चलते-फिरते आए आइडिया, मिले 220 अवॉर्ड

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कहावत है कि 'दिल जो कहे वही करें, पैसे के लिए मत करें.' शायद यह बात डॉ रॉबर्ट लैंगर के लिए सटीक बैठती है.
वह ऐसे वैज्ञानिक हैं जिन्हें उनकी खोजों के लिए 220 से भी अधिक अवॉर्ड मिल चुके हैं. वह ऐसे इंजीनियर हैं, जिनका सबसे ज्यादा हवाला दिया जाता है.
अवॉर्ड्स की उनकी सूची में अब एक और अवॉर्ड जुड़ने जा रहा है.
मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) से जुड़े डॉ रॉबर्ट लैंगर को 'दवाओं पर शरीर की प्रतिक्रिया' पर किए गए काम के लिए क्वीन एलिज़ाबेथ प्राइज़ फ़ार इंजीनियरिंग की ओर से अवार्ड दिया जा रहा है.
एमआईटी की <link type="page"><caption> वेबसाइट के अनुसार</caption><url href="http://web.mit.edu/langerlab/langer.html" platform="highweb"/></link>, डॉ. रॉबर्ट लैंगर ने अबतक 1,300 से भी अधिक शोधपत्र लिखे हैं. दुनिया भर में उनके नाम 1,080 पेटेंट हैं. उनके पेटेंट के लाइसेंस 3,00 फ़ार्मास्यूटिकल, केमिकल, बॉयोटेक्नोलॉजी और मेडिकल उपकरण बनाने वाली कंपनियों के पास हैं.

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डॉ रॉबर्ट लैंगर की इस खोज से दुनिया भर में उन बीमारियों से पीड़ित रोगियों को मदद मिलेगी, जिन्हें सामान्य से बड़े आकार के अणुओं वाली दवाएं लेनी पड़ती हैं.
वह कहते हैं कि प्लास्टिक, अणुओं की एक लंबी श्रृंखला जैसा होता है. अगर आप उच्च क्षमता के एक सूक्ष्मदर्शी से देखें तो इन छोटे-छोटे अणुओं में एक दूसरे से जुड़े बहुत ही सूक्ष्म रास्ते दिखेंगे. इन्हीं सूक्ष्म रास्तों से दवाएं कोशिकाओं तक पहुंचती हैं.
ये ऐसा है जैसे आप किसी शहर के किसी इलाके में हैं, जहां एक ही किस्म की सड़कें एक दूसरे से जुड़ी हैं तो आपको अपने गंतव्य तक पहुंचने में काफी समय लगेगा.
कुछ अणु छोटे होते हैं पर जो अणु बड़े होते हैं उन्हें कोशिकाओं में पहुंचने में मुश्किल आती है.
डॉ रॉबर्ट कहते हैं कि इस तरह की बहुत सी दवाएं हैं जिन्हें आप मुंह से नहीं ले सकते हैं क्योंकि उनके अणु इतने बड़े होते हैं कि कोशिकाएं उन्हें आसानी से अवशोषित नहीं सकती हैं.

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उनके अनुसार, “हमने जो तकनीक विकसित की है वो प्रोस्टेट कैंसर जैसे रोगियों को दी जाने वाली दवाओं में इस्तेमाल हो रही है. इसके अलावा शिजोफ़्रेनिया और टाइप टू डायबिटीज़ के रोगियों को भी दवा देने में इस्तेमाल की जा रही है. इसी तरह के कई अन्य क्षेत्र हैं जहां इसकी क्षमता को परखा जा रहा है.”
डॉ रॉबर्ट की खोज से दुनिया के दो अरब लोगों को फ़ायदा पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है.
वह कहते हैं, “नई वैक्सीन या मलेरिया जैसे रोगों की नई दवाओं में इस तकनीक का इस्तेमाल कारगर हो सकता है.”
ये एक समस्या रही है कि कुछ दवाएं अधिक मात्रा में इस्तेमाल किए जाने से हानिकारक असर पैदा करती हैं जबकि कम मात्रा में दिए जाने से उनका असर नहीं होता.
डॉ रॉबर्ट की खोज से इस समस्या के समाधान की उम्मीद बंधी है.
उन्होंने टिश्यू इंजीनियरिंग पर भी काम किया है. वह बताते हैं, “मैंने और एमआईटी के एक सर्जन डेव कैंटी ने इस पर काम किया है. विचार था कि प्लास्टिक अणुओं का ऐसा त्रिआयामी डिज़ाइन बनाया जाए जो जैविक ऊतकों (टिश्यू) की तरह व्यवहार करे. इन्हें स्टेम सेल्स के रूप में भी बनाया जा सकता है और जली हुई त्वचा के इलाज के लिए नई त्वचा बनाने में इसका अब इस्तेमाल किया जा रहा है."

"इसके अलावा रीढ़ की हड्डी क्षतिग्रस्त होने से लकवा के शिकार या क्षतिग्रस्त ऊतक वाले मरीजों में भी इस तकनीक के इस्तेमाल की संभावनाओं पर काम हो रहा है.”
असल में रॉबर्ट ने इंजीनियरिंग के मार्फ़त चिकित्सकीय समस्याओं का हल ढूंढने में ज़्यादा सफलता पाई है.
इसकी वजह भी वह बताते हैं, उन्होंने दो अलग क्षेत्रों में काम किया. पहले उन्होंने केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और उसके बाद एक अस्पताल के सर्जरी लैब में पोस्ट डॉक्टोरल शोध किया.
वह कहते हैं, "अधिकांश आइडिया इसलिए आए क्योंकि मैं इंजीनियरिंग और मेडिसिन दोनों के बारे में कुछ-कुछ जानता था."
ये आइडिया उन्हें अपने स्टूडेंट्स से बात करते, चलते फिरते, टीवी देखते या म्यूज़िक सुनते हुए आए.
वह कहते हैं कि, "कुछ हासिल करना है तो युवा पीढ़ी को वही करना चाहिए जो उनका दिल करता है, न कि पैसे या अन्य वजहों से. किसी काम को करने के लिए जुनूनी होना चाहिए. यह बहुत अहम बात है."
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