'चाय बागान के पांच मज़दूरों की भूख से मौत'

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- Author, अमिताभ भट्टासाली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोलकाता
पश्चिम बंगाल के उत्तरी ज़िले जलपाईगुड़ी के देखलापारा चाय बागान में पिछले एक महीने में पांच मज़दूरों की मौत हो गई है.
मरने वालों की उम्र 25 से पचास साल के बीच है.
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक़ ये मज़दूर भुखमरी की वजह से मरे हैं.
प्रशासन की तरफ़ से मृत्यु की घटना की पुष्टि तो की गई है मगर कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि इनकी मौत भूख से हुई है.
उत्तरी बंगाल मामलों के मंत्री गौतम देब ने बीबीसी से बातचीत करते हुए कहा, ''जो पांच लोग मरे हैं, उनमें दो को लीवर सिरोसिस हुआ था. एक व्यक्ति की दुर्घटना हो गई थी. इसलिए इसे भुखमरी कहना सही नहीं है. पर वहां कुपोषण है ये तो स्वीकार करना ही पड़ेगा. सालों से उन लोगों को ठीक से खाना नहीं मिला पर ये स्थिति तो दूसरे जगहों पर भी है.''
देखलापारा चाय बागान साल 2002 से बंद है.
बीच में कुछ महीनों के लिए चालू होने के बाद फिर से बंद हो गया. पर बंद चाय बग़ीचों के लिए सरकारी राहत कार्यक्रमों की सुविधा देखलापारा के लोगों को ठीक से मिल नहीं रही थी.
ये आरोप लगाया बंद पड़ी चाय बागानों के ऊपर निगरानी रखने वाली सुप्रीम कोर्ट की एक कमेटी की सदस्य अनुराधा तलवार ने.
अनुराधा का कहना था, ''बग़ीचे क़रीब दस साल से बंद हैं. सरकारी योजना जैसे नरेगा के काम को कराया गया, पर महीनों से पैसा नहीं मिल रहा था. दूसरी तरफ़ फ़ौली योजना जिसमें बंद चाय बगीचों के मज़दूरों के लिए महीने में देढ़ हज़ार रुपया दिया जाता है. उसका पैसा भी छह सात महीनों से नहीं मिला. दो रुपए किलो चावल मिलने का भी कार्ड कई लोगों के पास नहीं है.''
मज़दूरों की हालत दयनीय
जलपाईगुरी ज़िले के कलेक्टर स्मारकी महापात्र ने स्वीकार किया है कि बंद पड़े बग़ीचे के मज़दूरों को राहत की राशि कई महीनों तक नहीं मिल सकी थी.
दो रुपए किलो चावल भी कई लोगों को नहीं मिल रहा था. कलेक्टर साहिबा का दावा है कि अब सारी योजनाएं ठीक से लागू कर दी गई हैं.
मंत्री गौतम देब ने भी माना है कि सरकारी योजनाओं की राहत राशी उन लोगों को नहीं मिल पा रही थी.
चाय बागानों में भूख से मरने की ये पहली घटना नहीं है. बागान के मज़दूरों को वेतन के साथ-साथ राशन, चुल्हा जलाने के लिए लकड़ी, बग़ीचे के अस्पताल में इलाज की सुविधा मिलती है लेकिन जो बागान बंद हो जाता है वहां सारी सुविधाएं बंद कर दी जाती हैं.
कुछ साल पहले जहां क़रीब तीस बागान बंद पड़े थे वही अब वो संख्या घट कर चार-पांच हो गई है.
मज़दूर संघों का आरोप है कि कुछ लोग चाय बागानों को ख़रीद लेते हैं और मौसम ख़त्म होने के बाद इसे बंद कर देते हैं. सरकार अगर अपनी निगरानी बढ़ाती है तो बग़ीचे कभी भी बंद नहीं होने चाहिए क्योंकि चाय की क़ीमत देश और विदेश के बाज़ारों में बढ़ती चली जा रही है.












