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बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उड़ीसा के पुरी ज़िले के गोप गाँव में सैकड़ों लोग वह नज़ारा देखने जमा हुए जब वहाँ की महिलाओं ने एक पुराने रिवाज को न सिर्फ़ दोहराया बल्कि एक प्रतियोगिता भी की. असल में वहाँ की महिलाओं ने सोचा कि पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव की वजह से आजकल की लड़कियाँ विदाई के समय दहाड़ें मार-मार कर रोने में शर्माने लगी हैं. इसी पुरानी प्रथा को जीवित रखने के लिए एक प्रतियोगिता आयोजित की गई. जो सबसे ज़्यादा बिलख-बिलख कर रोएगी उसी के सिर पर ताज रखा जाएगा. साथ देने के लिए कुछ अधेड़ और बुज़ुर्ग महिलाएँ भी तैयार हो गईं. और फिर 18 से 60 वर्ष के बीच की आयु की बीस महिलाओं ने प्रतियोगिता में हिस्सा लेना तय किया. वे ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला कर, छाती पीट-पीट कर, दहाड़ें मार कर रोईं. मुक़ाबले में हिस्सा लेने वाली एक महिला का कहना था, हमारी माएँ और नानी-दादी इसी तरह रोती थीं. वे विदाई के गीत भी गाती थीं और रो-रो कर बयान करती थीं. अब यह प्रथा छूटती जा रही है. नई पीढ़ी को यह याद दिलाना ज़रूरी है. प्रतियोगिता में विजयी रहीं साठ साल की एक दादी जिनका कहना था, आजकल की लड़कियाँ तो विदाई के समय रोती ही नहीं हैं. उन्हें ज़बरदस्ती रुलाओ तब भी नहीं. यह मुक़ाबला देखने आए दर्शकों की प्रतिक्रिया मिलीजुली रही. कुछ का तो हँस-हँस कर बुरा हाल हो रहा था तो कुछ भावुक हो गए और ख़ुद भी रो पड़े. |
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