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सोमवार, 22 जनवरी, 2007 को 16:51 GMT तक के समाचार
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दुल्हनों की जोड़ी निकली लेकर घोड़ी

इन दुल्हनों को देखने के लिए भारी भीड़ जमा हो गई
भारत में शादी-विवाह के समारोह में दूल्हे का घोड़ी पर सवार होकर निकलना आम बात है लेकिन जयपुर में दो जुड़वाँ बहनें अपनी शादी के अवसर पर निकाली जाने वाली 'बिंदौरी' में घोड़ी पर सवार होकर निकलीं और मंदिर में भगवान का आशीर्वाद लिया.

दुल्हन के माता-पिता ने कहा कि वो अपनी बेटियों के इस क़दम से बेहद ख़ुश हैं.

वहीं पंडितों का कहना है कि शास्त्रों में दुल्हन के घोड़ी पर बैठने की कोई बंदिश नहीं है.

मांगलिक गीतों की गूँज और बैंड-बाजों की धुन के बीच जयपुर में लक्ष्मी और लता शर्मा दुल्हन के कपड़े पहन कर घोड़ी पर निकलीं तो सब कुछ जैसे ठहर सा गया.

 महिलाएँ आज बहुत तरक्की कर रही हैं. फिर हम क्यों पीछे रहें. हमारे यहाँ लड़का-लड़की बराबर है.कोई भेद-भाव नहीं है
लक्ष्मी, दुल्हन

किसी ने इस नज़ारे को कौतहूल से देखा तो कोई नारी के इस रूप को सलाम करता नज़र आया.

उत्तर भारत में कई जगह शादी के समय अदा की जाने वाली 'बिंदौरी' रस्म के लिए दोनों बहनें घोड़ी पर बैठकर धूम-धाम से निकलीं.

आत्मविश्वास से भरी लक्ष्मी कहती हैं," महिलाएँ आज बहुत तरक्की कर रही हैं. फिर हम क्यों पीछे रहें. हमारे यहाँ लड़का-लड़की बराबर है.कोई भेद-भाव नहीं है.

बदलाव

अपनी बेटियों के इस प्रयास पर अभीभूत होकर रामेश्वर उपाध्याय कहते हैं," वे मेवाड़ अंचल से आते हैं. जहाँ पहले भी ऐसी परंपरा रही है. औरतों के लिए आरक्षण की बात कही जा रही है, अधिकारों की बात की जा रही है. ऐसे में लड़का-लड़की में कोई फर्क नहीं करना चाहिए."

दुल्हन बनी उपाध्याय परिवार की लता शर्मा कहती हैं," इसमें यह संदेश निहित है कि हमारे यहाँ लड़के-लड़कियों में कोई भेद-भाव नहीं है. माँ-बाप ने हमें बेटों की तरह पाला है. समाज को अब संकीर्ण विचारों को तिलांजलि देनी चाहिए."

शास्त्रों के जानकार जयपुर के सतीश शर्मा कहते हैं,"शास्त्रों के अनुसार दुल्हन के घोड़ी पर बैठने पर कोई प्रतिबंध नहीं है. हाँलाकि यह माना गया है कि दूल्हा इस समय विशेष के दौरान राजा है. लेकिन महिलाओं के घोड़ी पर बैठने पर निषेध नहीं है."

वक़्त बदल रहा है. मर्दों ने जब परंपराओं की पोथी लिखी तो उसमें पुरुषों के हित ऊपर रखे गए.

लेकिन लता और लक्ष्मी तो ख़ुद क़ानून की विद्यार्थी हैं. वे औरतों की आजादी की कहानी अपने हाथों लिखना चाहती हैं क्योंकि वे अपनी उड़ान परों से नहीं बल्कि हौसलों से तय करना चाहती हैं.

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