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तीन पीढ़ियों वाली पीपीपी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) की स्थापना लाहौर में वर्ष 1967 के 30 नवंबर से एक दिसंबर तक आयोजित सम्मेलन में की गई थी. ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो पार्टी के पहले अध्यक्ष बनाए गए थे. उद्देश्य पीपीपी की स्थापना देश में समतावादी लोकतंत्र की स्थापना को लिए की गई थी. जनरल अयूब ख़ान की तानाशाही के ख़िलाफ़ लड़ाई को पीपीपी ने अपना तात्कालिक लक्ष्य बनाया. स्थापना के समय पार्टी ने कहा था कि 'हमारा इस्लाम पर विश्वास है, हम लोकतंत्र की राजनीति करेंगे, हमारी अर्थव्यवस्था समाजवादी होगी और सभी शक्तियां लोगों के लिए होंगी.' पीपीपी ने लोगों से सामंतवाद के ख़ात्मे का वायदा किया था. लोकप्रियता स्थापना के बाद पीपीपी का जनाधार मज़दूरों, किसानों और छात्रों में काफ़ी बढ़ गया था. सफलता मार्च 1969 में अयूब खान के इस्तीफ़े के बाद दिसंबर 1970 में हुए आम चुनाव में पीपीपी ने हिस्सा लिया. पार्टी ने यह चुनाव रोटी, कपड़ा और मकान के मुद्दे पर लड़ा. चुनाव में उसे ज़बरदस्त सफलता मिली. उसे पश्चिम पाकिस्तान में 138 में से 81 सीटें हासिल हुईं. इस चुनाव में पीपीपी पूर्वी पाकिस्तान की अवामी लीग के बाद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. प्रांतीय असेंबलियों के चुनाव में उसे सिंध प्रांत में बहुमत मिला. सेना की हार के बाद 1971 में पाकिस्तानी सेना को भारतीय सेना से मिली हार के बाद ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो मार्शल लॉ के जारी रहते हुए राष्ट्रपति बने. उनका शासन काल 1971 से 1977 तक रहा. भूट्टो को फांसी सैनिक शासकों ने उन पर ह्त्या का एक आरोप लगाया और चार अप्रैल 1979 को उन्हें फांसी दे दी. 1977 में ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की बेगम को पीपीपी का कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया. जिसके बाद पार्टी ने अपना संघर्ष जारी रखा. इस दौरान पार्टी की कमान बेगम नुसरत भुट्टो और उनकी पुत्री बेनज़ीर भुट्टो के हाथ में रही. बेनज़ीर का उदय बेनज़ीर भुट्टो ने पीपीपी को संगठित कर लोकतंत्र के लिए संघर्ष शुरू किया. अगस्त 1988 में जनरल ज़िया उल हक़ की एक विमान हादसे में मौत के बाद उनके कई समर्थक पीपीपी में शामिल हो गए. नवंबर 1988 में हुए चुनाव में पीपीपी ने ज़बरदस्त सफ़तला हासिल की. उसे नेशनल असेंबली की 207 में से 92 सीटें हासिल हुईं. मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) और कुछ छोटी पीर्टियों के सहयोग से ब़ेनज़ीर भूट्टो ने सरकार बनाई. जिसे राष्ट्रपति गुलाम इशहाक़ खान ने छह अगस्त 1990 को बर्ख़ास्त कर दिया. 24 अक्तूबर 1990 को हुए चुनाव में पीपीपी को हार का मुंह देखना पड़ा. इस चुनाव में उसे 46 सीटें हासिल हुईं. फिर बनी सरकार 1993 में नवाज़ शऱीफ़ की सरकार के बर्ख़ास्तगी के बाद एक बार फिर पीपीपी की सत्ता में वापसी हुई. बेनज़ीर भूट्टो दूसरी बार देश की प्रधानमंत्री बनीं. उन्होंने 1996 तक शासन किया. लोकप्रियता 2002 में सैनिक शासन के तहत हुए आम चुनाव में पीपीपी को सबसे अधिक मत मिले थे. जिसके बाद उसे सरकार बनाने का न्योता मिला, जिसे पीपीपी ने ख़ारिज कर दिया. बिलावल को कमान 27 दिसंबर 2007 को बेनज़ीर भुट्टो की हत्या के बाद पीपीपी की कमान उनके पुत्र बिलावल भूट्टो ज़रदारी को सौंपी गई है. |
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