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सोमवार, 01 अक्तूबर, 2007 को 10:57 GMT तक के समाचार
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पाकिस्तान से जुड़े कुछ सवाल-जवाब
मुशरर्फ़
अगर वर्ष 2007 की बात करे तो पाकिस्तान का राजनीतिक संकट लगातार गहराया है.

परवेज़ मुशर्रफ़ राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष के पद पर बरकरार हैं तो पूर्व प्रधानमंत्रियों नवाज़ शरीफ़ और बेनज़ीर भुट्टो भी सत्ता में लौटने की कोशिशें करते रहे हैं.

पाकिस्तान से जुड़े कुछ अहम सवालों के जवाब:

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पाकिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव प्रणाली कैसे काम करती है?

राष्ट्रपति का चुनाव राष्ट्रीय संसद और पाकिस्तान के चार प्रांतों की एसेंबलियाँ करती हैं-पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत.

क्या राष्ट्रपति मुशर्रफ़ सेना अध्यक्ष के पद से इस्तीफ़ा देने की बात पर गंभीर हैं?

राजनीतिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि परवेज़ मुशर्रफ़ पहले कई बार अपने वादों से मुकर चुके हैं.

वर्ष 2002 में चुनाव के बाद, राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने छह पार्टियों के धार्मिक गठबंधन एमएमए से बातचीत की ताकि देश पर शासन के लिए जो संवैधानिक संशोधन की ज़रूरत थी, उसे वे पार्टियों की मदद से करवा सकें.

बदले में उन्होंने वादा किया कि वो दिसंबर 2004 में सेना अध्यक्ष का पद छोड़ देंगे.

संविधान में संशोधन हो गया लेकिन बाद में उन्होंने संसद में सामान्य बहुमत के ज़रिए ये बात मंज़ूर करवा ली कि दो सेनाध्यक्ष और राष्ट्रपति दोनों पदों पर बने रहें.

आलोचकों का कहना है कि ये दूसरी बार है जब परवेज़ मुशर्रफ़ अपनी बात से मुकर गए. इससे पहले चुनी हुई सरकार का तख़्तापल्ट कर उन्होंने सेना की शपथ को तोड़ा था.

उनका अंतिम फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट के रुख़ पर निर्भर करेगा कि वो राष्ट्रपति पद से जुड़े क़ानूनों को लेकर क्या रवैया अपनाता है.

अगर मुशर्रफ़ सेना छोड़ देते हैं तो क्या उनकी स्थिति कमज़ोर हो जाएगी?

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ का जितना भी प्रभाव है, वो ज़्यादातर सेना के चलते है. और पाकिस्तान में सेना का प्रभाव काफ़ी ज़्यादा है.

चूँकि मुशर्रफ़ राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष दोनों है, तो देश की प्रणाली के कर्ता-धर्ता वही हैं. कहने को तो पाकिस्तान संसदीय प्रणाली है लेकिन असल में देखा जाए तो इसी राष्ट्रपति ही चलाते हैं.

अगर वे सेना छोड़ देते हैं, तो भी मुशर्रफ़ के पास संविधान के तहत ये शक्ति होगी कि वे सेना प्रमुख, प्रांत के गवर्नर को नियुक्त कर सकते हैं या फिर संसद या सरकार को बर्ख़ास्त कर सकते हैं.

लेकिन वे सत्ता के अंतिम केंद्र नहीं रह जाएँगे और अगर कोई लोकप्रिय नेता प्रधानमंत्री चुना जाता है तो मुशर्रफ़ का प्रभाव और कम हो सकता है.

पाकिस्तान में आगे क्या हो सकता है?

परवेज़ मुशर्रफ़ ने स्पष्ट कर दिया है कि वे वर्तमान एसेंबली के ज़रिए फिर से निर्वाचित होने की कोशिश करेंगे. चुनाव आयोग का कहना है कि राष्ट्रपति चुनाव छह अक्तूबर को होगा. माना जा रहा है कि उन्हें कोई ख़ास चुनौती नहीं मिलेगी.

मुशर्रफ़ के वकीलों का कहना है कि राष्ट्रपति पद की शपथ लेने से पहले वे सेना अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे देंगे. लेकिन उनके विरोधी सुप्रीम कोर्ट में मुशर्रफ़ की योजना को चुनौती दे रहे हैं.

पाकिस्तान में संसदीय चुनाव मध्य नंवबर तक घोषित किए जाने है और मध्य-जनवरी तक होने है.

बेनज़ीर भुट्टो ने भी 18 अक्तूबर को पाकिस्तान लौटने की घोषणा की है. ये घोषणा उन्होंने नवाज़ शरीफ़ की वतन वापसी की कोशिशों के कुछ दिन बाद की है.

नवाज़ शरीफ़ को पाकिस्तान पहुंचने के चंद घंटे बाद ही फिर से निर्वासित कर दिया गया था. उनके वकीलों ने निर्वासन के फ़ैसले को चुनौती दी है.

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के सामने चुनौती कितनी गंभीर है?

नवाज़ शरीफ़ को पाकिस्तान लौटने की अनुमति देने का सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला परवेज़ मुशर्रफ़ के लिए बड़ा झटका था. आलोचकों का कहना है कि मुशर्रफ़ लगातार अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं.

इससे पहले जुलाई में कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिख़ार चौधरी के निलंबन को अवैध करार दिया था. कोर्ट का कहना था कि परवेज़ मुशर्रफ़ द्वारा जस्टिस चौधरी को निलंबित करना अवैध फ़ैसला था.

इसके बाद लाल मस्जिद अभियान से मुशर्रफ़ ने कई इस्लामिक गुटों को नाराज़ कर दिया. मुशर्रफ़ ने लाल मस्जिद पर हमले की अनुमति दी जिसमें 100 से ज़्यादा लोग मारे गए. उसके बाद से पाकिस्तान में आत्मघाती हमलों में बढ़ोत्तरी हुई है.

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के दोबारा चुने जाने के आसार कितने हैं?

मुख्य न्यायाधीश के साथ टकराव के बाद देश में धर्मनिरपेक्ष धार्मिक पार्टियों और वकील एक साथ आ खड़े हुए हैं. ये लोग चाहते हैं कि मुशर्रफ़ सत्ता छोड़ दें.

राष्ट्रपति का चुनाव राष्ट्रीय संसद और प्रांतीय एसंबेलियाँ करती हैं. माना जा रहा है कि संसदीय और प्रांतीय चुनाव में मुशर्रफ़ के प्रति समर्थन काफ़ी घटेगा. इसलिए मुशर्रफ़ चाहते हैं कि राष्ट्रपति चुनाव पहले हो जाएँ.

ये भी कहा जाता रहा है कि वे बेनज़ीर भुट्टो के साथ सत्ता में साझेदारी को लेकर समझौते पर भी काम कर रहे थे.

बेनज़ीर भुट्टो का कहना है कि जब तक मुशर्रफ़ सेनाध्यक्ष हैं, तब तक वे मुशर्रफ़ का साथ नहीं देंगीं.

आख़िकार क्या होगा?

विशलेषकों का कहना है कि कुछ भी कहना मुश्किल है-कई स्थितियाँ उभर कर आ सकती हैं.

कुछ पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगर ऐसे लगेगा कि जनरल मुशर्रफ़ चुनाव हार जाएँगे, तो सेना के लोग उन्हें बाहर करने की कोशिश कर सकते हैं और उनकी जगह किसी दूसरे सैन्य उम्मीदवार को उतार सकते हैं.

कुछ का कहना ये भी है कि पाकिस्तान में चरमपंथियों की बढ़ती गतिविधियाँ मुशर्रफ़ को एक मौका दे सकती हैं कि वो आपातकाल घोषित कर दें और चुनाव रद्द कर दें.

पश्चिमी देशों में भी स्थिति पर नज़र रखी जा रही है. भारत भी स्थिति पर नज़र रखे हुए है जिसके साथ शांति वार्ता चल रही है.

कट्टरपंथियों की ओर से पाकिस्तान में मुशर्रफ़ की जान को ख़तरा है. उन पर पहले भी कई बार हमले हो चुके हैं.

परवेज़ मुशर्रफ़सियासतदाँ कमांडो
परवेज़ मुशर्रफ़ सेना के साथ-साथ सियासत में भी माहिर साबित हुए हैं.
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