'कोई मां इतनी निर्दयी कैसे हो सकती है'

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, सबौर (भागलपुर) से, बीबीसी हिंदी के लिए
24 साल की पिंकी विधवा हो चुकी हैं. उनकी सास देवकी देवी के पति कुछ साल पहले गुज़र गए. इस बाढ़ में बीते रविवार को उनका बेटा भी डूब गया.
बिहार में भागलपुर ज़िले के सबौर ब्लॉक के राजेंदीपुर गांव में बाढ़ के कारण तीन मौत हुई हैं. इनमें एक थे दिलीप. दूसरे देवकी के बेटे और तीसरे पिंकी के पति.
देवकी के घर में अब कोई कमाउ मर्द नहीं बचा. एक छह साल का बेटा है. अपनी मां पर आश्रित. पिंकी की गोद में भी डेढ़ साल की बेटी है शिवानी.
इन लोगों ने सबौर उच्चविद्यालय के बाढ़ राहत शिविर में पनाह लिया है. स्कूल के मैदान में प्लास्टिक के छज्जे वाले अस्थायी तंबू के नीचे. साथ में कुछ बकरियां भी हैं.
इस राहत शिविर में ज़िंदगी की कड़वी सच्चाई को बयां करते ऐसे कई लोग हैं.

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पिंकी कहती हैं कि उनके पति के मर जाने के बाद अब उनकी ज़िंदगी कैसे चलेगी. उन्हें कौन कमा कर देगा. बच्चों की परवरिश कौन करेगा.
झारखंड के गोड्डा ज़िले के खट्टी समनपुर गांव में पिंकी की शादी 12 साल पहले राजेंदीपुर के दिलीप रजक से हुई थी. तब वे बहुत छोटी थीं. अब जब बड़ी हुईं तो गंगा ने उनसे उनका पति छीन लिया.
पिंकी की सास देवकी देवी भी रो रही हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा कि अब वे घर कैसे चलाएंगी. फ़िक्र इसी की है. एक तो छोटा बेटा, दूधमुंही पोती और विधवा बहू. इन सबके लिए कमाने वाला तो भंवर में फंसकर डूब गया.

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वे कहती हैं, "कोई मां इतनी निर्दयी कैसे हो सकती है. गंगा अगर मां हैं, तो उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था."
बग़ल में बैठे उनके छह साल के बेटे ने भाई को मुखाग्नि दी है. सफ़ेद कपड़ों में बैठा छोटू रजक कभी अपनी मां को देखता है, कभी भाभी को.
इस तंबू के बग़ल में एक और तंबू है. इसमें फूलन देवी बैठी हैं. उनके 18 साल के बेटे सूरज कुमार की 24 अगस्त की शाम बाढ़ के पानी में डूबकर मौत हुई है. वे भी राजेंदीपुर की हैं.
फूलन देवी ने बताया कि उनके पति बनवारी मंडल विकलांग हैं. काम नहीं कर सकते. 16 साल की बेटी गीता शादी के योग्य है तो 8 साल का बेटा संजीत अबोध. घर गंगा के गर्भ में समा चुका है.

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वे कहती हैं, "अभी राहत शिविर में खाना मिल जा रहा है. जब यह शिविर हटेगा तो बच्चों को कहां से खिलाएंगे. घर कैसे बनाएंगे. आप लोग प्रशासन से कहिए. हमें मुआवज़ा मिल जाए."
राजेंदीपुर पंचायत में क़रीब 4000 घर हैं. आबादी 20 हज़ार से भी अधिक. यहां के विनोद मंडल ने बताया कि बाढ़ आने पर कुछ लोग अपने संबंधियों के यहां चले गए. कुछ राहत शिविर आ गए. बाक़ी के लोग घर का मोह नहीं छोड़ पा रहे तो बाढ़ के बीच अपनी छतों पर वजूद बचाने का संघर्ष कर रहे हैं.

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इस बीच गंगा के जलस्तर में कोई कमी नहीं आयी है. इन महिलाओं को कोई मुआवज़ा नहीं मिला है.
जबकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने घोषणा की थी कि बाढ़ के कारण मरने वाने लोगों के परिजनों को सरकार चार लाख रुपये का मुआवज़ा देगी.

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आज इस शिविर में दाल-भात और आलू-सोयाबीन की सब्ज़ी बनी है. लोग अपनी-अपनी थाली लेकर लाइन में लगने लगे हैं. इसी का नाम ज़िंदगी है शायद.
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