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एक ही दिन में 14 हज़ार शादियाँ

दुल्हन
दुल्हनो को समय पर न तो मनपसंद गहने मिले न कपड़े सिल सके
शादी ब्याह का मौसम शुरु हो जाए तो दिल्ली की जिस गली या सड़क से गुज़रें एक बारात आपको मिल ही जाएगी अमूमन यही हाल दूसरे शहरों का भी होता है.

लेकिन रविवार 28 नवंबर के दिन का मुहूर्त पंडितों ने कुछ ऐसा निकाला है कि मानों हर विवाह योग्य व्यक्ति इसी दिन शादी करना चाहता है.

एक अनुमान है कि अकेले दिल्ली शहर में रविवार को लगभग 14 हज़ार शादियाँ हो रही हैं.

हालत यह है कि जिन्होंने अपनी शादी के लिए बैंड बुक नहीं करवाया था उन्हें अब बैंड नहीं मिल रहा. लोगों को समारोह के लिए हॉल नहीं मिल रहा है, यहाँ तक कि लोगों को शादी के फेरे लगवाने के लिए पंडित नहीं मिल रहे हैं.

जो लोग शादी ब्याह से जुड़े व्यवसाय में लगे हुए हैं वे बताते हैं कि दिल्ली में तो शादी बेहद खर्चीली हो चली है और आमतौर पर एक शादी में दस लाख रुपए औसतन खर्च हो रहे हैं.

इस तरह से 28 नवंबर को ही दिल्ली की शादी में 1400 करोड़ रुपए के खर्च का अनुमान लगाया जा रहा है.

महंगाई

वैसे कई परिवारों का कहना है कि वे खर्चीली शादी नहीं करना चाहते लेकिन मजबूरी में करना पड़ रहा है.

वे करें भी तो क्या. हलवाई, बैंड वाले, घोड़ी वाले, शहनाई वाले, फूल वाले सभी ने अपनी क़ीमत इस तरह बढ़ा ली है कि आम आदमी को तो पसीना ही निकल रहा है.

 दिल्ली में जितने शामियाने थे सब बुक हो गए. अब जो मांग है उसके लिए तो दूसरे शहरों से सामान मंगाना पड़ रहा है तो खर्च तो ग्राहकों को ही उठाना पड़ेगा
अरोड़ा, शामियाने वाले

एक दूल्हे की माँ नीलम इससे परेशान हैं. वे कहती हैं, "जो बैंड पाँच हज़ार का आता है उसके लिए हम 25 हज़ार दे रहे हैं. कोई दूसरा बैंड उपलब्ध ही नहीं है."

यही हाल कैटरर्स, बस वालों और शामियाना वालों का भी है.

हालांकि ज़्यादातर लोग इस बात से इंकार करते हैं कि वे ज़्यादा पैसे वसूल कर रहे हैं लेकिन कुछ अरोड़ा जैसे लोग भी हैं जो साफ़गोई से बात करते हैं.

अरोड़ा पहाड़गंज में शामियाने का काम करते हैं. वे कहते हैं, "दिल्ली में जितना शामियाने थे सब बुक हो गए अब जो मांग हैं उसके लिए तो दूसरे शहरों से सामान मंगाना पड़ रहा है तो खर्च तो ग्राहकों को ही उठाना पड़ेगा."

परेशानी

जिनकी शादी पहले तय हो गई उनका तो ठीक है लेकिन जिनकी शादी देर से तय हुई उनको बेहद परेशानी हो रही है.

दुल्हन बनने जा रही आशू कहती हैं, "मेरी शादी दो महीने पहले तय हुई अब कोई बैक्वेट नहीं मिल रहा है. तो घर के बाहर जो गार्डन है वहीं शादी होगी."

 जो दो शरीर विवाह के बंधन में बंधकर एक आत्मा बन रहे हों तो ज़रुरी है कि शुभ नक्षत्र साथ हों और ऐसा तो शुभ मुहूर्त में ही होता है
नारायण दत्त तिवारी, पंडित कालीमंदिर

उनको समय पर कपड़े सिलकर देने वाला दर्जी नहीं मिला तो रेडीमेड कपड़े लेने पड़े. वे इस तरह की शादी के इंतज़ामों से बेहद निराश हैं.

तो क्या एक ही दिन इतनी शादियाँ होनी ज़रुरी हैं? इस सवाल पर पंडित अपने मुहूर्त वाले तर्क के बचाव में लग जाते हैं. कालीमंदिर के पुजारी नारायणदत्त तिवारी कहते हैं, "जो दो शरीर विवाह के बंधन में बंधकर एक आत्मा बन रहे हों तो ज़रुरी है कि शुभ नक्षत्र साथ हों और ऐसा तो शुभ मुहूर्त में ही होता है."

शनिवार की रात से ट्रैफ़िक जाम का जो नज़ारा था उससे और पिछले साल के अनुभव से अनुमान लगाया जा रहा है कि बारात को पहुँचने में दो-तीन घंटे की देर तो छोटी ही बात होगी.

अंदाज़ा लगाइए कि घोड़ी पर बैठे दूल्हे मियाँ का क्या होगा और दूल्हे को ढो रही घोड़ी का क्या हाल होगा.

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