स्वामिभक्त कुत्ते की मौत का राज़ फ़ाश

वैज्ञानिकों ने जापान के सबसे मशहूर कुत्ते की दशकों पहले हुई मौत के कारणों का पता लगा लिया है.
1930 के दशक में हचिको नाम का ये कुत्ता स्वामिभक्ति की मिसाल बन गया था क्योंकि अपने मालिक की मौत के सालों बाद तक ये उनका एक स्टेशन पर इंतजार करता रहा था.
पहले माना जा रहा था कि हचिको की मौत पेट में कबाब वाली सींक के चुभने से हुई थी लेकिन अब उसकी मौत के रहस्य से पर्दा उठ गया है.
टोक्यो से बीबीसी संवाददाता रोलैंड ब्यूर्क के अनुसार पिछले 75 साल से हचिको जापान में स्वामिभक्ति की मिसाल बना हुआ है.
बच्चों की किताबों में उसे स्वामिभक्ति के आदर्श के रूप में पेश किया जाता रहा है. हचिको की बेमिसाल ज़िंदगी पर दो फिल्में भी बनाई गई हैं.
वफ़ादारी की मिसाल
टोक्यो के शिबूया स्टेशन के बाहर बनी उसकी मूर्ति बेहद लोकप्रिय है और दशकों से लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है.
शिबूया स्टेशन के बाहर उसी जगह पर हचिको हर शाम अपने मालिक का इंतजार करता था. उसकी ये दिनचर्या सालों से जारी थी लेकिन एक दिन हचिको के मालिक की दफ्तर में मौत हो गई और वो लौट कर नहीं आए.
हचिको कई साल तक इसी शिबूया स्टेशन के बाहर ठीक उसी तरह अपने मालिक का इंतजार करता रहा जैसे पहले किया करता था. अपने मालिक के इंतजार का उसका सिलसिला तभी थमा जब 1935 में उसकी मौत हो गई.
हचिको के मरने के बाद उसके पार्थिव शरीर को एक संग्रहालय में सुरक्षित रख दिया गया.
हचिको की मौत
माना जाता है कि खाने-पीने का सामान बेचने वाले कुछ स्थानीय फेरीवालों ने हचिको की हालत पर तरस खाकर दयाभाव से उसकी हत्या कर दी होगी.
हचिको के पेट में कबाब सेंकने वाली सींक़ मिली थी. इस आधार पर एक अनुमान ये भी लगाया गया था कि उसने जल्दी-जल्दी मांस खाते वक़्त सींक भी निगल ली होगी और उसी से लगी अंदरूनी चोट की वजह से उसकी मौत हो गई होगी.
लेकिन अब पशु चिकित्सकों ने हचिको के पार्थिव अवशेष की कई बार जांच करने के बाद ये निष्कर्ष निकाला है कि हचिको ने कबाब सेंकनेवाली चार सींक तो वाक़ई निगल ली थीं लेकिन उनसे उसे कोई नुक़सान नहीं पहुंचा था.
यानि हचिको की मौत लोहे की सींकों की वजह से नहीं हुई थी.
डॉक्टरों इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि उस स्वामिभक्त कुत्ते की मौत कैंसर या पेट में कीड़े पड़ने से हुई थी.












