पानी तो निकल गया, लेकिन साल भर खाएंगे क्या?

इमेज स्रोत, sameeratmaj mishra

    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, मिर्जापुर से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

मिर्ज़ापुर ज़िला मुख्यालय से कुछ ही दूरी पर है हरसिंहपुर गांव. दो दिन पहले तक क़रीब छह हज़ार की आबादी वाला ये गांव पूरी तरह से डूबा हुआ था. लोग एक घर से दूसरे घर तक जाने के लिए भी नाव का ही सहारा लेते थे.

फ़िलहाल गांव से पानी निकल गया है, लेकिन जगह जगह कीचड़, गंदगी के ढेर, खेतों में पड़े इंजन, ट्रैक्टर, थ्रेशर को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि एक हफ़्ते तक गांव के लोगों की जिंदगी कैसी थी.

गांव में दाख़िल होते ही गांव और गांव के लोगों पर क्या बीती है, ये बताने की ज़रूरत नहीं. रास्ते में एक बुज़ुर्ग महिला गाड़ी से उतरते देख अपने आप कहने लगीं, "सब बर्बाद हो गया, कुछ नहीं बचा."

हमारे पूछने पर कहने लगीं कि ख़ुद ही देख लो, बताना क्या?

दरअसल इस गांव में अक़्सर बाढ़ आती है लेकिन ऐसा कभी-कभी ही होता है कि पूरा का पूरा गांव पानी में एक हफ़्ते तक डूबा रहे. गांव के लोगों में सब कुछ लुट जाने का दुख तो है लेकिन किसी से कोई ग़िला-शिकवा नहीं.

इमेज स्रोत, sameeratmaj mishra

पूछने पर ही बताते हैं कि किसी तरह की न तो कोई सरकारी राहत मिली है और न ही कोई उनका हाल जानने आया. हालांकि जिस जगह इन लोगों से बात हो रही थी वहीं पर किसी चीज़ के उद्घाटन का एक पत्थर लगा था और उस पर अनुप्रिया पटेल, सांसद का नाम लिखा था. आज अनुप्रिया पटेल मंत्री हैं.

बाढ़ के दौरान और उसके बाद भी सरकारें राहत के ढेरों दावे करती हैं. इस बार भी कई तरह की घोषणाएं की गई हैं. बड़ी संख्या में राहत सामग्री मुहैया कराई गई है और प्रशासन उन्हें लोगों तक पहुंचाने का दावा भी करता है, लेकिन पीड़ित लोगों तक पहुंचा कितना ये यहां के लोगों से बेहतर कौन बता सकता है.

हां, गांव वालों के मुताबिक़ कुछ ग़ैर सरकारी संगठनों और राजनीतिक दलों के लोगों ने ज़रूर उनका हाल जाना और कुछ मदद भी की.

गांव में भीतर की ओर चलने पर नदी के सबसे किनारे पानी सूखने के बाद सड़क पर ही एक चारपाई पर कुछ बुज़ुर्ग महिलाएं हमें बैठी दिखीं. हाथ में माइक और कैमरा देख कर उन्होंने ख़ुद बीते दिनों की दास्तां सुनाई.

इमेज स्रोत, sameeratmaj mishra

कहने लगीं कि एक हफ़्ते तक घर-बार छोड़कर ऊंचाई पर दूसरों के घरों में रहे जो कि दो मंज़िले थे. आने पर सब कुछ बह गया पानी में. खाने के लिए रखा अनाज, पशुओं का भूसा-चारा और साथ में वो सब भी जो उन्होंने गाढ़ी कमाई से बचाकर जमा कर रखा था.

गांव में लोग ज़्यादातर सब्ज़ी और मोटे अनाज की खेती करते हैं. सब्ज़ी से उन्हें आर्थिक लाभ भी ठीक-ठाक होता है, लेकिन गेहूं-चावल सिर्फ़ अपने खाने भर का. गेहूं की फ़सल अच्छी हुई नहीं थी और धान की फ़सल पूरी बर्बाद हो गई है. सब्ज़ियों का तो नामो-निशान भी नहीं रहा. ऐसे में लोगों को इसी बात की चिंता है कि साल भर खाने-पीने को क्या मिलेगा?

ये हाल सिर्फ़ हरसिंहपुर का ही नहीं है. मिर्ज़ापुर में ही ऐसे कई गांव और हैं. साथ ही बाढ़ प्रभावित दूसरे ज़िलों के भी कई गांवों में ऐसी ही समस्या थी.

अब पानी निकलने के बाद ज़िदगी दोबारा पटरी पर लौट रही है लेकिन बाढ़ के बाद मनुष्यों और जानवरों दोनों में फैलने वाली बीमारी को लेकर भी गांव वाले बेहद आशंकित हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href=" https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)