'गुप्त आज़ादी' को साझा करतीं ईरानी महिलाएं

ईरानी महिलाएं, बिना हिजाब के

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    • Author, नौशीन ईरानी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

ईरानी महिलाएं बिना हिजाब पहने ली गईं अपनी तस्वीरें एक ख़ास फ़ेसबुक पेज पर पोस्ट कर रही हैं, जिसका नाम है 'माइ स्टेल्दी फ़्रीडम' यानी मेरी गुप्त आज़ादी.

यह फ़ेसबुक पेज महिलाओं के लिए अनिवार्य हिजाब से छुटकारा पाकर आज़ादी के कुछ पल साझा करने का एक मंच बन गया है.

इन तस्वीरों में उन्हें गलियों में, समुद्र तट पर या गाड़ी चलाते हुए देखा जा सकता है. ब्रिटेन की ईरानी मूल की पत्रकार मसीह अलीनेजाद ने हाल ही में यह पेज बनाया है जिसे बहुत कम वक्त में 2,48,000 लाइक मिले हैं.

<link type="page"><caption> कान फिल्म उत्सव में चुंबन से ईरान में विवाद</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2014/05/140520_iranian_backlash_hatami_kisses_pk.shtml" platform="highweb"/></link>

जब अलीनेजाद ने अपने फ़ेसबुक पेज पर खुद अपनी कुछ तस्वीरें बिना हिजाब के पोस्ट की तों उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उन्हें इतनी ज़्यादा प्रतिक्रिया मिलेगी.

इसके बाद तो उन्हें ईरान में रहने वाली महिलाओं की बहुत सारी तस्वीरें मिलने लगीं. इसीलिए उन्हें एक अलग पेज ही बनाना पड़ा, जो अब एक सत्यापित फ़ेसबुक एकाउंट है.

तस्वीरों के साथ कुछ महिलाओं ने अपनी ज़िदंगी की कहानी भी बताई कि कैसे उनके परिवार और समाज के पुरुष उनकी ज़िंदगी को नियंत्रित कर रहे हैं उनके लिए 'फ़ैसले कर रहे' हैं.

उन्होंने अपने 'बिना हिजाब वाले अनुभवों' को साझा किया है, यह बताते हुए कि 'उन्हें अपने बालों में हवा कितनी प्यारी लगी'. भले ही उनकी तथाकथित आज़ादी 'कुछ ही सेकेंड कायम रही.'

गांधी स्ट्रीट

अलीनेजाद और अन्य महिलाओं का कहना है कि महिलाओं को हिजाब पहनने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए.

ईरानी महिलाएं, बिना हिजाब के

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ईरानी कानून के अनुसार महिलाओं के लिए सार्वजनिक स्थानों पर हिजाब पहनना अनिवार्य है.

कुछ यूज़र्स ने अपने कड़वे अनुभवों के बारे में भी बताया कि उन्हें अक्सर इस्लामी ड्रेस कोड का पालन करने की 'याद दिलाने' वाली मॉरल पुलिस द्वारा या तो चेतावनी दी गई या गिरफ़्तार कर लिया गया.

<link type="page"><caption> इन लड़कियों के भी सपने हैं...</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/11/131125_girl_day_effect_declaration_gallery_an.shtml" platform="highweb"/></link>

ईरान में महिलाओं पर इन सभी टिप्पणियों और प्रतिबंधों ने मुझे तेहरान में गुज़ारे एक गर्म दिन की याद दिला दी. उस दिन मैंने और मेरी दोस्त समर ने अपने घर के नज़दीक गांधी स्ट्रीट में 'विंडो शॉपिंग' के लिए जाने का फ़ैसला किया.

इस गली का नाम महात्मा गांधी के नाम पर रखा गया है.

दो आज्ञाकारी लड़कियों की तरह, घर से बाहर निकलने से पहले, हमने एक गहरे रंग का मानटीउ (टखने तक लंबा थोड़ा ढीला कुर्ता) पहना और अपने सिरों को स्कार्फ़ों से इस तरह ढका कि सिर्फ़ सामने के बालों का थोड़ा सा हिस्सा नज़र आए और बाकी सब ढका रहे.

जैसे ही हम गली में दाखिल हुए हमने देखा कि महिलाएं कई तरह के, और तो और रंगीन मानटीउ पहने हुई थीं. उनमें से कुछ ने तंग और छोटे कुर्ते पहने हुए थे कुछ ने लंबे और ढीले. कुछ ने भड़कीला मेकअप किया हुआ था तो बाकी के चेहरे साफ़ थे.

गांधी स्ट्रीट में पूरे साल भर हमेशा भीड़ रहती है. तेहरान में यह महिलाओं की पसंदीदा जगह है क्योंकि यहां बहुत से कपड़ों और जेवरों की दुकानें हैं. यहां आपको ताज़ा फ़ैशन की चीज़ें मिल जाएंगी.

लेकिन जिस चीज़ ने हमारा ध्यान खींचा, वो थी मॉरल पुलिस की सफ़ेद और हरी वैन, जो गली के पार तैनात थी. साल के उस वक्त, उन गर्मी वाले दिनों में कुछ महिलाओं ने हल्के रंग और थोड़ी छोटी सलवारें और सैंडल पहन रखी थी.

ऐसी वैनों को देखने के बाद ईरान में अक्सर महिलाएं ऐसा जताती हैं कि वो हैं ही नहीं और अपना काम करती रहती हैं.

कभी न ख़त्म होने वाला संघर्ष

मैं यह सोचकर अपनी एक दोस्त के साथ बात करती रही कि वह सुन रही है, लेकिन अचानक मैंने ध्यान दिया कि लोग एक जगह घूर रहे हैं.

मुझे दूर से समर के पागलों की तरह चीखने की आवाज़ आई और फिर मैं मुड़कर उसे ढूंढने लगी. मुझे वह मॉरल पुलिस की एक महिला सदस्य से बहस करती नज़र आई, जो उसके पास पहुंची हुई थी.

आश्चर्यजनक रूप उसने मेरी दोस्त को वैन में बैठने को कहा क्योंकि उसने हिजाब ठीक से नहीं पहना हुआ था.

<link type="page"><caption> जहाँ घर में ही महफूज़ नहीं औरत</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/11/131125_women_iraq_risk_gallery_vr.shtml" platform="highweb"/></link>

ईरानी महिलाएं, बिना हिजाब के

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हिजाब ठीक नहीं था! यह पुलिस क्या कह रही है? मुझे तो वह ठीक ही लग रही है!

मेरी दोस्त ने वैन में बैठने से इनकार कर दिया क्योंकि उसे लग रहा था कि उसका हिजाब बिल्कुल ठीक था और उसने तो मेकअप भी नहीं किया था, जिससे लोगों का ध्यान खिंचे.

बहरहाल, उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे वैन में डाल दिया गया और मुझे कहा गया कि मैं उसके परिजनों को ख़बर कर दूं.

मुझे कहा गया कि उसके घर से बदलने के लिए मैं ढीला और लंबा कुर्ता लाऊं, दरअसल एक टेंट. मैंने उसके अभिभावकों को सूचित किया और हमने 'टेंट' ले लिया. कैद के दौरान उससे कहा तो गया ही, एक काग़ज़ पर दस्तखत भी करवाए गए जिसमें लिखा था कि वह इस्लामिक कानूनों का पूरी तरह पालन करेगी.

उस दिन के बाकी वक़्त और फिर अगले हफ़्ते तक हम यही सोचते रहे कि हुआ क्या था.

क्या मेरी दोस्त को इस तरह अपमानित करने की ज़रूरत थी? हम अचंभित थे! ईरानी महिलाओं की अपने मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्ष की यह कभी न ख़त्म होने वाली कहानी है.

फिर भी, अलीनेजाद का विचार बदलाव की दिशा में एक कदम हो सकता है, चाहे यह कितना ही छोटा क्यों न हो.

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