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अब शादी का पंजीकरण होगा आवश्यक | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से कहा है कि वे तीन महीनों के भीतर क़ानून बनाएँ जिसमें शादी का रजिस्ट्रेशन यानी पंजीकरण करवाना ज़रुरी हो. सुप्रीम कोर्ट में इस बारे में एक जनहित याचिका दायर की गई थी और इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय महिला आयोग की राय माँगी थी. महिला आयोग ने इसका समर्थन करते हुए एक विधेयक बनाकर भी सुप्रीम कोर्ट को दे दिया था. इसमें कहा गया है कि विवाह के रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य कर दिया जाता है तो इससे बाल विवाह या कम उम्र में विवाह और महिलाओं के कई स्तर पर होने वाले शोषण को रोका जा सकता है. अब तक भारत में विवाह विभिन्न धर्मों और सामाजिक परंपराओं के अनुसार होते आए हैं और इसे अदालतें मान्यता देती आई हैं. वैसे तो देश में जन्म और मृत्यु का रजिस्ट्रेशन भी अनिवार्य किए हुए कई बरस बीत गए लेकिन इसका पालन अभी भी नहीं हो पा रहा है. ऐसे में यह क़ानून कितना कारगर होगा इसे लेकर अभी से सवाल उठाए जा रहे हैं. फ़ैसला न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत और न्यायमूर्ति एसएच कपाड़िया के एक पीठ ने केंद्र और राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर एक क़ानून बनाने का निर्देश देते हुए उनकी राय भी माँगी है. मंगलवार को दिए गए इस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि इस क़ानून को लागू करने से पहले लोगों की आपत्तियाँ सुनी जानी चाहिए. आपत्ति सुनकर उन्हें निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक महीने का समय दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकार को क़ानून बनाते वक़्त झूठे शपथ पत्रों के ख़िलाफ़ भी कड़े प्रावधान करने चाहिए. महिला आयोग का मत राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास ने बीबीसी से हुई बातचीत में इस फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे महिलाओं को लाभ होगा.
उन्होंने कहा कि इससे बाल विवाह पर तो रोक लगाई जा सकेगी साथ ही उन विधवाओं को भी लाभ होगा जो सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधाओं से वंचित रह जाती हैं. इस सवाल पर कि इसे लागू करवाना व्यावहारिक रुप से कितना संभव होगा, उन्होंने कहा, "आयोग ने अपनी ओर से जिस क़ानून का प्रस्ताव रखा है उसे अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग से चर्चा करके बनाया गया है और हमें नहीं लगता कि इसे लागू करने में किसी को आपत्ति होगी या कोई दिक़्क़त होगी." उन्होंने कहा कि प्रस्तावित विधेयक में जो प्रावधान किया गया है उसके मुताबिक़ पंचायत के स्तर पर विवाह का रजिस्ट्रेशन हो सकेगा इसलिए किसी को भी कोई परेशानी नहीं होगी. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि अब आयोग की ओर से केंद्र सरकार से अनुरोध किया जाएगा कि वो यथाशीघ्र इस क़ानून को पारित करे. | इससे जुड़ी ख़बरें 'महिलाएँ शराब पेश कर सकती हैं'13 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस महिला आरक्षण पर यूपीए में ही मतभेद 22 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस बेटियों को अधिकार देने पर प्रगति17 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस बाल विवाह रोकने की 'सज़ा'11 मई, 2005 | भारत और पड़ोस महिलाएँ भी नाइट शिफ़्ट कर सकेंगी29 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस छत्तीसगढ़ में परंपरा के नाम पर बाल विवाह24 अप्रैल, 2004 | भारत और पड़ोस लड़कियों के लिए क़ानून पर विवाद07 मार्च, 2004 | भारत और पड़ोस सामूहिक विवाहों का बढ़ता चलन19 फ़रवरी, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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