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सोमवार, 08 सितंबर, 2008 को 13:57 GMT तक के समाचार
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अल क़ायदा सबसे बड़ा ख़तरा: अमरीका

वज़ीरिस्तान (फ़ाइल फ़ोटो)
अमरीका का कहना है कि दुनिया में चरमपंथी हमलों में थोड़ी कमी आई है
अमरीका का कहना है कि अल क़ायदा एक बार फिर से कुछ हद तक उस तरह की ताक़त और काबिलियत हासिल कर चुका है जितनी उसके पास 11 सितंबर, 2001 से पहले थी.

अमरीकी विदेश विभाग का कहना है कि अल क़ायदा पश्चिम के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है.

आतंकवाद पर जारी अमरीकी सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में चरमपंथी हमलों में थोड़ी कमी आई है लेकिन पाकिस्तान में ये हमले दोगुना हो गए.

इस रिपोर्ट में दहशतगर्दी के शिकार देशों में भारत का नंबर अब भी काफ़ी ऊपर रखा गया है.

विदेश विभाग के एक अधिकारी ने रिपोर्ट जारी करने के दौरान कहा कि पाकिस्तान सरकार और चरमपंथी गुटों के बीच चल रही बातचीत कामयाब हो सकती है क्योंकि चुनाव के बाद जिस तरह का माहौल पैदा हुआ है वो इस तरह के समझौते के लिए सही है.

पाक हुकूमत

रिपोर्ट जारी करनेवाले वरिष्ठ अधिकारी डेल डेली ने साथ में ये भी कहा है कि इसकी एक बड़ी वजह रही है पाकिस्तान के क़बायली इलाक़ों में अल क़ायदा को मिला बेरोकटोक प्रशिक्षण और योजना बनाने की आज़ादी जो राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के साथ हुए समझौते की वजह से हुआ.

लेकिन इसके बावजूद अमरीकी विदेश विभाग का मानना है कि नई पाकिस्तानी हुकूमत और चरमपंथियों के बीच फिर से जो बातचीत और समझौते की कोशिशें हैं, वो कामयाब हो सकती हैं.

चरमपंथ
अमरीका का मानना है कि पाकिस्तानी में चरमपंथियों के साथ समझौता कामयाब हो सकता है

विदेश विभाग के अधिकारी डेल डेली ने एक सवाल के जवाब में इसकी वजह भी बताई.

उनका कहना था कि नए दौर की इस बातचीत के कामयाबी के आसार इसलिए हैं क्योंकि एक तो अमरीका की इस पर पैनी नज़र है, दूसरी बात ये कि हुकूमत बिल्कुल नई है.

चुनाव में एमएमए जैसी कट्टरपंथी पार्टियों की भारी हार हुई है और हुकूमत के लिए एक मौक़ा है आगे बढ़ने का क्योंकि ये समझौता कामयाबी की ज़मीन तैयार कर सकता है.

इसके साथ अगर अर्थव्यवस्था, शिक्षा और इलाक़े की बेहतरी के लिए अमरीका की तरफ से हर साल 15 करोड़ डॉलर की मदद को देखें तो लगता है कि कामयाबी का पूरा नुस्खा तैयार है.

अमरीकी चिंता

ग़ौरतलब है कि ये पहली बार है जब किसी अमरीकी अधिकारी ने इस बातचीत के कामयाब होने की उम्मीद जताई है क्योंकि अभी तक अमरीका सार्वजनिक तौर पर चिंता की रेखाएं ज़्यादा दिखा रहा था.

इसकी अहमियत इसलिए और भी बढ़ जाती है क्योंकि इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि जहां 2007 में इराक़ और दुनिया के कई और देशों में आतंकवाद में थोड़ी कमी आई वहीं पाकिस्तान में चरमपंथी हमलों में दोगुनी तेज़ी आई और इन हमलों में मरनेवालों की संख्या चारगुना बढ़ी.

आतंकवाद के शिकार देशों में भारत का नंबर भी काफ़ी ऊपर रखा गया है और कहा गया है कि भारत में पिछले साल 2300 लोग इन हमलों में मारे गए.

रिपोर्ट में कहा गया है कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ने की भारत सरकार की नीति अब भी पुराने क़ानूनों में जकड़ी हुई है और अदालतों में इससे जुड़े मामलों के निपटारे में बरसों लग जाते हैं.

वर्ष 2007 में पूरी दुनिया में 22 हज़ार लोग चरमपंथी हमलों में मारे गए जो कि 2006 के मुक़ाबले आठ प्रतिशत ज़्यादा हैं लेकिन कुल हमलों की संख्या में कमी आई है.

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