कीनियाः दुनिया की पहली महिला मसाई लड़ाका

महिला मसाई लड़ाका

मिंडी बडगो ज़िंदगी के चौराहे पर खड़ी थीं. वह कैलिफ़ोर्निया और वाशिंगटन डीसी में पली बढ़ीं. वह एक ऐसे परिवार से आती हैं जो उन्हें बड़े करियर के लिए बिज़नेस स्कूल भेजना चाहता था.

मगर मिंडी कीनिया के सफ़र पर निकल गईं. उन्होंने अपने जीवन में वह करना तय किया जो किसी महिला ने अब तक नहीं किया था. वे पहली महिला मसाई योद्धा बनीं.

मिंडी बताती हैं, "मैं तब 27 साल की थी और बेसब्री से ज़िंदगी के मायने तलाश रही थी. मैं अपने भीतर क़ैद एक पैशन को महसूस कर रही थी. कुछ अलग करना चाहती थी."

उन्होंने कहा, "मैंने बिज़नेस स्कूल में अप्लाई किया. तभी मैंने एक संस्था के बारे में सुना जो कीनिया में क्लीनिक शुरू कर रहे थे. मैं उनके साथ कीनिया चली गई."

मिंडी ने बताया कि जब क्लीनिक बन रहा था, उसी दौरान वह मसाई जनजाति के कुछ सदस्यों से मिलीं. उनके साथ बरछी, भाला और तलवार हमेशा रहती थी.

वे बिना किसी डर भय के जानवरों से भरे जंगल में घूमते रहते थे. भैंसों, गायों और हाथियों के झुंड के साथ वे बेहद आत्मविश्वास के साथ घूमते देखे जाते थे. उनका आत्मविश्वास देख कर मिंडो सोचती कि काश उनका एक फ़ीसदी हिस्सा भी उनके भीतर होता.

लड़ाकापन

आमतौर पर मसाई को एक लड़ाकू जनजाति माना जाता है. अपने भीतर के लड़ाकेपन को महसूस करते हुए मिंडी को लगा कि वह सही जगह पहुंच गई हैं.

क्लीनिक बनने के अगले दो सप्ताह के दौरान उनकी मसाई जनजाति के लोगों से नज़दीकी काफ़ी बढ़ गई. उस इलाक़े के मुखिया का नाम विंस्टन था.

मिंडी ने कहा, "एक दिन चलते चलते मैंने विंस्टन से पूछा, तो मसाई में कितनी महिला लड़ाका हैं. उन्होंने बताया, एक भी नहीं. विंस्टन ने कहा कि महिलाएं पुरूषों जितनी बहादुर और मज़बूत नहीं होती. मुझे लगा कि यही सोच तो अपने देश के भी लोगों की है."

विंस्टन ने मिंडी को बताया कि जानवरों से अपने क़बीले की रक्षा, क़बीलों की आपसी लड़ाई लड़ना, अगली पंक्ति में खड़े होकर लड़ना ये सब करना पड़ता है.

मिंडी ने कहा, "मैंने कहा कि ये सारे काम तो एक महिला भी कर सकती है. इस पर विंस्टेन बोले, ठीक है, यदि आप ऐसा सोचती हैं तो मैं आपको मसाई लड़ाका बनाने के लिए तैयार हूं. मगर इसके लिए तैयारी करनी पड़ेगी. और कई चुनौतियों को पूरा करना होगा. उसमें वक्त लगा... हां, यही तो चाहती थी मैं."

मिंडी तुरंत तैयार हो गईं. उसके एक दिन बाद एक मसाई महिला उनके पास आई. उसने मिंडी से कहा, "मैंने सुना है कि आप महिला लड़ाका बनना चाहती हैं. यदि आपमें ऐसा बनने की क़ाबलियत है तो मैं बता दूं कि हम मसाई औरतें पीढ़ियों से ऐसा करना चाहती थीं. इसलिए अच्छा होगा कि आप इसे गंभीरता से लें."

सपना

मसाई लड़ाका

उस समय मिंडी को लगा कि ये सपना अकेला उनका नहीं है. उन्होंने जंगल में सात अन्य मसाइयों के साथ रहना शुरू कर दिया.

शुरू में मिंडी ने अपनी एक दोस्त बेकर को साथ ले जाना चाहा. मगर विंस्टन ने यह कहते हुए मना कर दिया कि आप तो वैसे भी मरने वाली हो. आप मसाई नहीं हो. हमारी संस्कृति में पली बढ़ी नहीं हो. लेकिन चूंकि आप अपने फ़ैसले के लिए प्रतिबद्ध हो. उसने मिंडी को अंग्रेज़ी बोलने वाले मसाई लड़ाके से मिलवाया. वह महिला सशक्तिकरण के प्रति बेहद सचेत इंसान है और कीनिया में मसाई संस्कृति में बड़ा हुआ है.

उसने कहा, "मैं वादा तो नहीं करता कि आपकी जान को कोई ख़तरा नहीं होगा, न ही ये कि आप लड़ाका बनने में सफल हो जाएंगी. मगर कोशिश कर सकते हैं."

एक गाइड के तौर पर वह मिंडी के साथ रहा. मिंडी छह और मसाई के साथ जंगल में रहने लगी.

शुरूआत में मिंडी को बहुत मुश्किलें आईं. मसाई जानवरों का ख़ून और दूध उनके खानपान का मुख्य हिस्सा है. वे बकरों को मार कर खाते थें.

पहले ही दिन मिंडी को जंगल में लाया गया और एक ज़िंदा बकरा दिया गया. बताया गया कि क्या करना है.

मिंडी ने कहा, "मुझे उस बकरे को मारना पड़ा. अगर नहीं मारती तो हमें उस दिन का खाना नहीं मिलता. मेरे लिए वह पल बहुत मुश्किल था. जी में आया कि वहां से भाग जाऊं."

दुश्वारियां

उन्होंने कहा, "मगर फिर हिम्मत बटोरी. मसाइयों की ही तरह उस बकरे का ख़ून भी पीना पड़ा. मैं वो सब करना चाहती थी जो मसाई करते हैं. मैं नहीं चाहती थी कि उनके और मेरे रहन सहन में कोई अंतर ना महसूस हो."

इन सबके बावजूद मिंडी ने इस कोशिश को जारी रखना तय किया. <link type="page"><caption> पश्चिम</caption><url href="" platform="highweb"/></link> में रहने वाले किसी व्यक्ति के लिए यह सब बहुत दुश्वारियों भरा था.

उन्होंने कहा, "शुरू में वे सोचते थे कि मैं ज्यादा दिन तक टिक नहीं पाऊंगी. मगर दिन बीतते गए, सप्ताह बीतने के बाद मेरा आत्मविश्वास आ गया. कई रोंगटे खड़े करने वाले अनुभव हुए. एक दिन तो ऐसा हुआ कि एक हिप्पो ने मुझे लगभग निगल ही लिया था."

मिंडी बताती हैं, "हम एक रास्ते से जा रहे थे. पास में हिप्पो का एक तालाब था. मैं अपने दल में सबसे आगे थी. पता ही नहीं चला कि कब एक हिप्पो रास्ते में आ गया. मेरे पैर उसके ऊपर पड़ गए. मैं भाग कर पेड़ पर चढ़ गई थी. वहां कोई हिप्पो से भिड़ता नहीं था."

इस दौरान एक वक्त ऐसा भी आया जो मिंडी के लिए बेहद नाज़ुक और ख़तरनाक साबित हुआ.

ख़तरनाक मिशन

मसाई क्रिकेट टीम

मिंडी कहती हैं, "एक मौक़ा ऐसा आया जब मैंने सबकुछ छोड़ने का तय कर लिया था. छह हफ्ते बीत गए थे. हम बेहद ख़तरनाक मिशन पर थे. हम भैंसों के मैदान में थें. इसके पहले जब भी मेरे पास कोई जानवर आता मैं वहां से भाग जाती थी."

उन्होंने कहा, "मगर फिर मैंने सोचा कि एक लड़ाका भागता नहीं. वह तो हर मुश्किल का सामना करता है. मैं 1100 भैंसों के बीच थी. फुफकारती, रंभाती भैंसें. मैं सबसे भिड़ गई. सबसे पहले वार मैंने किया. उस शाम अभियान ख़त्म हो गया. मसाई ने मान लिया कि मैं उनकी तरह ही बहादुर हूं. उन्होंने मुझे अपने क़बीले में शामिल कर लिया और मुझे पहली महिला लड़ाका का दर्जा दिया गया."

वह यादगार पल था मिंडी के लिए. हालांकि ज्यादातर मसाइयों ने उन्हें स्वीकार नहीं किया.

मगर मसाइयों का ख़ास समूह मानता है कि मसाई परंपरा और संस्कृति को बचाए रखने के लिए इस तरह के प्रयास सराहे जाने चाहिए.

मिंडी ने अपने अनुभवों पर एक किताब "वारियर प्रिंसेस, माई क्वेस्ट टू बिकम फर्स्ट फ़ीमेल मसाई वारियर" लिखी है.

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