|
कश्मीरी शादी में शाहख़र्ची पर फ़ैसला टला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कश्मीर में शादी के मौक़े पर मेहमानों को बुलाए जाने और उनकी ख़ातिरदारी के लिए तैयार किए जाने वाले लज़ीज़ खानों पर सरकारी हद लगाए जाने के मामले ने तूल पकड़ लिया है. सरकार ने उस आदेश को फिलहाल लागू नहीं करने का मन बना लिया है जिसमें लड़की की शादी में बारातियों और मेहमानों की संख्या तय कर दी गई थी और खाने की मात्रा भी निर्धारित कर दी गई थी. यह आदेश छह जून से लागू होना था लेकिन सरकार ने लोगों के विरोध को देखते हुए इसे अब एक समिति को सौंप दिया है जो नए सिरे से इस पर विचार करेगी. सरकार ने इस आदेश के लिए दलील दी थी कि इससे ग़रीब लोगों को शादी पर होने वाले भारी ख़र्च से राहत मिलेगी और उन्हें क़र्ज़ भी नहीं लेना पड़ेगा. पिछले सप्ताह घोषित किए गए इस आदेश में कहा गया कि दुल्हन की तरफ़ से 75 ज़्यादा मेहमान नहीं बुलाए जा सकते और दूल्हे वालों को अपने मेहमानों की संख्या 50 पर सीमित करनी होगी. इतना ही नहीं शादी के मौक़े पर पकाए जाने वाले गोश्त और चावल की मात्रा भी 90 किलोग्राम तक सीमित कर दी गई. ग़ौरतलब है कि कश्मीर में शादी के मौक़े पर गोश्त के बहुत से व्यंजन बनते हैं और उनमें सिर्फ़ भेड़ का गोश्त ही इस्तेमाल होता है.
कश्मीरी खानों की इस परंपरा को वाज़वान कहा जाता है और शादी में कोई भी मेहमान किसी व्यंजन को लेने से मना नहीं कर सकता, भले ही वह न खाए. इस तरह बहुत सी शादियों में महंगा खाना बर्बाद भी होता है क्योंकि अक्सर लोग सारे व्यंजन नहीं खा पाते हैं लेकिन मेज़बान को सारे व्यंजन परोसना ज़रूरी होता है. यह नया आदेश घोषित होने के बाद कुछ लोगों ने तो शादियों की तारीख़ आगे बढ़ा दी थी जबकि कुछ ने कहा था कि वे आदेश को तोड़कर शादी में परंपरा के मुताबिक़ ही वाज़वान तैयार करेंगे. किफ़ायत सरकार ने इस आदेश के लिए दलील दी थी कि इससे किफ़ायत को बढ़ावा मिलेगा.
जम्मू कश्मीर के उपभोक्ता और सार्वजनिक वितरण मामलों के मंत्री ताज मोहीउद्दीन का कहना है कि इस आदेश से इस सामाजिक बुराई को ख़त्म करने में मदद मिलेगी जिसके तहत लोग बेतहाशा ख़र्च करने पर मजबूर होते हैं. ताज मोहीउद्दीन का कहना है कि इस आदेश से गोश्त और अन्य आवश्यक वस्तुओं की क़ीमतों पर क़ाबू पाने में भी मदद मिलेगी. लेकिन कश्मीरियों ने इस आदेश को आड़े हाथों लिया और इसके लागू होने से पहले ही इसका बड़े पैमाने पर विरोध किया. प्रेस में भी इस आदेश के बारे में मंत्री की दलील को ख़ारिज कर दिया गया. एक प्रमुख अख़बार कश्मीर टाइम्स ने इस आदेश को 'विवादास्पद और अलोकप्रिय' क़रार दिया था. उर्दू दैनिक 'मशरिक' ने इसे तुग़लकशाही बताया. ज़्यादातर कश्मीरियों ने इस आदेश को अव्यवहारिक बताया. श्रीनगर में रहने वाले एक व्यक्ति मोहम्मद फ़ारूक़ का कहना था, "मेरे पाँच भाई और बहने हैं. इतने ही मेरी पत्नी के परिवार में हैं. इन दोनों परिवारों को साथ मिला लें तो 50 लोग हो जाते हैं." "अगर 50 मेहमानों की सीमा लगा दें तो हम अपने अन्य रिश्तेदारों और दोस्तों को कैसे शामिल करेंगे."
कश्मीरी लोग वाज़वान को लेकर भी बहुत भावुक हैं और उसे छोड़ने के लिए क़तई तैयार नहीं हैं. एक कश्मीरी महिला फ़रहत कहती हैं, "वाज़वान हमारी तहज़ीब का अटूट हिस्सा है और उसे क़ायम रखा जाना चाहिए." एक कॉलेज प्राध्यापक मोहम्मद अशरफ़ कहते हैं, "शादी-ब्याह एक ऐसा मौक़ा है जब रिश्तेदार और दोस्त इकट्ठे होकर मिल-जुल लेते हैं." मोहम्मद अशरफ़ कहते हैं कि वाज़वान तैयार करने से किसी भी परिवार पर बोझ नहीं पड़ता क्योंकि ज़्यादातर रिश्तेदार और दोस्त महंगे तोहफ़े और नक़दी भी देते हैं. अब सरकार ने कहा है कि इस आदेश पर बड़े पैमाने पर लोगों की राय ली जाएगी ताकि इसे लोकप्रिय अंदाज़ में और असरदार तरीक़े से लागू किया जा सके. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||