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शुक्रवार, 11 मई, 2007 को 12:22 GMT तक के समाचार
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नए समीकरण गढ़ने वाली माया

मायावती
मायावती ने उत्तर प्रदेश के जातीय समीकरणों से जुड़े कई मिथकों को तोड़ा
वर्ष 1995 में जब मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं थी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने इसे 'लोकतंत्र का चमत्कार' कहा था.

'लोकतंत्र के उस चमत्कार' के 12 साल बाद एक बार फिर सत्ता मायवाती के पास आई हैं और चौथी बार ऐसा होगा जब मायावती मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगी.

दलित राजनीति के नेतृत्व करने वाली मायावती ने इस बार न सिर्फ़ दलितों और मुसलमानों की सहानुभूति हासिल की बल्कि सवर्णों को भी साथ लिया और उनकी ये रणनीति ख़ूब चली.

एक दशक से अधिक समय बाद ऐसा हुआ है कि टुकड़ों में बँटे उत्तर प्रदेश में किसी एक पार्टी ने अपने दम पर बहुमत हासिल किया है.

कांशीराम के साथ 1980 के दशक में बहुजन समाज की राजनीति करने वाली मायावती का यहाँ तक का सफ़र न सिर्फ़ उतार-चढ़ाव से भरा रहा है बल्कि भारतीय राजनीति में उनके अक्खड़पन और बिंदास छवि का भी गवाह रहा है.

कभी स्कूल में शिक्षिका रहीं मायावती ने सिविल सर्विसेज़ में जाने की सोची थी लेकिन उनका झुकाव हुआ कांशीराम की ओर जिन्होंने 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी का गठन किया था.

कांशीराम ने मायावती को राजनीति की दीक्षा दी

पार्टी कार्यकर्ताओं में 'बहनजी' के नाम से मशहूर मायावती का राजनीतिक करियर झटकों के साथ शुरू हुआ. 1985 में वे पहली बार लोकसभा उपचुनाव में खड़ी हुई लेकिन हार गईं.

वर्ष 1987 में उन्होंने हरिद्वार से अपनी क़िस्मत आज़माई लेकिन नतीजा उनके पक्ष में नहीं रहा. लेकिन उनकी पराजय का दौर ज़्यादा समय नहीं टिका. 1989 के चुनाव में उन्होंने बिजनौर से जीत हासिल की और फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

पहली बार 1995 में वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. पहले समाजवादी पार्टी के साथ सरकार बनाने वाली मायवाती रुठीं तो फिर भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा और 3 जून 1995 को पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. यह पहला मौक़ा था जब कोई दलित महिला उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थी.

प्रभु दयाल और रामरती की नौ संतानों में से दूसरी मायावती का जन्म 15 जनवरी 1956 को उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद ज़िले के बादलपुर गाँव में हुआ था.

दिल्ली विश्वविद्यालय से क़ानून और मेरठ विश्वविद्यालय से बीएड की शिक्षा प्राप्त करने वाली मायावती को राजनीति की दीक्षा बहुजन समाज पार्टी नेता कांशीराम से मिली.

दोनों पहली बार 1984 में मिले थे. तब मायावती दिल्ली प्रशासन के एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षिका थीं और दिल्ली के इंद्रपुरी इलाक़े की एक झुग्गी में रहती थीं.

मुलायम सिंह के साथ भी उन्होंने गठबंधन किया था

कांशीराम ने मायावती के तेवरों को धार दी और इस तरह वे दलित अधिकारों की एक मुखर प्रवक्ता के रूप में सामने आईं. थोड़े ही दिनों में वे बहुजन समाज पार्टी में दूसरी सबसे महत्वपूर्ण शख़्सियत बन गईं.

वर्ष 1995 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कमान संभालने के बाद मायावती पर सिद्धांतविहीन राजनीति का आरोप लगा. इसलिए कि उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के साथ समझौता किया.

लेकिन मायावती ने स्पष्ट किया कि वे दलितों को सत्ता में भागीदारी दिलाने के लिए कुछ भी करेंगी. भारतीय जनता पार्टी से उन्होंने एक नहीं दो-दो बार समझौता किया. समझौता हुआ और टूटा भी. मायावती का मोह बना और मोह टूटा भी.

लेकिन उनकी राजनीति की आँच कम नहीं हुई. एक बार उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने के बाद मायावती का राज्य की राजनीति और केंद्र की राजनीति में दख़ल कम नहीं हुआ.

राजनीति के उस दौर में मायावती की छवि सवर्णों की धुर विरोधी की रही. उस दौरान उनकी पार्टी का प्रमुख नारा था- तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार.

कांशीराम के सक्रिय राजनीति से अलग होने के बाद रणनीति बनाने के मामले में भी मायावती अकेले पड़ गई. गाहे-बगाहे जीते हुए पार्टी विधायकों के टूट कर विरोधी ख़ेमे में जाने से भी मायावती को काफ़ी नुक़सान हुआ.

तीन बार मुख्यमंत्री बनीं मायावती का कार्यकाल डेढ़ साल का भी नहीं रहा था. ऊपर से भ्रष्टाचार और पार्टी चंदा के नाम पर अपने विधायकों से पैसा उगाही जैसे आरोपों से मायावती का ग्राफ़ तेज़ी से नीचे गिरा.

कल्याण सिंह के साथ भी मायावती ने गठजोड़ किया था

वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने भाँप लिया था कि सिर्फ़ दलितों की राजनीति के बल पर वे सत्ता का स्वाद ज़्यादा दिनों तक नहीं चख सकती.

उस साल उन्होंने सवर्णों को रिझाने की कोशिश की और नारा दिया- हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु-महेश है. बीजेपी के साथ तालमेल किया और सरकार बनाने में सफल रहीं.

लेकिन तीन मई 2002 से 29 अगस्त 2003 तक सत्ता में रहने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिर भूचाल आया. मायावती की सरकार गई, राष्ट्रपति शासन लगा, कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने लेकिन फिर विधायकों की संख्या में बाज़ी मारी मुलायम सिंह ने और सरकार बनीं.

पद छोड़ने के बाद मायावती के ख़िलाफ़ आरोपों का पिटारा खुला. भ्रष्टाचार के मामले में उनके घर छापे पड़े, संपत्ति की जाँच शुरू हुई और ताज कोरीडोर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जाँच का आदेश दिया.

पार्टी के विधायक टूट कर समाजवादी पार्टी के साथ चले गए. मायावती का ग्राफ़ फिर नीचे गिरा. इस साल विधानसभा चुनाव में मायावती ने सवर्णों को साथ लेकर चलने की रणनीति को और विस्तार दिया.

वे खुल कर सवर्णों के साथ आईं, रैली की और बड़ी संख्या में उन्हें टिकट भी दिया. नतीजा सामने हैं- मायावती विजेता बन कर सामने आई हैं और इस बार लगता है कि अपने दम पर वो सरकार बनाएँगी और शायद पाँच साल का कार्यकाल भी पूरा करेंगी.

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