चीनी चावल में सीसा ख़तरनाक स्तर पर

अमरीका में बाहर के देशों से आयात किए जाने वाले चावल की जांच-पड़ताल से पता चला है कि इसमें सीसे की मात्रा निर्धारित सुरक्षा मानकों से कई गुणा ज़्यादा है.
अमरीका के खाद्य और औषधि प्राधिकरण (एफ़डीए) के अनुसार कुछ नमूनों में तो सीसे की मात्रा 'अल्पकालिक कुल सहनीय ग्रहण (पीटीटीआई)' से 120 फ़ीसदी तक अधिक थी.
अमरीकी रसायन संस्था की बैठक में रखी गई इस रिपोर्ट ने पहले ही चावलों में सीसा पाए जाने के मामले को और संजीदा बना दिया है.
एफ़डीए ने बीबीसी को बताया कि वह इस शोध का अध्ययन करेगा.
पानी से प्रदूषण
सीसा कई अंगों और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के लिए ख़तरनाक माना जाता है.
ख़ासतौर पर बच्चों के लिए यह ख़तरनाक है. क्योंकि ज़्यादा सीसा उनके विकास को काफ़ी हद तक प्रभावित कर सकता है.
चावल की सिंचाई में ज़्यादा पानी की ज़रूरत होती है.
इसलिए यह अन्य मुख्य खाद्य पदार्थों के के बजाए पानी में मौजूद प्रदूषित पदार्थों के प्रति अतिरिक्त संवेदनशील होता है.
हाल ही के अध्ययनों में चावल में आर्सेनिक की मात्रा का पता चला है.
इसके बाद ब्रिटेन की खाद्य गुणवत्ता संस्था और फिर एफ़डीए ने भी इसके उपभोग को लेकर परामर्श जारी किया है.
हालांकि अन्य धातुएं भी कम ख़तरनाक नहीं हैं.
न्यू जर्सी के मान्मथ विश्वविद्यालय के डॉ साननगुआरी टोन्गेसाई कहते हैं, "उनकी टीम ने स्थानीय दुकानों से ख़रीदे गए कई ब्रांड के आयातित चावलों की जांच की है."
सबसे ख़तरनाक चीनी, ताइवानी चावल
अमरीका अपने चावल उपभोग का सात फ़ीसदी तक आयात करता है.
डॉ साननगुआरी की टीम ने भूटान, इटली, ताइवान, चीन, थाइलैंड, इज़्राइल, चेक रिपब्लिक और भारत के आयातित चावलों की जांच की.

ये देश अमरीका के कुल चावल आयात में 65% का योगदान करते हैं.
टीम ने हर देश के चावल में सीसे की मात्रा की जांच की और उसकी रोज़मर्रा में सीसे के उपभोग से गणना की.
इसके परिणाम पर्यावरण विज्ञान और स्वास्थ्य जनरल के दूसरे भाग में प्रकाशित किए जाएंगे.
डॉ साननगुआरी कहते हैं, "एफ़डीए के अनुसार सेहत के लिए ख़तरनाक होने के लिए सीसे को पीटीटीआई के स्तर से 10 गुना अधिक होना चाहिए लेकिन हमारे आंकड़े इस 10 गुना से दो से 12 गुना तक अधिक थे."
उन्होंने कहा, "इससे हम सिर्फ़ यही निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि इनके ख़तरनाक असर छोड़ने की आशंका है."
चीन और ताइवान के चावल में सीसे का स्तर सबसे ज़्यादा था लेकिन डॉ साननगुआरी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि यह सभी सैंपलों में पीटीटीआई के स्तर से उल्लेखनीय रूप से अधिक था.
खेती में है गड़बड़
वह कहते हैं कि समस्या दुनिया भर में खेती करने के तरीक़ों में है.
वह कहते हैं, "अगर आप वैज्ञानिक अध्ययनों को देखें तो पाएंगे कि ख़ासतौर पर भारत और चीन में फ़सल को सींचने के लिए मल-मूत्र युक्त पानी और अशोधित औद्योगिक जल का इस्तेमाल करते हैं."
उन्होंने कहा, "इन देशों में शोध किया गया है और इन तरीक़ों पर चिंता जलाई गई है लेकिन फिर भी यह चल रहा है."
डॉ साननगुआरी कहते हैं, "एक वैश्वीकृत खाद्य बाज़ार के रूप में हम दुनिया के हर कोने से खाना खाते हैं लेकिन प्रदूषण का स्तर क्षेत्र खेती के तरीक़े के हिसाब से अलग-अलग है. शायद हमें खाद्य उत्पादन और वितरण के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानक बनाने की ज़रूरत है."












