‘पीने का पानी भले न हो, गाय-भैंस नहलाएंगे’

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    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, इलाहाबाद से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

इलाहाबाद के बाढ़ प्रभावित छोटा बघाड़ा इलाक़े में एनी बेसेंट इंटर कॉलेज है जहां आस-पास के इलाक़ों के बाढ़ में फंसे लोगों के लिए अस्थायी राहत शिविर बनाए गए हैं.

सामने एक संस्था का बोर्ड लगा है जिसके स्वयंसेवक यहां रह रहे लोगों के लिए इलाज़ वगैरह की व्यवस्था कर रहे हैं. कॉलेज कैंपस काफी बड़ा है इसीलिए क़रीब सात आठ सौ परिवारों के शरण लेने के बावजूद यहां ज़्यादा भीड़भाड़ दिख नहीं रही है.

लोगों ने दस बारह दिन से घरों को छोड़कर यहीं पर शरण ले रखी है. अब पानी कुछ कम ज़रूर हुआ है लेकिन घर अब भी डूबे हुए हैं और वहां पहुंचा नहीं जा सकता है. कई लोगों के घर तो पूरी तरह से गिर गए हैं.

इलाहाबाद में बाढ़ पीड़ितों के लिए चल रहे क़रीब दो दर्जन राहत शिविरों में यह सबसे बड़ा है. यहां इंतज़ाम ज़रूर किए गए हैं लेकिन लोगों को कई शिकायतें हैं.

लोगों को सबसे ज़्यादा दिक़्क़त पानी की हो रही है. प्रशासन टैंकर भिजवाता ज़रूर है लेकिन पानी की कथित बंदरबांट और कुछ लोगों की ज़बर्दस्ती से लोग परेशान हैं.

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यहां तक कि इलाक़े के विधायक बब्लू सोनकर भी इस बात को स्वीकार करते हैं. बब्लू सोनकर कहते हैं कि आस-पास यादव समुदाय के लोग ज़्यादा हैं और वो अपने साथ बड़ी संख्या में गाय और भैंस भी राहत शिविर में ही ले आए हैं.

सोनकर कहते हैं, "इन जानवरों के बंधे रहने से वैसे तो कोई दिक़्क़त नहीं है क्योंकि यहां जगह काफी है लेकिन टैंकर के पानी को ये लोग दूसरों को नहीं लेने देते. पानी का इस्तेमाल न सिर्फ़ जानवरों को पिलाने के लिए बल्कि उन्हें नहलाने के लिए करते हैं, जबकि कुछ ही दूरी पर बाढ़ का पानी सबको परेशान कर रहा है."

वहीं राहत कार्यों में प्रशासनिक लापरवाही को लेकर भी लोगों में काफी ग़ुस्सा है. लोगों का आरोप है कि प्रशासन की तरफ़ से उन्हें महज़ लाई चना जैसी चीजें ही मिल रही हैं और वो भी कुछ लोगों को ही.

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कॉलेज की बिल्डिंग के अंदर दाख़िल होते ही हमें कुछ महिलाएं खाना बनाते दिखीं. इनका कहना था कि खाना न बनाएं तो यहां कुछ मिलने वाला नहीं है क्योंकि जो चीजें आती हैं वो कुछ चुनिंदा लोगों को ही मिल जाती हैं.

राहत सामग्री बंटवाने के लिए वहां आए इलाक़े के विधायक बब्लू सोनकर भी इस बात से इनकार नहीं करते लेकिन उनका कहना था कि किसी चीज़ की कमी नहीं है, बांटने में लापरवाही ज़रूर होती है.

बब्लू सोनकर हमें वो जगह भी दिखाने ले गए जहां बाढ़ पीड़ितों के लिए खाना बन रहा था. उन्होंने बताया कि पूरा का पूरा राशन और खाद्य सामग्री निजी संगठनों की ओर से उपलब्ध कराई गई है, प्रशासन की ओर से नहीं.

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राहत शिविर में क़रीब सौ साल की एक बुज़ुर्ग महिला भी दिखीं. उनका कहना था कि वो तो सालों से इस स्थिति को देख रही हैं.

केवला देवी नाम की ये महिला कहती हैं कि इस जगह घर बनवाने के लिए उन्होंने अपने परिवार वालों को मना किया था लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई और लगभग हर साल परिवार को महीने-डेढ़ महीने राहत शिविरों में गुज़ारा करना पड़ता है.

दरअसल, इस राहत शिविर में ज़्यादातर ऐसे लोग हैं जिनके घर निचले इलाक़ो में बने हैं और गंगा नदी में पानी का जलस्तर जब बढ़ता है तो लगभग हर बार इन्हें बेघर होना पड़ता है.

कुछ लोगों का कहना है कि वो इसके अभ्यस्थ हो गए हैं लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जिन्हें इस तरह से पहली बार रहना पड़ रहा है. अब सभी को इसी बात का इंतज़ार है कि इनके घरों से पानी बाहर हो, ज़मीन सूख जाए और ये वापस फिर से अपना जीवन शुरू कर सकें.

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