वो कौन लोग हैं, जो सेक्स नहीं करना चाहते

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इंसानियत के इतिहास में अगर किसी चीज़ में सबसे ज़्यादा दिलचस्पी देखी गई है, तो वो है सेक्स.

फिर वो चाहे पढ़ने लिखने में, बुत या पेंटिंग बनाने में हो, या फिर दूसरी तरह की चर्चा. दूसरे मुद्दों के मुक़ाबले सेक्स पर सबसे ज़्यादा चर्चा हुई है.

ऐसे में हम अगर आपको ये बताएं कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें सेक्स में कतई दिलचस्पी नहीं होती, तो आप यक़ीन नहीं करेंगे.

मगर दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्हें कामेच्छा या यौनेच्छा महसूस नहीं होती. वो विपरीत लिंग के प्रति कोई खिंचाव महसूस नहीं करते.

सेक्स के बग़ैर भी उन्हें अपनी ज़िंदगी में कोई कमी नहीं महसूस होती.

जबकि सदियों से समाज में, लोगों के बीच यही मान्यता रही है कि सेक्स के बग़ैर ज़िंदगी अधूरी है.

ऐतिहासिक ग्रंथों में सेक्स को बहुत अहम बताया गया है.

ग्रीक पुराणों में तो यहां तक कहा गया है कि अगर आपकी सेक्स लाइफ़ सही है तो ही आपकी ज़िंदगी सही चल रही है.

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अगर ऐसा नहीं है तो आपकी ज़िंदगी बेकार है. आपको इंसान नहीं माना जा सकता.

मगर, हाल के दिनों में ऐसे लोग खुलकर सामने आ रहे हैं, जो ये कहते हैं कि उन्हें यौनेच्छा महसूस नहीं होती.

उन्हें सेक्स की ज़रूरत नहीं लगती. ऐसे लोगों को अब भी समाज में स्वीकार करने में हिचक है.

लेकिन बहुत से वैज्ञानिक हैं जो ऐसे लोगों के बारे में जानने में दिलचस्पी ले रहे हैं.

जिन्हें सेक्स की ज़रूरत महसूस नहीं होती, उसमें दिलचस्पी नहीं है, वो ख़ुद को 'एसेक्सुअल' कहते हैं.

एक मोटे अंदाज़े के मुताबिक़ दुनिया में कम से कम एक फ़ीसद लोग ऐसे हैं जिन्हें कामेच्छा महसूस नहीं होती, जिन्हें सेक्स में दिलचस्पी नहीं है.

ये भी कहा जाता है कि ऐसे लोगों में सत्तर फ़ीसद महिलाएं हैं.

लंदन के रहने वाले माइकल डोर ऐसे ही शख़्स हैं जो सेक्स की चाहत महसूस नहीं करते. उन्हें लड़कियों में, महिलाओं में कोई दिलचस्पी नहीं.

जब वो बड़े हो रहे थे तो उनके तमाम दोस्त, लड़कियों के बारे में बातें करते थे, उनसे संबंध बनाने की जुगत भिड़ाते रहते थे.

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लेकिन माइकल डोर को इसमें कोई दिलचस्पी ही नहीं थी. शुरू में तो ये कहा गया कि शायद उनमें सेक्स हॉरमोन की कमी है.

आगे चलकर जब ये हॉरमोन बनने लगेंगे तो उन्हें भी सेक्स की ज़रूरत महसूस होगी. लड़कियों के प्रति आकर्षण महसूस होगा.

मगर डोर बताते हैं कि बड़े होने के बावजूद उनकी सेक्स में दिलचस्पी पैदा नहीं हो सकी. इसीलिए उन्होंने अपने आपको 'एसेक्सुअल' कहना शुरू कर दिया.

नब्बे के दशक तक 'एसेक्सुअलिटी' के बारे में चर्चा न के बराबर होती थी.

कुछ लोगों ने इस बारे में क़िताबें लिखी थीं. लेकिन इन क़िताबों में कीड़े-मकोड़ों और दूसरे जानवरों के बीच 'एसेक्सुअलिटी' की पड़ताल की गई थी.

इंसानों की 'एसेक्सुअलिटी' गंभीरता से पड़ताल नहीं हुई थी.

इस बारे में पहला गंभीर रिसर्च, कनाडा के एंथनी बोगाएर्ट ने किया, जिन्होंने इस बारे में अपने तजुर्बों पर एक पर्चा छपवाया था.

बोगार्ट ने अपना तजुर्बा क़रीब 18 हज़ार ब्रिटिश नागरिकों पर किया था.

तभी पता चला कि बहुत से ऐसे लोग हैं जिनकी सेक्स में ज़रा भी दिलचस्पी नहीं. वो समलैंगिक भी नहीं थे. बस उनमें कामेच्छा नहीं थी.

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ऐसे लोगों को इंसान तक मानने से इनकार कर दिया गया था.

साल 2002 में अमरीका में छपे एक पर्चे में कहा गया था कि जो ख़ुद को 'एसेक्सुअल' कहते हैं, असल में वो इंसान ही नहीं.

इस पर्चे में कहा गया था कि यौनेच्छा, भगवान का वरदान है और इंसान की सबसे बड़ी पहचान है.

असल में 'एसेक्सुआलिटी' को लेकर लोगों का यही दुराव बड़ी वजह है कि वो लोग खुलकर सामने नहीं आते, जिन्हें सेक्स की चाहत नहीं होती.

अमरीका में एक बार ऐसे 169 लोगों से अपना तजुर्बा बताने को कहा गया था.

ज़्यादातर ने कहा कि जब उन्होंने अपने घर में ये बात बताई तो पहले किसी ने यक़ीन नहीं किया. फिर कुछ लोगों ने उन्हें समलैंगिक समझा.

कुछ लोगों ने ये भी कहा कि जब सही साथी मिल जाएगा तो उन्हें सेक्स की ज़रूरत और चाहत दोनों महसूस होने लगेगी.

बरसों तक समाज के तमाम वर्गों के हमले झेलने वाले समलैंगिक भी 'एसेक्सुआलिटी' से इनकार करते हैं. वो कहते हैं कि 'एसेक्सुआलिटी' जैसी कोई चीज़ नहीं होती.

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माइकल डोर कहते हैं कि कुछ लोग 'एसेक्सुआलिटी' को ब्रह्मचर्य मान लेते हैं. जबकि ब्रह्मचर्य में और 'एसेक्सुआलिटी' में बहुत फ़र्क़ है.

ब्रह्मचर्य करने वाला शख़्स, सेक्स की ज़रूरत महसूस करता है. मगर वो अपनी इच्छाओं को दबाता है.

वहीं, 'एसेक्सुआलिटी' महसूस करने वाले लोगों को यौनेच्छा महसूस ही नहीं होती.

माइकल डोर कहते हैं कि 'एसेक्सुअल' लोग भी कई तरह से विपरीत लिंग के साथी के प्रति लगाव महसूस कर सकते हैं.

कुछ लोग गले लगने की ज़रूरत महसूस करते हैं तो कुछ को इसकी ज़रूरत भी नहीं लगती. 'एसेक्सुआलिटी' को लेकर लोग भ्रमित भी हुए हैं.

इस बारे में अमरीका में 'एसेक्सुअल विज़िबिलिटी ऐंड एजुकेशन नेटवर्क' या एवेन नाम से एक ग्रुप बना है.

ये 'एसेक्सुआलिटी' महसूस करने वालों की मदद करता है.

इसने जब सेक्स की ज़रूरत न महसूस करने वालों के बीच सर्वे किया तो दिलचस्प बातें सामने आईं.

सर्वे में शामिल 70 फ़ीसद लोगों ने ख़ुद को वर्जिन बताया. 11 फ़ीसद ने कहा कि वो कुंवारे नहीं हैं, मगर फिलहाल सेक्स नहीं कर रहे.

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सात फ़ीसद ने कहा कि वो सेक्स कर रहे हैं. वहीं 17 फ़ीसद ने कहा कि उन्हें सेक्स के नाम से उबकाई आने लगती है.

चार फ़ीसद ने ये भी कहा कि वो सेक्स का आनंद लेते हैं.

कनाडा के एंथनी बोगाएर्ट कहते हैं कि 'एसेक्सुआलिटी' या सेक्स की चाहत न होने की और पड़ताल किए जाने की ज़रूरत है.

वो कहते हैं कि 'एसेक्सुआलिटी' को सही से समझकर हम सेक्स और इसकी चाहत महसूस करने वालों के बारे में समझ बेहतर कर सकते हैं.

वैसे जिन लोगों ने ख़ुद में सेक्स की चाहत न होने का एलान किया है, समाज उन्हें बुरी नज़रों से ही देखता है.

उनके साथ कमोबेश वैसा ही बर्ताव होता है जैसा सदियों से समलैंगिकों के साथ होता आया है.

इसीलिए अब माइकल डोर और एंथनी बोगाएर्ट जैसे लोग 'एसेक्सुआलिटी' को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने की वक़ालत करने लगे हैं.

वो कहते हैं कि दुनिया को समझना होगा कि कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके लिए सेक्स के बग़ैर भी ज़िंदगी में कोई कमी नहीं.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20160621-i-have-never-felt-sexual-desire" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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