अगर जानवर भी इंसान जितने समझदार हों..

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- Author, राचेल नूअर
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
इंसान सारी दुनिया पर राज करता है. क्या आपने कभी सोचा है ऐसा भला क्यों है?
क्योंकि इंसान के पास सोचने और समझने की सलाहियत है. वो अच्छे और बुरे में फ़र्क़ कर सकता है. वो दूरंदेशी होता है.
इंसान के मुताबिक इसीलिए ही वो दुनिया के सभी जीवों में सबसे क़ाबिल माना जाता है. उसका दर्जा सबसे ऊपर है.
अब प्राणी तो जानवर भी है. ज़रा सोचिए अगर बाक़ी जानवरों के पास भी इंसान के जैसी ही सोच और समझ आ जाए तो क्या होगा?
क्या फिर इंसान और जानवरों में वर्चस्व की लड़ाई छिड़ जाएगी?
1963 में पियर बाउल ने एक किताब लिखी थी, ''इन दी प्लैनेट ऑफ एप्स''. जिस पर बाद में कई फिल्में भी बनीं.
इस फिल्म में यही दिखाया गया था कि कैसे इंसान अपने से बड़े, ताक़तवर और बुद्धिमान बंदरों की दुनिया में रहते हैं.
जहां सत्ता की सारी कमान चालाक और क्रूर बंदरो के हाथ में होती है.
सोचें, आज की दुनिया में भी ऐसा ही अगर हो जाए तो कैसा रहेगा?
हालांकि ये सवाल दूर की कौड़ी ही है, लेकिन कल्पना करने में क्या जाता है.
ब्रिटेन की ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के आइन कटहिल कहते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो पूरी दुनिया में सिर्फ़ और सिर्फ़ अराजकता का माहौल पैदा हो जाएगा.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर रॉबिन डनबार कहते हैं कि हम सब एक दूसरे को मार डालेंगे. प्रोफ़ेसर रॉबिन के मुताबिक़, "एक इंसान जब किसी दूसरे प्राणी से मिलता है तो अपने अवचेतन मन में उस के लिए कई तरह के आशंकाएं लिए रहता है."

सेंट एंड्र्यूज़ यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर जोसेप कॉल कहते हैं कि अगर सभी के पास बराबर की समझ आ जाएगी तो ज़ाहिर है कोई भी ऐसा ही बर्ताव करेगा जैसा कि इंसान करता है. हर संसाधन पर अपना क़ब्ज़ा जमाना चाहेगा. इससे यक़ीनन तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत हो जाएगी.
अगर ऐसा हुआ तो उसमें जीतेगा कौन? ज़ाहिर है बहुत सी प्रजातियां उसमें पिछड़ जाएंगी. जैसे शाकाहारियों को अगर मुक़ाबला करने का मौक़ा मिलेगा तो यकीनन हार ही जाएंगी क्योंकि खुद को ताक़त देने के लिए उन्हें ज़्यादा खुराक लेने की ज़रूरत होगी. उसके लिए वो मैदानों में घंटों घास चरते रहेंगे. इसके बाद उनके पास वक्त ही नहीं बचेगा कि वो अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए वक़्त निकाल सकें. इनके मुक़ाबले मांसाहारी जीव, जिन्हें कम वक़्त में ज़्यादा प्रोटीन मिल जाता है, वो बाज़ी मार ले जा सकते हैं.
दुनिया पर राज करने की इस जंग में समंदर के जानवरों के हाथ हार लगनी तय है क्योंकि वो पानी से बाहर आने पर बच ही नहीं पाएंगे. वो पानी वाले इलाक़े में क़ब्ज़े की जंग भले लड़ और जीत लें, धरती पर राज करना उनके लिए मुमकिन नहीं होगा. इसी तरह ठंडे इलाक़े में रहने वाले या फिर रेगिस्तान में रहने वाले सभी तरह के जीव अपने अपने परिवेश के क़ैदी हैं.

हालांकि बहुत से बड़े शिकारी जानवर इंसान को टक्कर दे भी सकते हैं, लेकिन उनके इतिहास पर गौर किया जाए तो उनका मुक़ाबला भी अपने आसपास के जानवरों के साथ ही रहा था. जैसे कि हमने जुरासिक पार्क में डायनासोर के साथ होते हुए देखा था. वहां मुक़ाबला इंसान से नहीं था बल्कि जानवरों का आपस में था. अगर इंसान के कपड़े उतार कर निहत्था उसे जंगलों में छोड़ दिया जाए तो सौ फ़ीसद वहां के जानवर उसे खत्म कर देंगे. लेकिन ये क़ाबिलियत इंसान के पास ही है कि वो मॉडर्न तकनीक से बने हथियारों की मदद से उन जानवरों को पछाड़ सकता है.
इंसान जिस्मानी जानवरों से अलग है. लेकिन बंदर, चिंपैंजी ओरांगउटान और गोरिल्ला वगैरह इंसानों से काफ़ी मिलते हैं. उनमें फुर्ती भी इंसान से ज़्यादा होती है और वो समझ भी रखते हैं. अगर उनका दिमाग़ इतना विकसित हो जाए, उनमें इतनी अक़्ल आ जाए कि वो इंसान के बनाए कंप्यूटर इस्तेमाल कर सकें तो वो इंसान को हरा देंगे.
बहुत मुमकिन है कि वो अपने मतलब की कुछ और बेहतर तकनीक ईजाद कर लें, लेकिन एक दिक़्क़त उनके साथ भी है. वो ये कि इंसान ने आज जानकारियों का जो ज़ख़ीरा जमा कर लिया है. वो उनके पास नहीं है. वो तकनीक का इस्तेमाल तो शायद कर लें, लेकिन वो ये नहीं जान पाएंगे कि दुश्मन को कैसे हराया जाए या युद्ध की रणनीति कैसे तैयार की जाए. फिर भी ये कहा जा सकता है कि यही हमारे ये दूर के रिश्तेदार हमारे लिए ख़तरा हो सकते हैं, बशर्ते उनकी अक़्ल हमारे जैसी या हमसे भी तेज़ हो जाए.

इंसान अपनी जानकारियों के सहारे सभी पर बाज़ी मार सकता है. इसकी एक वजह और भी है. इंसान तादाद में जानवरों से ज़्यादा है. उसकी उत्पत्ति भले ही गर्म मैदानी इलाक़ों में हुई हो, लेकिन इसके बावजूद उसमें हर तरह के माहौल में ख़ुद को ढालने की ख़ूबी होती है जिसके बूते वो कहीं भी जी सकता है और दूसरी नस्ल के जानवरों से लोहा ले सकता है.
प्रोफेसर कॉल कहते हैं वर्चस्व की इस लड़ाई में इंसान से टक्कर लेने वाली जीवों की एक और प्रजाति है वो है जीवाणु या कीटाणु. ये सब जगह मौजूद हैं. इनमें तंत्रिका तंत्र या दिमाग़ होता ही नहीं. लिहाज़ा किसी तरह की समझ इनमें पैदा होगी ये ख़्याल ही दूर की कौड़ी जैसा है. लेकिन इसके बावजूद ये इंसान के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं. बैक्टीरिया दो तरह के होते हैं. अच्छे भी और बुरे भी. खराब बैक्टीरिया पूरे इंसानी सिस्टम को ही हिला कर रखने के लिए काफ़ी हो सकते हैं. हो सकता है इंसान की नस्ल खत्म हो जाए, लेकिन जीवाणु ऐसे जीव हैं जो सब कुछ खत्म होने के बाद भी अपनी हस्ती क़ायम रख सकते हैं. यहां तक कि इंसानी वजूद के लिए भी इनका होना ज़रूरी है.
ये ज़रूरी नहीं है कि सभी प्रजातियों में होमो-सैपियंस या इंसान जैसी समझ हो. लेकिन अगर किसी और नस्ल के जीव में इंसान जैसी अक़्ल हो गई तो भी धरती पर आपसी टकराव बढ़ेगा.

इन सब बातों से एक ही नतीजे पर पहुचा जा सकता है कि अगर दुनिया से कोई भी एक प्रजाति खत्म होगी तो क़ुदरत का बैलेंस बिगड़ेगा. ऐसे में अगर कुछ बचा रहेगा तो वो होंगे कीटाणु, तिलचट्टे और शायद चूहे. जो एक बार फिर से ज़मीन पर किसी नई तरह की ज़िंदगी को वजूद में लेकर आएंगे.
धरती पर राज चाहे जिसका हो, हाल इसका वही होना है जो आज के इंसान ने किया हुआ है. प्रोफेसर कटहिल का कहना है कि धरती के लिए इंसान से ज़्यादा परोपकारी कोई हो ही नहीं सकता. आज क़ुदरत में जो एक संतुलन बना हुआ है, वो इसीलिए है क्योंकि कोई भी प्रजाति किसी दूसरे पर हावी नहीं. सब पर एक जीव यानी इंसान का राज है. सोचने और समझने की जो सलाहियत क़ुदरत ने इंसान को दी है वो नेमत है. उसके बूते ही वो सारी दुनिया पर अपना नियंत्रण बनाए हुए है.
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