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लोकप्रियता खो रहा है दूल्हों का मेला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजस्थान के पुष्कर में ऊँटों के मेले और सोनपुर में पशुओं के मेले की तर्ज़ पर बिहार के मधुबनी ज़िले में दूल्हों का एक मेला लगता है, हालाँकि स्थानीय लोग इसे “मेला” कहने पर नाराज़ हो जाते हैं. मधुबनी ज़िले के सौराठ नामक स्थान पर मैथिल ब्राह्मणों का अनोखा मेला लगता है जिसमें विवाह योग्य वर वधुओं की तलाश में इकट्ठे होते हैं. इसे मेला तो नहीं बल्कि सौराठ सभा के नाम से जाना जाता है जो बरगद के पेड़ों के नीचे 22 बीघा ज़मीन पर लगता है. योग्य वर अपने अपने पिता व अन्य अभिभावकों के साथ आते हैं और चादर बिछाकर बैठते हैं. कन्या पक्ष की ओर से आकर लोग वरों का इंटरव्यू करते हैं और उन्हें पसंद करते हैं. क़रीब दो दशक पहले सौराठ में अच्छी ख़ासी भीड़ होती थी पर अब इसका अस्तित्व ख़त्म होता दिख रहा है. मैथिल ब्राह्णणों की इस परंपरा का निर्वाह करने को युवा वर्ग तैयार नहीं दिखता. हर साल आषाढ़ में आयोजित होने वाली इस सभा में पारंपरिक पंजीकारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है जो शादियों की फ़िक्सिंग करवाते हैं. सात सौ साल पुरानी परंपरा सौराठ में शादियां तय करवाने वाले पंजीकार विश्वमोहन चंद्र बताते हैं, “मैथिल ब्राह्मणों ने 700 साल पहले 1310 ईस्वी में यह प्रथा शुरू की थी ताकि विवाह संबंध अच्छे कुलों के बीच तय हो सके. सन् 1971 में यहां क़रीब डेढ़ लाख लोग आये थे. 1991 में भी क़रीब पचास हज़ार लोग आए थे पर इस बार काफी कम वर आये हैं.”
इस तरह के मेले के आयोजन के पीछे कुछ वैज्ञानिक कारण भी हैं. एक ही ब्लड ग्रुप में शादी करने की सलाह डॉक्टर नहीं देते. शायद यही वजह है कि ब्राह्मण एक ही गोत्र एवं मूल में शादी नहीं करते. इनका मानना है कि अलग गोत्र में विवाह करने से संतान उत्तम होती है. और ऐसे मेले में विभिन्न गोत्रों के ब्राह्मण एक साथ मौजूद होते हैं. इसके अलावा पहले आवागमन की सुविधा नहीं होने के कारण भी मिथिलांचल के सभी ब्राह्मण एक जगह इकट्ठा हो कर शादियां तय करते थे. मेले में सिद्धांत लिखवाने का भी काम होता है. यह सिद्धांत क़ानूनी रूप से किसी भी शादी को स्वीकृति प्रदान करता है और इसे अदालतों में मान्यता प्राप्त है. इस बार ये मेला 18 जून से 27 जून तक आयोजित हुआ जिसमें भीड़ काफ़ी कम रही. इस बारे में पंजीकार विश्वमोहन चंद्र का कहते हैं, “देखिए अब लोगों को यहां से बाहर भी अच्छे वर मिल जाते हैं. लड़का-लड़की पढ़े लिखे हैं तो मिल बैठ कर फैसला कर लेते हैं, यहां आने की ज़रूरत नहीं पड़ती पर सिद्धांत लिखवाने का काम जारी है. इस बार यहां क़रीब ढाई सौ शादियां फ़िक्स हुईं और क़रीब दो हज़ार सिद्धांत लिखे गये.” सौराठ सभा या मेले का नाम महाराष्ट्र के सौराष्ट्र से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि मुगलों के आक्रमण के दौरान 12वीं सदी में सौराष्ट्र से आकर दो ब्राह्मण यहाँ बसे और उन्हीं के नाम से इसे सौराठ नाम दिया गया. सौराठ से थोड़ी दूर सोमनाथ मंदिर की अनुकृति भी है. बुरी हालत मेले की ख़राब हालत के बारे में मेले के आयोजक चुनचुन मिश्र कहते हैं, “सरकार तो ज़िम्मेदार है ही क्योंकि सभा को अब पहले जैसी सुविधाएं यातायात, पानी और बिजली आदि नहीं दी जाती. बड़े धनी ब्राह्मण अब यहां नहीं आते. ब्राह्मण खुद भी ज़िम्मेदार हैं जो अपनी संस्कृति को बचाना नहीं चाहते.” इसके अलावा दहेज़ की समस्या ने भी मेले को प्रभावित किया है. पहले यहां कोई वर दहेज नहीं मांगता था पर अब खुलकर दहेज मांगा जाता है. इस मेले में वर की तलाश में पहुँचे रामशेखर चौधरी का कहना था, “हम अपनी लड़की की शादी गांव में लड़का खोजकर करना चाहते थे पर सभी दहेज मांगते थे. यही सोचकर यहां आये कि यहां कोई दहेज नहीं मांगेगा पर यहां एक तो अच्छे लड़के नहीं हैं, और जो ठीक हैं वो दहेज मांगते हैं. कारण चाहे जो भी हो, एक बात सच है कि वरों का यह अनूठा मेला अब अपनी चमक खो चुका है. पहले सौराठ में ब्याह होना सम्मान की बात मानी जाती थी पर अब कहा जाता है कि जिसकी शादी कहीं नहीं होती वही सौराठ में शादी करता है. इस मान-प्रतिष्ठा के चक्कर में मिथिलांचल की एक ऐतिहासिक परंपरा दम ज़रूर तोड़ रही है. |
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