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शादियों में हुई बारातियों की किल्लत

बाराती
दूल्हों की जगह बारातियों की मनुहार करनी पड़ रही है
राजस्थान के बीकानेर में मंगलवार को एक साथ इतने युवक युवतियों की शादी हो रही है कि बारातियों की किल्लत हो गई है और शादी के आयोजकों को मुनादी करानी पड़ी कि वो बाराती उपलब्ध कराने में असमर्थ हैं.

बीकानेर के पुष्करणा ब्राह्मण समाज में ‘पुष्करणा सावा’ बहुत पुरानी परंपरा है, जिसके तहत प्रति चार वर्ष में विवाह ओलंपिक आयोजित किया जाता रहा है.

समय के साथ अब यह सामूहिक विवाह समारोह हर दो वर्ष में आयोजित किया जाने लगा है. इसमें देशभर से पुष्करणा समाज के लोग पहुँचते हैं.

सैकड़ों की संख्या में होने वाली इन शादियों में बारातियों की बढ़ती माँग से परेशान कुछ आयोजकों ने वहाँ सूचना लगा दी है कि बाराती माँग कर शर्मिंदा ना करें.

 विवाह संपन्न कराने में पंडितों की संख्या कम पड़ गई है, लिहाज़ा बच्चों को इस काम में प्रशिक्षित किया जा रहा है
छोटेलाल पंडित

बीकानेर में पुष्करणा युवा शक्ति मंच के अध्यक्ष प्रहलाद ओझा ने बीबीसी से बताया कि हर दूल्हे की इच्छा रहती है कि उसकी बारात में 40 से 50 बाराती हो और दावत में भी भाग ले. लेकिन जब 500 से ज़्यादा शादियाँ होने वाली है, ऐसे में बाराती जुटाना मुश्किल हो गया है.

ओझा कहते हैं अभी दूल्हे राजा से ज़्यादा बाराती की मान-मनुहार हो रही है.

बाराती
एक एक आदमी कई दूल्हों की बारात में शिरकत करता है

सादगी से शादी

बीकानेर में इस वैवाहिक आयोजन के लिए भवन, होटलें, रसोईए, घोड़ी, बैंड बाजे और पंडित बुक हो चुके हैं.

समझदार लोगों ने बाराती भी अग्रिम बुक करा लिए हैं. विवाह आयोजन में व्यस्त पंडित छोटेलाल कहते हैं,‘‘विवाह संपन्न कराने में पंडितों की संख्या कम पड़ गई है, लिहाज़ा बच्चों को इस काम में प्रशिक्षित किया जा रहा है.’’

आयोजकों के अनुसार ये विवाह कम ख़र्च, आडंबर रहित और सामूहिकता के भाव से आयोजित किए जाते हैं.

प्रहलाद ओझा कहते हैं,‘‘सगाई में कुंकुम-तिलक और शंखनाद के साथ विवाह की रस्म पूरी कर ली जाती है. हालाँकि आधुनिकता का थोड़ा प्रभाव आने लगा है. लेकिन यह बाकी समाजों से बहुत कम है.’’

ओझा के मुताबिक यह पुस्करणा सावा की परंपरा 1400 साल पुरानी है. लेकिन बीकानेर में सैंकड़ों वर्ष से ये सामूहिक विवाह आयोजित किए जा रहे हैं. यह अपनी संस्कृति को बचाए रखने का प्रयास भी है.

बीकानेर शहर में विभिन्न समाजों के लोग भी आयोजन में मदद करने में जुट जाते हैं. माली समाज की पुष्पा खड़गावत पार्षद रही हैं.

पुष्पा कहती हैं ' हम सभी प्रकार की व्यवस्था में हाथ बंटाते हैं. इन विवाहों में हमारी संस्कृति और समूह परंपरा परिलक्षित होती है. जन सहकार की भावना का अंदाज़ इसी से लगाया जा सकता है कि मिष्ठान भंडार रियायती दर पर मिठाई बेच रहे हैं.'

पूरा शहर उत्सव मुद्रा में है. वहाँ लोगों के लिए ये विवाह समारोह अपनी परंपरा के निर्वहन का मौक़ा है. भारत के इस भाग में विवाह एक पवित्र अनुष्ठान है, बड़े शहरों की तरह उद्यम नहीं.

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