अब सेक्स रोबोट बनेगा हक़ीक़त!

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आज इंसान ने हर काम के लिए मशीनी विकल्प बना लिए हैं. हर काम के लिए वैज्ञानिकों ने रोबोट बना लिए हैं, जो मुश्किल से मुश्किल काम चुटकियों में करते हैं. गणित के बड़े सवाल फ़ौरन सुलझा देते हैं. हॉलीवुड फ़िल्मों में तो ये मशीनी मानव और भी बड़े-बड़े काम करते नज़र आते हैं.
अभी हाल में आई दो हॉलीवुड फ़िल्मों 'हर' और 'एक्स मशीना' में फ़िल्म बनाने वालों ने एक नया ही ख़्वाब दिखा दिया है. इंसान के मशीन के इश्क़ में मुब्तिला होने और यहां तक कि मशीनी मानव या रोबोट से जिस्मानी ताल्लुक़ बनाने का सपना.
वैसे ये पहला मौक़ा नहीं जब इंसान ने हाड़-मांस के मानव की बजाय कल-पुर्ज़ों से बने मशीनी मानव से प्यार का सपना देखा हो.
यूनानियों ने हज़ारों साल पहले ऐसे ही किरदार की कल्पना की थी, जिनका नाम था पिग्मेलियन. ये ग्रीक शिल्पकार था, जो अपनी ही बनाई एक मूरत से मोहब्बत कर बैठा था.
ठीक उसी तरह क्या कभी इंसान को अपने ही बनाए रोबोट से प्यार होगा, क्या दोनों के बीच शारीरिक रिश्ते बनेंगे?

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आज जिस तरह साइंस ने तरक़्क़ी कर ली है. जैसे एक से बढ़कर एक तेज़ दिमाग़ रोबोट विकसित किए जा रहे हैं. उन्हें देखकर लगता है कि वो दिन दूर नहीं जब इंसान ख़ुद के प्यार के लिए, सेक्स करने के लिए मशीनी मानव बना लेगा.
हालांकि हाड़-मांस के इंसान के बजाय कल-पुर्ज़ों के मानव से प्यार और सेक्स की ये कल्पना करना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल है इसे हक़ीक़त में बदलना.
प्यार और सेक्स करने वाले रोबोट बनाने में सबसे बड़ी मुश्किल बात है, रोबोट में इंसान जैसी सोच, छुअन से लेकर भावनाएं महसूस करने तक की क्षमता विकसित करना.
आज एक से एक रोबोट हैं, जो इंसान की तरह सोचते विचारते हैं, यहां तक कि बातें करते हैं. मगर, एक इंसान और रोबोट में प्यार हो, सेक्स हो, इसके लिए और भी बहुत कुछ चाहिए.
वैसे आज की तारीख़ में ऐसी कई चीज़ें बाज़ार में हैं जिनसे आप शारीरिक सुख ले सकते हैं. कई सेक्स टॉय हैं बाज़ार में. जैसे वाइब्रेटर, जिनकी मदद से आप उत्तेजना महसूस कर सकते हैं.

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2009 में अमरीका में रियल टच के नाम से एक सेक्स खिलौना बाज़ार में आया था. जिसकी मदद से आप पोर्न वीडियो देखते समय ठीक वैसी सनसनी महसूस कर सकते थे, जैसी पोर्न वीडियो में मौजूद कलाकार महसूस करते हैं.
फिर भी रियल टच को ज़्यादा ख़रीदार नहीं मिल सके और चार साल बाद एक पेटेंट विवाद के बाद वो बाज़ार में आना बंद हो गए.
वैसे, सेक्सुअल सेन्सेशन महसूस कराने वाली ये मशीनें रोबोट नहीं सेक्स टॉय ही हैं. रोबोट तो वो हैं जो दिखने, चलने-फिरने में इंसान जैसे हों, जिनसे जिस्मानी रिश्ते बनाए जा सकें. जो यौन संबंध के बारे में सोच सकें, महसूस कर सकें.
वर्तमान में ऐसे काल्पनिक मशीनी मानव के सबसे नज़दीक जो चीज़ है वो है रियल डॉल नाम की एक मशीनी गुड़िया, जिसे अमरीका के कैलिफ़ोर्निया की कंपनी एबिस क्रिएशन्स ने बाज़ार में उतारा था. ये देखने में इंसान जैसा खिलौना था. इसकी त्वचा भी ऐसी बनाने की कोशिश की गई थी जिससे इंसान को छूने जैसा एहसास हो.

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एक ख़ास तबक़े के लोगों को ये रियल डॉल बहुत पसंद आई थी. इसकी काफ़ी ख़रीद भी हुई. इनमें से कुछ के बिगड़े मिज़ाज को ठीक करने के लिए डॉल डॉक्टर भी हैं, जो घर जाकर इन रियल डॉल्स की टूट-फूट की मरम्मत करते थे.
मगर, इन रियल डॉल्स के साथ बड़ी दिक़्क़त इनकी क़ीमत थी जो साढ़े तीन से सात लाख रुपयों तक पड़ती थी. फिर भी वो मशीनी गुड़िया ही थीं, सेक्स करने वाले रोबोट तो नहीं.
असल सेक्स रोबोट तो ऐसा होगा, जो आपकी नज़रों को, आपके इरादों को भांप सके और उसका उसी अंदाज़ में जवाब दे सके, ताकि आपको अच्छा एहसास हो. ये वो सब काम कर सके, जो शारीरिक रिश्ते बनाते वक़्त आपको पसंद आएं.
और ऐसा करते वक़्त वो आपसे ये पूछे भी कि उसकी हरकतें आपको अच्छी लगीं या नहीं.

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जानकार कहते हैं कि सेक्स टॉय या रियल डॉल से इतर, सेक्स रोबोट बनाना बेहद पेचीदी चीज़ बनाने जैसा है. उनका रंग रूप इंसान जैसा हो, उनकी त्वचा ऐसी हो, जिसे छूकर इंसान को छूने का एहसास हो.
फिर वो अपने इंसानी साथी की ज़ुबान समझ सके, उसके एहसासों को महसूस कर सके. इसमें बहुत ही ऊंचे दर्जे की इंजीनियरिंग के कमाल की ज़रूरत होगी.
सबसे पहले तो वैज्ञानिकों को ऐसी चीज़ बनानी होगी जो अपने पैरों पर खड़ा हो सके. ख़ुद का वज़न उठा सके. इंसान की शक्ल वाली सेक्स डॉल्स का वज़न ही इतना होता है कि उनका खड़े रह पाना मुश्किल होता है. मसलन रियल डॉल्स का वज़न क़रीब 47 किलो होता है.
सेक्स रोबोट ऐसा होना चाहिए जो न सिर्फ़ अपने पैरों पर खड़ा हो सके, बल्कि चल फिर भी सके, अपने हाथ-पैर घुमा सके. ये आसान काम नहीं. रोबोट बनाने वाले इंजीनियर आज तक ऐसा रोबोट नहीं बना सके हैं जो इंसानों की तरह चल-फिर सके.

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दूसरी बड़ी ज़रूरत होगी कि सेक्स रोबोट की चमड़ी इंसान जैसी हो. सिलीकॉन से बनी रोबोट की त्वचा से इंसान को छूने जैसा एहसास ही नहीं होगा. पिछले साल अक्तूबर में सिंगापुर में वैज्ञानिकों ने बनावटी त्वचा डेवेलप कर लेने का दावा किया था.
लेकिन इसमें तापमान महसूस करने, फैलने सिकुड़ने जैसे गुण नहीं थे. इंसान की चमड़ी जैसी तो ये बिल्कुल नहीं महसूस होती थी.
ये तो हुई बाहरी बनावट की बात. सेक्स रोबोट को बनाते समय वैज्ञानिकों को उसके अंदर ऐसा दिमाग़ डालना होगा कि वो शारीरिक रिश्ते बनाते वक़्त अपने इंसानी पार्टनर से बात कर सके, उसके एहसासों का जवाब दे सके, बेहतर रिश्तों के लिए नई बातें सीख समझ सके.
रोबोट बनाने का विज्ञान आज काफ़ी विकसित हो चुका है. मगर वैज्ञानिक आज भी इन मशीनी मानवों में इंसानी एहसास नहीं डाल पाए हैं. रोबोट आपके साथ शतरंज तो खेल सकता है.
मगर सेक्स कोई शतरंज का खेल नहीं, बल्कि डांस जैसा है. जिसमें दोनों डांस पार्टनर एक दूसरे के अगले क़दम को पहले से जान लें और उसी हिसाब से क़दमताल मिलाएं.

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इसके बाद सवाल पैदा होता है ज़ुबान का. रोबोट इंसानी ज़ुबान बोलने लगें, वो दिन अभी दूर हैं, बहुत दूर.
और फिर, सेक्स रोबोट में हाव-भाव भी तो डालने होंगे, जिन्हें देखकर आपको उत्तेजना का एहसास हो, उसमें बनावटीपन न हो, जिससे आपको हंसी आए.
जानकार कहते हैं कि हम अगर आगे चलकर सेक्स रोबोट बना भी पाए, तो शुरुआत में वो कार्टून जैसे होंगे.
कुल मिलाकर, परफ़ेक्ट मशीनी सेक्स पार्टनर बनाने में कई हाई लेवल तकनीकों की ज़रूरत होगी. अलग-अलग रोबोटिक और कंप्यूटर इंजीनियर्स को साथ आना होगा, एक टीम की तरह काम करना होगा.
फिर सेक्स टॉय बनाने वालों को भी इस मिशन में शामिल करना होगा. फिर हर इलाक़े और समुदाय के लोगों के एहसास, अपने साथी से उम्मीदें अलग-अलग होती हैं. उन उम्मीदों के हिसाब से अलग-अलग सेक्स रोबोट बनाना. बड़ी दूर की कौड़ी है ये.
सिर्फ़ तकनीकी चुनौतियां नहीं हैं. क़ानूनी और पैसे की दिक़्क़तें भी हैं. बस कहने को सेक्स बिकता है, कहा जाता है. असल में इसमें कोई भी कारोबारी, निवेशक पैसा लगाने का रिस्क नहीं लेना चाहता.

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एडल्ट इंडस्ट्री में काम करना, अमरीका जैसे खुले मुल्क में भी बड़ा मुश्किल है. इसके लिए क़र्ज़ मिलना भी मुश्किल होता है. एप्पल और गूगल जैसी बड़ी कंपनियां, एडल्ट कंटेंट अपने प्लेटफॉर्म पर डालने नहीं देतीं.
जब, अमरीका में सेक्स से जुड़ा कारोबार इतना मुश्किल है तो, बाक़ी देशों की तो बात ही जाने दीजिए.
वैसे लोग इतने नाउम्मीद भी नहीं. जानकार कहते हैं कि सेक्स रोबोट अचानक से आएंगे, बाज़ार में. जो ख़ास लोगों की ख़ास ज़रूरतों के हिसाब से तैयार किए जाएंगे.
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में रिश्तों, सेक्स और सेक्स टॉय के बारे में रिसर्च करने वाली शेली रोनेन कहती हैं कि तकनीकी विकास एक पेचीदा प्रक्रिया है. जब तक सेक्स रोबोट विकसित होंगे, तब तक इंसान कंप्यूटर के ज़रिए अपने साथी से रिश्ते बनाने का इतना आदी हो जाएगा कि शायद उसे सेक्स पार्टनर के तौर पर रोबोट को अपनाने में इतनी दिक़्क़त नहीं होगी.
(अंग्रेज़ी में मूल लेख <link type="page"><caption> यहां पढ़ें</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20160209-the-truth-about-sex-robots" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ़्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)
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