सुबह उठीं और 17 साल की याददाश्त ग़ायब..

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2008 की एक सुबह, 32 साल की नाओमी जेकब जब सोकर उठीं तो अपने पिछले 17 साल के जीवन के बारे में सब कुछ भूल चुकी थीं.
नाओमी भूल चुकी थीं कि वे ड्रग्स का सेवन करती थीं, कंगाल हो चुकी थीं और बेघर भी. उन्हें जो आखिरी बात याद थी, वो टीनएजर के तौर पर अपनी बहन के साथ बंक-बेड पर सोने की तैयारी और अगले दिन फ्रेंच की अपनी परीक्षा के बारे में सोचने की थी.
आठ सप्ताह के बाद उनकी याददाश्त लौटी, लेकिन इस दौरान वो खुद को 15 साल की ही समझती रहीं.
लेकिन इस दौरान उन्हें 21वीं सदी के उन सालों में तेज़ी से बदलती दुनिया की कई बातें समझनी-सीखनी पडीं जिनमें स्मार्ट फ़ोन का इस्तेमाल तो एक छोटा सा मसला था.
ऐसा इसलिए, क्योंकि नाओमी 10 साल के बच्चे की मां भी थीं.
नाओमी जेकब ने अपने उन 8 सप्ताह के बारे में 'फॉरगॉटन गर्ल' नाम से किताब लिखी है जो जल्द बाज़ार में आने वाली है.
मेडिकल साइंस के नजरिए से देखें तो जेकब का याददाश्त खोना डिसोसिएटिव एमनीज़िया है. शरीरिक रचना से जुड़े विज्ञान में इसका कोई कारण नहीं मिलता है.
हालांकि अनुमान ये जरूर लगाया जाता है कि तनाव और अवसाद की वजह से ऐसा हो सकता है.
जिन 15 साल को जेकब भूल गईं, उस दौरान उनका कारोबार चौपट हो गया था और वो बड़े पैमाने पर ड्रग्स का सेवन करती थीं.
यही नहीं, नाओमी का 6 साल की उम्र में बलात्कार हुआ था और और जब वे 20 साल की थीं, तब उनके ब्वॉय फ्रेंड ने उनका गला घोंटने की कोशिश की थी.

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डिसोसिएटिव एमनीज़िया को लेकर विशेषज्ञों में एक राय नहीं है. कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसा होता ही नहीं है.
हारवर्ड के मनोचिकित्सिक हैरिसन पोप की राय भी कुछ इसी तरह की है. इन लोगों के मुताबिक इस तरह के याददाश्त खोने के मामले 1800 से पहले कभी नहीं मिलते.
कुछ विशेषज्ञ ये भी शंका जताते हैं कि इस तरह से भूलने की बीमारी केवल अवसाद के कारण नहीं बल्कि इस दबाव से भी होती है कि हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए?

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यही वजह है कि डिसोसिएटिव डिसआर्डर के इलाज़ के साथ साथ पर्सनल डिसआर्डर और भावनात्मक अस्थिरता का भी इलाज़ किया जाता है. ऐसे लोग काफ़ी कल्पनाशील होते हैं.
याददाश्त खोने के वक्त, नाओमी जेकब मनोविज्ञान पढ़ रही थीं जिससे संभवत: ट्रॉमा और याददाश्त के काम करने में कुछ गड़बड़ी पैदा हुई होगी. संडे टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "मैं दिमाग की क्षमता को बहुत अहमियत देती हूँ. मैं ये जानती हूँ कि मैं जब ट्रॉमा या मानसिक आघात का सामना करती हूँ तो मेरा दिमाग दो अलग भागों में बंट जाता है."
वैसे आपको 2004 में प्रदर्शित फिल्म '50 फर्स्ट डेट्स' शायद याद हो. इसमें ड्रीउ बैरीमोर ने उस किरदार का अभिनय किया था जिसकी याददाश्त एक कार क्रैश के बाद, हर रात गायब हो जाती थी. इस तरह भूलने की बीमारी को साइकोजेनिक एमनीज़िया कहते हैं.
वैसे साइकोजेनिक और डिसोसिएटिव एमनीज़िया के मामले बेहद दुर्लभ होते हैं. हालांकि भूलने की बीमारी संबंधी जो ज्यादातर मामले होते हैं वो आर्गेनिक एमनीज़िया के उदाहरण होते हैं जिसमें दिमाग का कोई हिस्सा स्ट्रोक से क्षतिग्रस्त हो जाता है.
ये तंत्रिकातंत्र की बीमारी भी हो सकती है. ऐसे मरीजों की समस्या ये नहीं होती है कि वे अपना अतीत या पहचान भूल चुके होते हैं. इनकी मुश्किल ये होती है कि ये नई बातों को याद नहीं रख पाते.
इसे एंट्रोग्रेड एमनीज़िया कहते हैं. जो कान के नजदीक पाए जाने वाले हिप्पोकैंपस तंत्रिका के क्षतिग्रस्त होने सो होता है. ऐसे जिस मामले का सबसे ज्यादा अध्ययन हुआ वो था हेनरी मोलाएसन का मामला है.

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सर्जन ने उनकी मिरगी को दूर करने के लिए दिमाग के हिप्पोकैंपाई के बड़े हिस्से को हटा दिया. 1953 में हुए इस ऑपरेशन के बाद उन्हें मिरगी के दौरे पड़ने तो बंद हो गए लेकिन वो कुछ भी याद ही नहीं रख पाते थे. वो स्थायी तौर पर वर्तमान में फंस गए थे.
हालांकि उन्हें अपनी पहचान के बारे में पता था और पुरानी यादें भी थी, लेकिन उनकी कोई भी नई याद कुछ सेकेंड से ज्यादा देर तक नहीं रहती थी.
ब्रेंडा मिलनर ने मोलाएसन के मामले का सालों तक अध्ययन किया. वो बताती हैं कि वे किस तरह से उससे हर दिन नए शख्स के तौर पर मिलते थे. मिलनर के मुताबिक वे खाना खाने के आधा घंटा बाद फिर से खाने के लिए बैठ जाते थे. लेकिन अगले ही मिनट अपनी कोई योजना भूल जाते थे.
इसके अलावा ड्रग्स और शराब के अत्यधिक सेवन से भी भूलने की बीमारी हो सकती है.
शराब के लंबे समय तक सेवन से पुरानी और नई दोनों याददाश्त को खतरा हो सकता है. इसे कोरासकॉफ़ सिंड्रोम के नाम से जाना जाता है.
इससे प्रभावित लोग अतीत को लेकर कई काल्पनिक कहानियां बना लते हैं, लेकिन उन्हें यकीन होता है कि ये हकीकत है.
ट्रांसिएंट ग्लोबल एमनीज़िया कहीं ज्यादा दुर्लभ किस्म के भूलने की बीमारी है. ये मस्तिष्क में याददाश्त को प्रभावित करने वाले हिस्से में रक्त प्रवाह थम जाने से होता है.
2011 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा कई वजहों से हो सकता है और इसमें एक वजह यौन संबंधों के दौरान अति उत्साह और ऊर्जा का दिखाना भी है.

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इस मामले में 54 साल की एक महिला ने दावा किया था कि 'माइंड ब्लोइंग सेक्स' के कारण उनकी पिछले 24 घंटे की याददाश्त ही चली गई थी. लेकिन ये दावा था किसी अध्ययन का नतीजा नहीं.
वैसे एक हकीकत ये भी है कि हम सबमें भूलने की बीमारी होती है. अधिकांश लोगों को अपने जीवन के शुरुआती तीन-चार सालों के बारे में याद नहीं रहता है. जैसे जैसे हम बड़े होते हैं, वैसे बचपन की बातों को भूलते जाते हैं.
हाल के एक अध्ययन के मुताबिक इस तरह से भूलने का सिलसिला सात साल की उम्र से ज़्यादा होता है, जब हमारी याददाश्त पूरी तरह से काम करना शुरू कर देती है.
कई बार ये स्थानीय संस्कृति से भी प्रभावित होती है. उदाहरण के लिए न्यूज़ीलैंड के माओरी समुदाय के लोगों में बचपन की कहानियां सुनाने की संस्कृति होती है, तो उन्हें बचपन की यादें लंबे समय तक बनी रहती हैं.
बहरहाल, ये हमारी याददाश्त ही है जो हमें बनाती है. हमारी पहचान को कायम करती है. रिश्ते, उम्मीद और सपने सबकुछ याददाश्त से ही बनते हैं. जब हम याददाश्त खोते हैं तो हम खुद को खो देते हैं.
( डॉक्टर क्रिस्टियन जारेट ब्रिटिश साइकोलॉजिकल सोसायटी रिसर्च डाइजेस्ट ब्लॉग का संपादन करते हैं. उनकी आधुनिकतम किताब ग्रेट मिथ्स ऑफ़ द ब्रेन है)
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