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क्या यह मनमोहन-सोनिया की हार है? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने जिस तरह से सरकार के कार्यकाल पूरा करने की बात कही है उससे ज़ाहिर होता है कि भारत-अमरीका परमाणु समझौते पर यूपीए सरकार का रुख़ बदल गया है. इस बदले रूख़ से सरकार का संकट तो टल गया है पर कई और सवालों ने कांग्रेस पार्टी और सरकार को घेर लिया है. इन सवालों मे दो महत्वपूर्ण सवाल हैं, पहला सवाल यह कि प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह के लिए लिये अब चेहरा छिपाने की स्थिति पैदा नही हो गई है? क्योंकि मनमोहन सिंह भारत-अमरीका परमाणु समझौते पर सरकार को दाँव पर लगाने के लिये तैयार थे और इस पर उन्होने वामदलों को खुली चुनौती भी दे डाली थी. भारत अमरिका परमाणु समझौते को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक तरह से अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था, लेकिन अब उन्हे एक तरह से वामदलों के सामने मत्था टेकने के लिए मजबूर कर दिया गया है. तो उनके मन मे क्या चल रहा होगा? इतना सब होने के बाद क्या वो प्रधानमंत्री बने रहना चाहेगें? और दूसरा सवाल यह कि कांग्रेस पार्टी, जो चुनाव के लिए तैयार होने का दावा कर रही थी, वो अब लोगों के बीच जाकर क्या कहेगी? 'टेलीग्राफ़' अख़बार की संपादक मानिनी चटर्जी का कहना है कि शायद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी मनमोहनसिंह को प्रधानमंत्री बने रहने के लिए राज़ी करने मे कामयाब रही हैं. वे कहती हैं, "यह आशंका थी कि अगर सरकार भारत-अमरीका परमाणु समझौते से पीछे हटती है तो प्रधानमंत्री इस्तीफ़ा दे सकते हैं, लेकिन लगता है कि सोनिया गाँधी ने उन्हें मना लिया है. कल प्रधानमंत्री ने जिस दार्शनिक अंदाज़ में कहा कि कुछ निराशाओं के बावजूद जीवन चलता रहता है, उससे लगता है कि शायद वे प्रधानमंत्री बने रहें." दूसरे सवाल पर मानिनी चटर्जी और अन्य जानकारों का कहना था कि कांग्रेस पार्टी का एक बड़ा तबका तो कभी भी मध्यावधि चुनाव चाहता ही नहीं था, उस पर सेतुसमुद्रम मामले पर दायर हलफ़नामे से बीजेपी को मिले मुद्दे ने उन्हें और हिला दिया. इसके अलावा यूपीए के घटक दलों के दो बड़े नेताओं, लालूप्रसाद यादव और शरद पवार ने सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस पर दबाव बढ़ाने मे अहम भूमिका निभाई. तो क्या भारत-अमरीका परमाणु समझौते पर सरकार को पीछे हटने के लिये मजबूर कर देने के बाद वामदल इसे अपनी जीत के तौर पर जनता के बीच पेश करेगें, इस पर मानीनी कहती हैं, "वामदल सरकार को शर्मिंदा नहीं करेंगे. वामदल कहेंगे कि गठबंधन के सामने एक जटिल मुद्दा आया था और उसे बातचीत से सुलझा लिया गया है." मानिनी चटर्जी के तर्क मे दम नज़र आता है. लेकिन जब सरकार को बाहर से समर्थन दे रही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी से बीबीसी ने सरकार के नए रूख पर प्रतिक्रिया मांगी तो उन्होंने कहा, "हमसे सरकार को कभी ख़तरा नहीं था. हमारी राय थी कि प्रधानमंत्री और सरकार परमाणु समझौते पर आगे न बढ़े. अगर सरकार आगे नहीं बढ़ती तो उसे कोई ख़तरा नहीं है." तो वामदल सरकार को इस मुद्दे पर शर्मिंदा करने की फ़िराक में नही हैं, पर इस बात मे कोई संदेह नही है कि संदेश यही गया है कि वामदलों के दबाव के सामने सरकार झुक गई. और ना सिर्फ़ प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह बल्कि यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी नीचा देखना पड़ा है. | इससे जुड़ी ख़बरें परमाणु समझौते पर बैठक फिर बेनतीजा09 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'परमाणु समझौता हितों के ख़िलाफ़'08 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस सोनिया के बयान से भड़के वामपंथी08 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'विकास के दुश्मन हैं क़रार के विरोधी'07 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'यूपीए सरकार अमरीकी दबाव में है'07 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस परमाणु मामले पर बैठक बेनतीजा19 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस परमाणु समझौता मंज़ूर नहीं:वाम दल18 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस परमाणु सहमति का मसौदा सार्वजनिक03 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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