के रुप में पहले भी तीन बार देख-समझ चुकी हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें बहुजन को स्पष्ट बहुमत11 मई, 2007 | भारत और पड़ोस नहीं चला राहुल के रोडशो का जादू11 मई, 2007 | भारत और पड़ोस उत्तर प्रदेश चुनावों के सबक11 मई, 2007 | भारत और पड़ोस जीत की खुशियाँ और हार का मातम11 मई, 2007 | भारत और पड़ोस नए समीकरण गढ़ने वाली माया11 मई, 2007 | भारत और पड़ोस 'यह भाजपा नहीं, संघ की पराजय है'11 मई, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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