बोलचाल की भाषा में अपशब्द क्यों?

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- Author, टिम मैकडोनल्ड
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
अपशब्द सुनना और बोलना दोनों ही ख़राब लगता है. वैसे भी गाली-गलौज शरीफ़ों की तहज़ीब का हिस्सा नहीं.
अफ़सोस की बात ये है कि आज बेहूदा ज़बान बोलना स्टेटस सिम्बल ही बन गया है.
ये मसला सिर्फ किसी ख़ास इलाक़े, नस्ल, मज़हब, या ज़ात का नहीं है. बल्कि पूरी दुनिया का है.
जिन देशों में पढ़े-लिखे लोगों की तादाद अच्छी ख़ासी है, वहां के लोग भी खुलकर गालियां देते हैं. अपशब्दों का इस्तेमाल धड़ल्ले से करते हैं.
एक सर्वे के मुताबक़ ब्रिटेन के लगभग 90 फीसद लोग दिन में औसतन 14 बार गालियां देते हैं और उन्हें इसमें कुछ ग़लत नहीं लगता.
अगर गाली देने वाले को ही कोई मलाल ना हो कि उसने कोई ग़लत काम किया है, तो क्या बेहूदा ज़बान को ख़ामोशी से सुनकर बर्दाश्त किया जाए?
अगर आपके दफ़्तर में कोई बेहूदा ज़बान का इस्तेमाल करे तो क्या करें सुनकर चुप रहें या जवाब दें? ये एक बड़ा सवाल है.
हालांकि कुछ पेशेवर इसे ग़लत मानते हैं. लेकिन, कुछ इसकी हिमायत भी करते हैं.

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उनका मानना है कि ऐसे बर्ताव को लेकर किसी कर्मचारी को बहुत तनाव नहीं पालना चाहिए.
करियर बिल्डर सर्वे के मुताबिक 81 फीसद कंपनियां, अपने दफ़्तर में गाली-गलौज को सही नहीं मानतीं.
उनके मानना है गंदी ज़बान का इस्तेमाल वही लोग करते हैं जिनका खुद पर क़ाबू नहीं होता.
ऐसे लोग जज़्बाती तौर पर कमज़ोर होते हैं. वो अपने सहकर्मी को कमतर समझते हैं.
लेकिन बहुत से नामचीन लोगों के बारे में मशहूर है कि गाली-गलौज करते हैं.
जैसे कि याहू के पूर्व सीईओ कैरोल बार्त्ज. टी-मोबाइल के सीईओ जॉन लेगेर.
अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी कई बार गाली-गलौज वाली ज़ुबान का इस्तेमाल किया है.
इन मिसालों से एक बात तो साफ़ है कि गालियां देने से आपकी तरक़्क़ी नहीं रुकती. मगर इससे तरक़्क़ी होती भी नहीं.
अभद्र भाषा के प्रयोग से बचने के उपायों पर जेम्स ओ कॉनर ने एक क़िताब लिखी है 'कस कंट्रोल'.

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कॉनर मानते हैं कि कभी-कभार गाली देकर आप अपनी भड़ास निकाल सकते हैं.
मगर इससे आपको कभी इज्ज़त नहीं मिल सकती.
अपने साथियों के दरमियान या अपने जूनियर साथियों के साथ अच्छा रिश्ता बनाने के लिए ज़रूरी है आप अपने गुस्से पर क़ाबू रखें.
काम करते हुए वो जिन मुश्किलों का सामना कर रहे हैं उनका हल तलाशने में उनकी मदद करें.
उनके साथ एक दोस्ताना रिश्ता बनाने की कोशिश करें.
ऐसे में अगर कभी आप उनसे नाराज़ होकर दो-चार बात सुना भी देंगे तो, वो कुछ देर के लिए भले ही बुरा मान जाएं लेकिन आपकी इज़्ज़त करना कम नहीं करेंगे.
अभद्र भाषा और अपशब्दों का इस्तेमाल कमोबेश हर इंसान करता है. इस पर लगाम लगा पाना असंभव है.
लेकिन, इस बात की हिमायत हरगिज़ नहीं की जा सकती कि आप अपने ऑफ़िस में गाली-गलौज करेंगे तो ही आप अपनी टीम में जगह बना सकेंगे.
हां, कभी-कभार अपशब्दों का इस्तेमाल आपकी तरक़्क़ी में मददगार हो सकता है. साल 2007 में एक रिसर्च की गई थी.
रिसर्च करने वाला शख़्स एक ब्रिटिश मेल ऑर्डर वेयर हाउस में काम करने गया ताकि वो वहां काम करने वाले लोगों के बर्ताव को समझ सके.

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शुरूआत में इस रिसर्चर को कंपनी के सोशल ग्रुप से बाहर कर दिया गया.
लेकिन धीरे-धीरे इस रिसर्चर ने गाली-गलौज शुरू की तो इस सोशल ग्रुप ने उसे अपने साथ जगह देनी शुरू कर दी.
रिसर्चर के इस तजुर्बे पर बाद में एक क़िताब भी लिखी गई जिसकी सह-लेखक हैं येहुदा बरूच.
येहुदा मानती हैं कि मल्लाहों और मज़दूरों की तरह गालियां देना अच्छी बात नहीं.
लेकिन हम सभी इंसान हैं और हर इंसान की कोई ना कोई कमज़ोरी ज़रूर होती है.
गुस्से में आकर गाली देना उसी कमज़ोरी को दर्शाता है.
इस रिसर्च के आधार पर येहुदा कहती हैं कि वो नहीं मानतीं कि अभद्र भाषा का प्रयोग करके आप तरक़्क़ी की सीढ़ियां चढ़ सकते हैं.
लेकिन हां इसमें भी कोई शक़ नहीं कि बहुत बार आपका ये बर्ताव लोगों को एक दूसरे के क़रीब लाने में मदद करता है.
वक़्त के साथ हालात भी बदलते जा रहे हैं. आज ज़्यादातर कंपनियां अपने यहां काम करने का बेहतर माहौल पैदा करने की कोशिश कर रही हैं.
उसकी वजह भी है. क्योंकि अब बात सिर्फ़ गाली-गलौज तक सीमित नहीं रहती है.

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बल्कि ये मानसिक उत्पीड़न और बदमाशी में शुमार हो गया है.
किसी की जाति या धार्मिक भावना या फिर औरत-मर्द में भेद करने वाली गाली बहुत बुरी मानी जाती है.
बहुत जगहों पर इसके ख़िलाफ़ सख़्ती अपनायी जाती है.
कुछ देशों में तो सार्वजनिक तौर पर गाली देने पर भारी जुर्माना भी लगाया जाता है.
हाल ही में अमरीकी रैपर फिफ्टी सेंट को अपने शो के दौरान गाली देने पर गिरफ़्तार कर लिया गया था.
संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में तो क़ानून और भी सख़्त हैं.
वहां तो अगर किसी मोबाइल के ज़रिये भी किसी अपशब्द का प्रयोग किया गया है तो भारी जुर्माना लगा दिया जाता है.
गाली-गलौज को लेकर किस मुल्क में क्या क़ानून हैं ये समझना ज़्यादा ज़रूरी है.
जैसे मज़हब को निशाना बनाते हुए अपशब्दों का इस्तेमाल किया जाना पश्चिमी देशों में कोई जुर्म नहीं माना जाता.
जबकि मध्य एशियाई देशों में ईश निंदा बहुत बड़ा जुर्म है.
इसलिए बेहतर यही होगा कि आप अपनी ज़ुबान पर क़ाबू रखें.

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अगर किसी अपशब्द का इस्तेमाल नहीं करेंगे तो कोई आपसे सवाल नहीं करेगा.
लेकिन हां, अगर किसी मुल्क के क़ानून को जाने बग़ैर वहां ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर लिया तो आपका मुश्किल में पड़ना तय है.
सिडनी की एक पत्रकार अपने तजुर्बे से बताती है कि एक बार वो भरी गर्मी में कोई स्टोरी कर रही थीं.
अपने बॉस से उन्होंने पानी और सैंडविच भेजने को कहा. लेकिन उसने ऐसा नहीं किया.
फिर वो एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बेहोश हो गईं. इसके बाद तो उन्होंने अपने बॉस को जमकर गालियां दीं.
इसका उनके बॉस ने बुरा नहीं माना. दोनों के रिश्ते बेहतर हो गए. आज उस पत्रकार का बॉस उसका ज़्यादा ख़्याल रखता है.
इस मिसाल से एक बात साफ़ हो जाती है. ये जानना ज़रूरी है कि आप जहां काम कर रहे हैं, वहां का माहौल कैसा है.
आप किसके साथ गाली-गलौज कर रहे हैं.
इन बातों का ख़्याल रखकर आप थोड़े-बहुत अपशब्दों का इस्तेमाल कर सकते हैं.
मगर ध्यान रखें, इससे किसी की आस्था, उसकी भावना को ठेस न पहुंचे.
वैसे भी किसी भी हथियार का इस्तेमाल सावधानी से करना चाहिए. वरना वो दुधारी तलवार साबित हो सकता है.
(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20160802-swearing-at-work-might-be-good-for-your-career" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)
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