मुलायम-ममता की पैंतरेबाज़ी का मतलब

राष्ट्रपति उम्मीदवारी को लेकर पल-पल बदलते समीकरण में अब सबकी नज़रे टिकी हुई हैं समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव पर.
बुधवार को उन्होंने तृणमूल कांग्रस की अध्यक्ष ममता बनर्जी से हाथ मिलाया और कांग्रेस के जरिए सुझाए गए दो उम्मीदवारों के खिलाफ जाकर तीन नए उम्मीदवारों का नाम सुझाया जिसमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी शामिल थे.
लेकिन जब बृहस्पतिवार को कांग्रेस ने इन तीन नामों को खारिज करने के साथ-साथ ममता बनर्जी को मुख्य रूप से आड़े हाथों लिया, तो इस बीच मुलायम सिंह यादव चुप्पी साधे रहे.
हालांकि ममता बनर्जी ने ईंट का जवाब पत्थर से दिया और कहां कि वे किसी की धमकी से नहीं डरती.
ममता बनर्जी ने साथ ही ये भी दावा किया कि समाजवादी पार्टी के साथ उनका जोड़ मज़बूत है और वे पीछे नहीं हटेंगें.
मुलायम की सौदेबाज़ी
लेकिन ममता को इस बात की जानकारी नहीं थी कि समाजवादी पार्टी के तीन नेताओं रामगोपाल यादव, शाहिद सिद्दीकी और मोहन सिंह ने कहा है कि उनकी पार्टी प्रणब मुखर्जी के खिलाफ नहीं है.
तो क्या मुलायम सिंह केवल दूर से अवसरों को आंक रहे हैं और सही मौके और सही पेशकश का इंतज़ार कर रहे हैं?
लखनऊ स्थित बीबीसी संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी का कहना है, “ये तो साफ है कि मुलायम सिंह और ममता बनर्जी का साथ अब बहुत दूर तक नहीं जाएगा. हो सकता है कि मुलायम सिंह सौदेबाज़ी कर रहे हों और आखिरकार वो कांग्रेस के साथ ही जाएं क्योंकि उत्तर प्रदेश में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस का साथ देते हुए नज़र आए हैं. तो फिलहाल ये काफी पेचीदा मामला लग रहा है और ऐसा लगता है कि सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद ही मुलायम सिंह का अंतिम फैसला सामने आएगा.”
वरिष्ठ पत्रकार नीना व्यास का भी मानना है कि चूंकि समाजवादी पार्टी सत्ता में नई है, तो ऐसे में वो कांग्रेस को नाराज़ नहीं करना चाहेगी.
ममता का क्या?

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कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच खुले मंच पर वाक्युद्ध को देख कर अब क्यास लगाए जा रहे हैं कि दोनों पार्टियों के बीच का गठबंधन अब टूटने की कगार पर है.
वरिष्ठ पत्रकार नीना व्यास का मानना है कि ममता को अब दरकिनार किया जा चुका है और कांग्रेस मुलायम सिंह यादव को अपनी ओर खींचने की पूरी कोशिश कर रही है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “ममता बनर्जी और कांग्रेस के बीच दरार साफ नज़र आ रही है. इस दरार का एक इतिहास भी रहा है. तीस्ता नदी से जुड़ी संधि पर जब हस्ताक्षर होने थे, तो ममता ने प्रधानमंत्री का साथ नहीं दिया, जब रेल बजट आया और दिनेश त्रिवेदी को उन्होंने जिस तरीके से पार्टी से निकाला और अब उन्होंने शुक्रवार को होने वाली यूपीए की बैठक में भी जाने से मना कर दिया है. तो अब ये गठबंधन ऐसी कगार पर दिख रहा है जहां अब रिश्ते ठीक होते हुए नज़र नहीं आ रहे है.”
कांग्रेस के लगभग सभी घटक दलों ने राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी को समर्थन दिया, सिवाए ममता बनर्जी के. समाजवादी पार्टी से भी अब ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि वो आखिरकार प्रणब को अपना समर्थन देगी.
आखिर ऐसी क्या दिक्कत है ममता बनर्जी को प्रणब की दावेदारी से?
ममता और प्रणब के तनावपूर्ण रिश्तों पर प्रकाश डालते हुए कोलकाता स्थित बीबीसी संवाददाता अमिताभ भट्टासाली का कहना है, “दरअसल तृणमूल कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता ये मानते हैं कि प्रणब मुखर्जी के वामपंथी नेताओं से काफी अच्छे संबंध हैं और दिलचस्प बात ये है कि बृहस्पतिवार को प्रणब मुखर्जी ने वामपंथी दल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य से फोन पर बात की. कहा जा रहा है कि उन्होंने अपनी दावेदारी पर समर्थन जुटाने के लिए उन्हें फोन किया. इसके अलावा जब से ममता सत्ता में आई हैं, तबसे उनकी केंद्र से मांग रही है कि पश्चिम बंगाल को विशेष आर्थिक सहायता दी जाए लेकिन प्रणब मुखर्जी ही वो व्यक्ति हैं जो उनकी इस मांग को ठुकराते रहे हैं. यही कारण है कि ममता प्रणब की दावेदारी को समर्थन नहीं दे रही हैं.”
इसके अलावा ममता बनर्जी ने कई मुद्दों पर स्थानीय पार्टियों को साथ लेकर एक अलग मोर्चा बनाने की कोशिश की है और उनकी कोशिश ये भी रही है कि वो केंद्र में अपना कद बढ़ा सकें.
लेकिन अब उनकी कोशिशें नाकाम होती दिख रही हैं.
छुपा रुस्तम आएगा सामने?

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तो क्या बदलते समीकरणों के बीच किसी छुपे रुस्तम के सामने आने की संभावना है?
आपको याद होगा कि पांच साल पहले भी जब राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए पार्टियों के बीच सहमति नहीं बन पाई थीं, तो प्रतिभा पाटिल का नाम सामने आया था जिसने सबको चकित कर दिया था.
वरिष्ठ पत्रकार नीना व्यास का कहना है कि जिस तरह से पल-पल राजनीतिक गलियारों में नए मोड़ आ रहे हैं, ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि किसी ऐसे उम्मीदवार का नाम सामने आए जिसकी किसी ने अपेक्षा न की हो..
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “राजनीति में जब तक कोई बात प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आती, तब तक कुछ कहा नहीं जा सकता. हालांकि प्रणब मुखर्जी का नाम अब तक सबसे आगे चल रहा था, लेकिन अब तृणमूल का रुख देख कर कांग्रेस भी दुविधा में पड़ गई है. कहीं न कहीं कांग्रेस भी ये नहीं चाहेगी कि अपना राष्ट्रपति लाने के चक्कर में यूपीए पूरी तरह से बिखर जाए. भले ही समाजवादी पार्टी अभी एक विकल्प के रूप में कांग्रेस के लिए आगे आ सकती है लेकिन मत भूलिए कि यूपी में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच कड़ी टक्कर तो है ही. ऐसे में किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.”
फिलहाल राजनीतिक गलियारों में लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार का नाम भी सामने आ रहा है.
नीना व्यास का कहना है कि मीरा कुमार का नाम सामने आने की संभावना है क्योंकि उनके नाम पर अभी तक किसी पार्टी ने विरोध व्यक्त नहीं किया है.
शुक्रवार को दिल्ली में यूपीए की बैठक के बाद गठबंधन के उम्मीदवार की घोषणा की जाएगी. अब देखना ये होगा कि इस पूरी उठापटक के बीच कौन वो शख्स होगा जिस पर सभी की सहमति बन पाएगी.












