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मंगलवार, 22 जून, 2004 को 16:52 GMT तक के समाचार
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घरजमाइयों ने बजाया विद्रोह का बिगुल

राभा महिलाएँ
परिवार की मालिकन महिलाएँ ही लेती हैं अहम फैसले
'नहीं अब शोषण नहीं सहेंगे, पत्नी की गुलामी नहीं करेंगे, और पतियों की तरह हमें भी अधिकार मिलने चाहिए.'

ऐसे नारे, वह भी पुरूषों की आवाज़ में आम तौर पर सुनने को नहीं मिलते, पश्चिम बंगाल और असम की सीमा पर रहने वाले राभा जनजाति के मर्द अब 'पत्नी और सास के हाथों होने वाले शोषण' के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं.

उनका यह 'शोषण' सदियों से चल रहा है क्योंकि उनकी जनजाति मातृसत्तात्मक है यानी माँ परिवार की मुखिया होती है न कि बाप, पुत्रियाँ ही माँ की संपत्ति की मालकिन होती हैं और शादी के बाद पति उनके घर रहने आते हैं.

शादी के बाद घरजमाई बनने की यह परंपरा अब राभा मर्दों को नहीं भा रही है, कुछ लोग तो अब परंपरा के अनुरूप शादी करने से ही इनकार कर रहे हैं.

लेकिन महिलाएँ अपने इस अनूठे अधिकार को छोड़ने को भला क्यों तैयार होने लगीं, परंपरा में बदलाव की पतियों की माँग का मुक़ाबला करने के लिए राभा महिलाओं ने अपनी एक अलग समिति भी बना ली है.

नौजवान राभा मर्दों के इस नए प्रयास से नाराज़ बिमला राभा कहती हैं, "होश संभालते ही अपने दादा और पिता के साथ जैसा व्यवहार देखा है, वैसा ही व्यवहार अपने पति के साथ वैसा ही कर रही हूँ."

बिमला राभा ज़ोर देकर यहाँ तक कहती हैं, "पति की नकेल तो मेरे ही हाथ में रहेगी, हमारे समाज में यही नियम है."

 पति की नकेल तो मेरे ही हाथ में रहेगी, हमारे समाज में यही नियम है
बिमला राभा

अधिकारों की इस रस्साकशी ने समुदाय के मुखिया को सांसत में डाल दिया है, उनकी समझ में नहीं आ रहा कि आख़िर किसका साथ दिया जाए.

राभा बस्ती छिपारा के सनीचर राभा कहते हैं, "पिछले कुछ वर्षों से पति परिवार का मुखिया बनने की कोशिश कर रहे हैं, बस्ती के बाहर रहने वालों के लिए तो ज़्यादा समस्या नहीं है लेकिन यहाँ भी नई पीढ़ी के मर्द ऐसी कोशिशें कर रहे हैं."

बदलाव

राभा समुदाय में बदलते वक़्त के साथ बदलाव तो आया है, उनमें प्रेम विवाह को स्वीकृति मिल गई है लेकिन यह रीत नहीं बदली है कि पति को पत्नी के घर में रहना होता है.

हर बस्ती में अनेक नौजवान ऐसे हैं जिन्होंने घरजमाई बनने से इनकार कर दिया है, इनमें से ज्यादातर नौजवान बस्ती छोड़कर शहरों में चले गए हैं, इसके बाद एक लहर-सी पैदा हो गई है और लोग इसे समुदाय के लिए ख़तरा मानने लगे हैं.

खेत में काम करते मर्द
मर्दों का कहना है कि उनका शोषण होता है

महिलाओं ने भी जमकर मोर्चा खोल दिया है, उनका कहना है कि पुरूष अगर ऐसी माँग करेंगे तो उन्हें वे सभी काम करने होंगे जो अब तक महिलाएँ करती आई हैं जिन्हें बच्चों का पालन-पोषण भी शामिल है.

महिलाओं का कहना है कि वे घर संभालती हैं इसलिए घर की मालकिन हैं अगर पति घर के मालिक बनेंगे तो उन्हें घर में रहना होगा और महिलाएँ बाहर जाएँगी.

महिलाएँ इस मामले में एकजुट हैं और उनके दबदबे की मिसाल बिमल राभा की कहानी है जिसे घरजमाई बनने पर मजबूर कर दिया गया, बिमल पहले अपनी पत्नी को घर ले आया था लेकिन बाद उसे खुद ससुराल लौटना पड़ा.

महिलाओं की समिति की बेलसरी राभा कहती हैं, "युवकों की माँग नाजायज़ है, कोई भी समाज रातोरात नहीं बदलता, इससे तो महिलाओं पर अत्याचार बढ़ेगा."

औरतों-मर्दों की इस रस्साकशी के बीच 'गुलामी की बेड़ियाँ' टूटेंगी या नहीं, यह तो कहना मुश्किल है लेकिन मुद्दे पर बहस काफ़ी दिलचस्प होती जा रही है.

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