फेसबुक के एक्सपेरिमेंट से मचा बवाल

इमेज स्रोत, PRESS ASSOCIATION
फेसबुक ने अपने सात लाख यूज़र्स की जानकारी के बिना उनके साथ जो मनोवैज्ञानिक परीक्षण किए हैं उसकी कड़ी आलोचना हो रही है.
इस टेस्ट के तहत फेसबुक ने लोगों की न्यूज़ फीड में गड़बड़ी की और ये तय किया कि यूज़र्स किस तरह के भावनात्मक संदेश देखें.
यह शोध दो अमरीकी विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर किया गया था ये देखने के लिए कि ‘क्या एक निश्चित तरह के भावनात्मक संदेश देखने पर क्या बाकी लोगों के पोस्ट करने का तरीका बदल जाता है.’
फेसबुक ने कहा है कि उसने किसी भी यूज़र के बारे में आवश्यक रुप से जानकारी नहीं जुटाई है.
उनका कहना था, ‘’जो भी आकड़े हैं वो किसी एक व्यक्ति विशेष के फेसबुक अकाउंट से जुड़े हुए नहीं हैं.’’
इस शोध में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया और कॉरनेल यूनिवर्सिटी जुड़े हुए थे.
कड़ी आलोचना
कई लोगों ने इस शोध के तरीकों पर सवाल उठाए हैं और पूछा है कि इस तरह के शोधों का क्या प्रभाव होगा.

केट क्रॉफर्ड ने ट्विटर पर लिखा है, ''फेसबुक के प्रयोग को वही कहा जाए वो है- एक संकेत मूल्यों, ताकत और मर्जी के बारे में नहीं सोचने का.’’
लॉरेन विन्सटींन ने भी ट्विटर पर कहा है, ''फेसबुक अपने प्रयोग से लोगों को दुखी कर रहा है. क्या गड़बड़ हो सकती है?’’
इस बीच लेबर पार्टी के सांसद जिम सेरिडान ने इस मामले में जांच की मांग कई है.
ब्रितानी अख़बार गार्डियन ने सेरिडान के हवाले से कहा है, ''ये बहुत ताकतवर चीज़ है और अगर लोगों को बचाने के लिए कोई क़ानून नहीं है तो क़ानून होने चाहिए.’’
उन्होंने कहा, ''ये लोगों के निजी जीवन में फेरबदल कर रहा है और मैं फेसबुक की इस क्षमता से दुखी हूं. चाहे कोई भी हो उसे लोगों के जीवन में इस तरह से बदलाव करना सही नहीं है.’’
हालांकि इलिनोय के एल्महर्स्ट कॉलेज की मनोविज्ञान की प्रोफेसर कैथरीन स्लेज़ मूर का कहना है कि यह प्रयोग इतना भी खतरनाक या गंभीर नहीं है और न ही इसके परिणाम बहुत अचंभित करने वाले.
इस शोध के संबंध में आई रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन लोगों की न्यूज़ फीड में नेगेटिव पोस्ट आती हैं उनमें नेगेटिव पोस्ट लिखने की प्रवृत्ति उस समय कम हो जाती है.
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