नाज़ायज मौकों का फ़ायदा उठाना आसान नहीं

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हाल के दिनों में मानव व्यवहार से संबंधित, बंदरों पर बना एक वीडियो ख़ासा वायरल हुआ.
एमरी यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर फ़ांस द वाल ने इसमें बंदरों पर हुई एक रिसर्च को वीडियो पर डाला जिसे लाखों लोगों ने देखा.
इस रिसर्च को वे मानवों से जोड़कर देखते हैं. ये पूरी चर्चा टेड टॉक (दुनिया भर के बौद्धिक चिंतकों के वक्तव्यों की एक सीरीज़) से शुरू हुई है.
द वाल ने अपने एक प्रयोग में दो बंदरों को एक ही काम के बदले दो तरह का खाना दिया. एक बंदर को उसी काम के लिए बेहतर और दूसरे को उसी काम की एवज में कमतर खाना दिया गया.
पहले से एक साथ रह रहे बंदरों को दो पिंजड़ों में डाल दिया गया था. बंदरों को ट्रेन किया गया कि वे खीरे या ककड़ी का टुकड़ा देने पर, पत्थर का टुकड़ा दें और ये काम वे आसानी से कर देते थे.
बंदर को भी अन्याय खटकता है
बंदरों को खीरे की जगह अंगूर ज़्यादा अच्छे लगते हैं. जब शोधकर्ताओं ने एक बंदर को अंगूर देना शुरू किया, और दूसरे को ककड़ी या खीरा ही दिया, तो दूसरे पिंजड़े का बंदर ग़ुस्सा हो गया.
और उसने खीरे का टुकड़ा लेने से इनकार ही नहीं किया बल्कि उसे फेंक दिया. यानी, जो चीज पहले स्वीकार्य थी, वह पड़ोसी को समान काम पर बेहतर सुविधा मिलने पर अस्वीकार्य बन गई.

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इस वीडियो में एक पल ऐसा भी आता है जब खीरे का टुकड़ा बंदर लैब अस्सिटेंट पर फेंक देता है. बिना मनोवैज्ञानिक हुए ये जानना सहज है कि इंसानों का व्यवहार भी कमतर सुविधाएं मिलने वाले बंदर की तरह होता है.
यानी, अपने साथ हुआ अन्याय चुभता है. चाहे वो बंदर ही क्यों ना हो. द वाल ऐसे और उदाहरणों की मदद से समझाने की कोशिश करते हैं कि नैतिक मनोभाव हमारी जैविक विरासत से हमें मिला है.
दरअसल हमारे पूर्वज समतावादी समूह में रहते होंगे, और इसके लिए समूह के सदस्यों में परस्पर सदभाव की ज़रूरत होती थी.
द वाल के परिणाम ने हमें ये भी बताया कि इंसानों की प्रजाति से बेहद निकटता वाले बंदरों पर सामाजिक तुलना का असर होता है.
लेकिन इस प्रयोग से ये ज़ाहिर नहीं होता है कि बंदर न्याय चाहते हैं.
बेहतर खाना ना मिलने पर एक बंदर नाराज हुआ. लेकिन इस बात के कोई सबूत नहीं मिले कि बेहतर खाना मिलने वाला बंदर स्थिति से ख़ुश था या नाख़ुश.
आत्मग्लानि का भाव
वैसे इंसानों में तुलनात्मक तौर पर ज्यादा पुख्ता सबूत बताते हैं कि हम कितने प्रतिस्पर्धी क्यों ना हों, निष्पक्षता का भाव हमारी सोच के अंदर कहीं ज़रूर रहता है.
अमरीका की नेशनल बॉस्केटबॉल एसोसिएशन के खिलाड़ी दुनिया भर में सबसे ज़्यादा पैसे कमाने वाले खिलाड़ियों में माने जाते हैं.

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2007-08 के सीज़न में सबसे ज़्यादा भुगतान पाने वाले खिलाड़ियों को सालाना दो करोड़ डॉलर से ज़्यादा की रकम मिली जबकि लीग के 50 खिलाड़ियों का वेतन औसत एक करोड़ डॉलर सालाना से ज्यादा था.
2007-08 का सीज़न इसलिए भी दिलचस्प था क्योंकि मनोवैज्ञानिक ग्रीम हेंस और थॉमस गिलोविच ने इस दौरान 100 एनबीए खेलों की वीडियो रिकॉर्डिंग को देखा.
उन्होंने पाया था कि कई बार रेफ़री फ़ाउल करार दे देते थे जबकि खिलाड़ियों को ये मालूम होता था कि कोई फ़ाउल नहीं हुआ है.
जब भी फ़ाउल होता है तो जिस खिलाड़ी के साथ फ़ाउल होता है उसे फ़्री थ्रो का मौका मिलता है, ताकि वह अपनी टीम के लिए अंक बना सके.
हेंस और गिलोविच ने इस बेहद प्रतिस्पर्धी खेल में भारी भरकम पैसे वाले खिलाड़ियों के उस स्वभाव का अध्ययन किया जब खिलाड़ियों को मालूम था कि उनके साथ फ़ाउल नहीं हुआ है. लेकिन उन्हें रेफरी ने फ़्री थ्रो का मौका दिया था.
ऐसा मौका भले ही गलती से मिला हो लेकिन खेल के लिए ये पूरी तरह फिट होता है.
इसके ज़रिए खिलाड़ी स्कोर बना सकते हैं, टीम को जीत दिला सकते हैं.
हेंस और गिलोविच ने पाया कि ग़लती से मिले नाजायज़ मौके पर खिलाड़ियों का स्कोर बनाने का औसत कम था. यह लीग के औसत स्कोरिंग से भी कम था, खिलाड़ियों के निजी औसत से भी कम था.
नहीं मिलता है फ़ायदा
खासकर जब टीम को बढ़त मिली हो और उन्हें अंकों की ज्यादा जरूरत नहीं हो, तब तो ऐसे मौके पर खिलाड़ियों से स्कोर बनता ही नहीं था.

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इतना ही नहीं, 100 एनबीए मैचों के वीडियो से स्पष्ट हुआ कि जब टीम हार रही होती थी और उन्हें अंकों की बुहत ज़्यादा ज़रूरत होती तब भी बेईमानी से मिले मौके पर खिलाड़ी कम ही स्कोर बना पाते थे.
सबसे ज्यादा पैसे और सबसे ज्यादा प्रतिस्पर्धी खेल में भी गलती से मिले मौके के कारण खिलाड़ी अपराध बोध महसूस करते थे. यानी उनके अंदर कहीं ना कहीं निष्पक्षता का भाव मौजूद होता है.
शोधकर्ताओं के मुताबिक बॉस्केटबॉल खिलाड़ियों का आकलन बताता है कि अगर हमें गलती से कोई फायदा मिलता है, भले ही वो हमें लाभ पहुंचाने वाला हो, हमारे अंदर कुछ ना कुछ असहजता आ ही जाती है और हम उस मौके का पूरा फायदा नहीं उठा पाते हैं.
<italic><bold>अंग्रेज़ी में <link type="page"><caption> मूल लेख</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20150419-are-you-honest-without-realising" platform="highweb"/></link> यहां पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ़्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.</bold></italic>
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