तुर्की राष्ट्रपति चुनाव: अर्दोआन क्या जीवन की सबसे कड़ी चुनौती से जूझ रहे हैं?- दुनिया जहान

रेचेप तय्यब अर्दोआन

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इमेज कैप्शन, ताज़ा आम चुनावों में राष्ट्रपति रेचेप तय्यब अर्दोआन अपनी जीत के दावे कर रहे हैं.

नौ फ़रवरी 2023 को जब राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन देश के इतिहास के सबसे भयंकर भूकंप के तीन दिन बाद प्रभावित इलाकों का दौरा करने पहुंचे तो एक जगह जहां कभी हंसती खेलती ज़िंदगी हुआ करती थी अब खंडहर में तब्दील हो गयी थी.

शानदार सूट और चमकदार जूते पहने राष्ट्रपति अर्दोआन से एक भूकंप पीड़ित बूढ़ी महिला लिपट कर रोने लगी. कहना मुश्किल था कि वह गुस्से से रो रही है या राहत महूसस कर रही है कि राष्ट्रपति वहां उनका हाल जानने आए हैं.

उस भूकंप में 50,000 लोग मारे गए थे और 30 लाख से ज़्यादा बेघर हो गए थे. अरबों डॉलर का नुकसान हुआ था और इमारतों के निर्माण और उन्हें बनाने वालों को सरकार द्वारा दिए गए कांट्रैक्ट पर सवाल उठ रहे थे.

अर्दोआन ने माना कि 'राहत कार्य धीमा था लेकिन यह भी कहा कि इसमें सरकार की कोई ग़लती नहीं थी.'

उन्होंने आश्वासन दिया कि 'एक साल के भीतर उनके शहर दोबारा बनाए जाएंगे और सब कुछ नियंत्रण में है.' मगर देश में महंगाई आसमान छू रही है, विकास दर घट गयी है और तुर्की की मुद्रा लीरे की क़ीमत बुरी तरह गिर गयी है.

बीस साल तक सत्ता में बने हुए अर्दोआन पर पहली बार इस तरह का दबाव है. इसी महीने तुर्की में आम चुनाव हो रहे हैं.

पहले राउंड में अर्दोआन और उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी कमाल कलचदारलू, दोनों को ही 50 फ़ीसदी से अधिक वोट नहीं मिल सके हैं इसलिए एक बार फिर से वोटिंग होगी.

2003 में पहली बार तुर्की का नेतृत्व करने के बाद से राष्ट्रपति अर्दोआन की शक्तियों में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई है

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इमेज कैप्शन, 2003 में पहली बार तुर्की का नेतृत्व करने के बाद से राष्ट्रपति अर्दोआन की शक्तियों में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई है.

अर्दोआन का तुर्की

लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में समकालीन तुर्की संबंधी विषय की प्रोफ़ेसर यापरेक गुरसोय ने बीबीसी से कहा कि इस साल आए भूकंप का असर तुर्की में कई पीढ़ियों तक दिखाई देगा.

वो कहती हैं, "लोग बहुत नाराज़ हैं कि कई दिनों तक भूकंप पीड़ितों को मदद नहीं मिल पायी. नाराज़गी की दूसरी वजह है बड़ी संख्या में इमारतों का ढहना. पचास हज़ार में से दो सौ इमारतें ढह गयीं जो लोगों के रहने के लिए सुरक्षित नहीं थीं."

तुर्की यह प्रकोप पहले भी झेल चुका है. 1999 में आए भारी भूकंप में ख़राब तरह से बनायी गयी इमारतों के ढहने से 17,000 लोग मारे गए थे. इसके बाद भवन निर्माण या कंस्ट्रक्शन के विषय में कानून भी बनाए गए ताकि दोबारा ऐसा ना हो. लेकिन ऐसा हुआ.

पिछले भूकंप के बाद तत्कालीन सरकार अगला चुनाव हार गयी थी और जीती थी अर्दोआन की पार्टी. और अब अर्दोआन उसी स्थिति का सामना कर रहे हैं. मगर इस बार चुनौतियां कई और भी हैं.

वीडियो कैप्शन, तुर्की के भूकंप में 50 हज़ार से ज़्यादा जानें गई. क्यों इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढह गई

बढ़ती महंगाई और गिरती अर्थव्यवस्था

यापरेक गुरसोय कहती हैं, "इस समय तुर्की में कई चुनौतियां हैं, आर्थिक, राजनीतिक और विदेश नीति की चुनौती और भूकंप की वजह से यह सभी चुनौतियां और मुश्किल हो गयी हैं. लेकिन अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी वजह है कि लोग अब सरकार पर सवाल उठा रहे हैं और बदलाव के बारे में सोच रहे हैं."

तुर्की की अर्थव्यवस्था ख़राब हालत में है. यापरेक गोरसोय कहती हैं अब तुर्की की मंहगाई दर 55 प्रतिशत तक पहुंच गयी है. आयात महंगा हो गया है और महंगाई बढ़ने से चीजों की क़ीमतें बढ़ गईं यानी लोगों की जमा पूंजी घट गयी.

मगर अर्दोआन सरकार के ख़िलाफ़ जनता की आलोचना एक नाज़ुक मामला है.

वो कहती हैं, "ऐसा नहीं है कि लोगों को खुले आम दबाया जा रहा है जैसा कि तानाशाही शासन में होता है लेकिन कई बार अप्रत्याशित या मनमानी कार्यवाहियों की वजह से लोगों में सरकार के ख़िलाफ़ बोलने में डर है."

लोकतंत्र और धर्म निरपेक्षता के मूल्यों का तुर्की की राजनीति में महत्व रहा है.

1919 से तुर्की के संविधान में देश के राष्ट्रपिता माने जाने वाले कमाल मुस्तफ़ा अतातुर्क ने इसकी नींव रखी थी.

मगर कई लोगों का मानना है कि देश के वर्तमान नेता इसे दूसरी दिशा में ले जा रहे हैं. और यह कयास लगाया जा रहा है कि इन राष्ट्रपति चुनावों के बाद तुर्की इन दोनों में से किसी एक धुरी की ओर अधिक खिसक सकता है.

तुर्की के भूकंप में राहत कार्य में देरी के लिए अर्दोआन को दोषी ठहराया गया

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इमेज कैप्शन, तुर्की के भूकंप में राहत कार्य में देरी के लिए अर्दोआन को दोषी ठहराया गया.

अर्दोआन का व्यक्तित्व

हालांकि इन राष्ट्रपति चुनावों में भूकंप की विभीषिका और ख़स्ताहाल अर्थव्यवस्था प्रमुख मुद्दे हैं.

लेकिन लंदन मेट्रोपोलिटन यूनिवर्सिटी में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर अहमत ओज़तुर्क का मानना है कि अर्दोआन का व्यक्तित्व करिश्माई है.

69 साल के अर्दोआन का जन्म और परवरिश एक नौकरीपेशा धार्मिक परिवार में हुई और शिक्षा इस्तांबुल के एक इस्लामी स्कूल में.

वो कहते हैं, "उनका व्यक्तित्व बड़ा करिश्माई है और वो एक प्रभावी वक्ता हैं. वो आम लोगों में से निकल कर आए हैं, ना कि ऊंचे तबके से. इसलिए उन्हें आम लोगों से बात करने और अपना संदेश पहुंचाने का तरीका सहजता से आता है."

नब्बे के दशक में इस्तांबुल के मेयर के तौर पर उनका कार्यकाल मिलाजुला था. उन्होंने शहर का आधुनिकीकरण करने में बड़ी भूमिका निभाई लेकिन एक सरकारी कार्यक्रम में एक मजहबी तकरीर करने की वजह से उन्हें जेल जाना पड़ा.

बाद में उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी बनायी. 2003 में वो पहली बार तुर्की के प्रधानमंत्री बने और उनके शासनकाल के पहले दस वर्षों में उन्हें आधुनिकता लाने वाले नेता के तौर पर देखा गया.

अहमत ओज़तुर्क का कहना है, "2002 से 2009 तक वो यूरोपीय संघ समर्थक नेता रहे. वो कई लोकतांत्रिक कदम भी उठा रहे थे. पहले पांच छह सालों में तुर्की की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने में भी वो क़ामयाब रहे."

लेकिन फिर उनकी कार्यशैली में नाटकीय बदलाव आया और जिसे कई लोग तानाशाही के तौर पर देखते हैं.

इस बारे में अहमत ओज़तुर्क ने कहा, "मई 2013 में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए. इसकी पृष्ठभूमि यह है कि अर्दोआन इस्तांबुल के ताक्सिम चौक का ढांचा बदल कर वहां शहर की सबसे बड़ी मस्जिद बनाना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने वहां के पार्क को तोड़ कर कई पुराने पेड़ों की कटाई का आदेश दे दिया."

वीडियो कैप्शन, तुर्की का ये प्राचीन शहर बर्बाद हो गया है

तख़्ता पटल के बाद सर्वशक्तिमान बन बैठे

स्थानीय स्तर पर शुरू हुए विरोध प्रदर्शन धीरे धीरे पूरे देश में फैल गए और अर्दोआन के कड़े शासन के ख़िलाफ़ आंदोलन का रूप ले लिया. गेती पार्क में विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के लिए दंगा विरोधी पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ कार्यवाही की और आंसू गैस के गोले बरसाए.

इस कार्यवाही में बीस लोग मारे गए और हज़ारों लोग घायल हो गए.

अहमत ओज़तुर्क कहते हैं कि अर्दोआन ने सभी प्रदर्शनकारियों को देशद्रोही और आतंकवादी करार दे कर कहा कि वो विदेशी ताकतों के इशारे पर काम कर रहे हैं. यहीं से अर्दोआन के राजनीतिक सफ़र में नया मोड़ा आया था.

संविधान के नियमों के तहत अर्दोआन तीन से अधिक बार प्रधानमंत्री नहीं बन सकते थे तो उन्होंने राष्ट्रपति बनने का फ़ैसला किया. हालांकि राष्ट्रपति का पद एक किस्म से रस्मी पद था क्योंकि सभी महत्वपूर्ण अधिकार प्रधानमंत्री के पास थे.

लेकिन आने वाले सालों में उन्होंने अधिकाधिक अधिकार राष्ट्रपति पद को सौंपना शुरू कर दिया. 2016 में तख्ता पलट की एक कोशिश का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने सारे अधिकार हथिया कर पूर्ण नियंत्रण पा लिया.

इसके बाद डेढ़ लाख सरकारी कर्मचारियों को बर्ख़ास्त कर दिया गया. सैनिकों, पत्रकारों और कुर्द राजनयिकों सहित 50,000 से ज्यादा लोगों को हिरासत में ले लिया गया.

अहमत ओज़तुर्क कहते हैं कि 2017 के आते आते तुर्की एक लोकतंत्र कम और तानाशाही अधिक लगने लगा था.

अहमत ओज़तुर्क कहते हैं, "राष्ट्रपति प्रणाली के तहत उन्होंने ऐसे काम करना शुरू कर दिया जैसे वो हर विभाग के प्रमुख हों. वो प्रमुख ईमाम हैं, वो पुलिस प्रमुख हैं, सेना प्रमुख हैं. और जैसे देश का पूरा तंत्र एक आदमी के हाथ में आ गया हो."

लेकिन उनके कई आलोचकों का मानना है कि अब बदलाव का समय आ गया है.

26 मार्च 2023 को इस्तांबुल, तुर्की में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान विपक्षी रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (सीएचपी) के नेता कमाल कलचदारलू

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इमेज कैप्शन, 26 मार्च 2023 को इस्तांबुल, तुर्की में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान विपक्षी रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (सीएचपी) के नेता कमाल कलचदारलू.

टेबल ऑफ़ सिक्स- विपक्षी गठबंधन

तुर्की की सबान्ची यूनिवर्सिटी के एक सहायक प्रोफ़ेसर बराक हुसैन का मानना है कि तुर्की के विपक्षी दलों को यह चुनाव अर्दोआन के शासन के ख़िलाफ़ जनमत की तरह देखना होगा और इसे एक निजी मुद्दा बना कर लड़ना ही सफलता का रास्ता है.

उनके मुताबिक, "अर्दोआन विरोधी मत संभवत: तुर्की का सबसे बड़ा दल है. कई जनमत सर्वोक्षणों के अनुसार 50 प्रतिशत से अधिक लोग ऐसे हैं जो अर्दोआन को वोट नहीं देना चाहते. अगर विपक्षी दल अलग अलग विचारधारा के इन सभी लोगों को अर्दोआन के ख़िलाफ़ एकजुट करने में सफल हो जाएं तो वो यह चुनाव जीत सकते हैं."

अर्दोआन के शासन काल के दौरान पिछले चुनावों के विपरीत इस बार छह विपक्षी पार्टियों ने एक नेता के नेतृत्व में गठबंधन बना कर चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया है. छह दलों का यह गठबंधन 'टेबल ऑफ़ सिक्स' के नाम से जाना जाता है.

बराक हुसैन कहते हैं, "इस गठबंधन में तुर्की की राजनीति की सभी विचारधाराओं के दल शामिल है. इसमें पूर्व इस्लामी भी हैं और मध्य से वामपंथ की ओर झुकने वाले दल भी. इसके नेता है एक पूर्व सरकारी अधिकारी, 74 वर्षीय कमाल कलचदारलू हैं जो 2010 से मुख्य विपक्षी दल के साथ जुड़े रहे हैं. और उनका व्यक्तित्व अर्दोआन से बिल्कुल अलग है."

बराक हुसैन ने कहा, "वो सौम्यभाषी व्यक्ति हैं. वो करिश्माई व्यक्तित्व या जानदार प्रचारक तो नहीं हैं. लेकिन विपक्षी मतदाताओं को लगता है कि वो देश में बदलाव ला सकते हैं और देश का राजनीतिक माहौल सुधार कर तनाव कम कर सकते हैं."

तुर्की में नए राष्ट्रपति के चुनाव के पहले राउंड में राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन और उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी कमाल कलचदारलू, दोनों को ही 50 फ़ीसदी से अधिक वोट नहीं मिल सके.

कमाल कलचदारलू जिन्हें तुर्की का गांधी कहा जाता है

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इमेज कैप्शन, कमाल कलचदारलू जिन्हें तुर्की का गांधी कहा जाता है

साल 2002 से सत्ता पर क़ाबिज़ अर्दोआन को 49.49 फ़ीसदी मतों के साथ बढ़त मिली. उनके समर्थकों का मानना है कि अर्दोआन दोबारा चुनाव जीत जाएंगे.

वहीं, अर्दोआन को कड़ी टक्कर देने वाले और विपक्षी कमाल कलचदारलू को 44.79 फ़ीसदी मत मिले हैं.

तुर्की के चुनावी नियमों के अनुसार, अगर किसी भी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत या उससे अधिक वोट नहीं मिलते तो दूसरे चरण में सबसे अधिक वोट पाने वाले दो प्रमुख उम्मीदवारों के बीच मुकाबला होता है.

अगर यह चुनाव दूसरे चरण में जाता है तो कमाल कलचदारलू और विपक्षी गठबंधन के लिए मुश्किल हो सकती है. क्योंकि अर्दोआन शातिर राजनेता हैं और वो यह चुनाव जीतने के लिए सारी ताक़त लगा देंगे.

बराक हुसैन कहते हैं, "दूसरे चरण में कमाल कलचदारलू के लिए दिक्कतें हो सकती हैं क्योंकि अर्दोआन देश के मीडिया को नियंत्रित करते हैं, अफ़सरशाही और सरकारी तंत्र पर उनका नियंत्रण है जिसके इस्तेमाल से वो चुनाव के परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं."

इसमें तो कोई शक नहीं कि अर्दोआन इस चुनाव में एड़ी चोटी का ज़ोर लगा देंगे लेकिन हाल के दिनों में बुरे स्वास्थ्य की वजह से उनके चुनाव अभियान में दिक्कत आ रही हैं.

यहां तक कि पेट ख़राब होने की वजह से उन्हें टीवी पर एक लाइव प्रसारण को बीच में ही छोड़ कर जाना पड़ा था. इस सबको देखते हुए कई लोगों को लगता है कि बदलाव की समय निकट है, मगर कुछ लोगों को संदेह भी है.

अपने समर्थकों का अभिवादन करते हुए राष्ट्रपति अर्दोआन

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इमेज कैप्शन, राष्ट्रपति चुनाव में अर्दोआन ने जीत की उम्मीद अंत तक नहीं छोड़ी.

दांव पर क्या है?

मिडल ईस्ट इंस्टीट्यूट में तुर्की प्रोग्राम की प्रमुख जोनुल टोल कहती हैं कि अर्दोआन कहीं नहीं जाएंगे.

उनके मुताबिक, "अगर अर्दोआन चुनाव हार भी जाते हैं तो वो देश में ही रहेंगे और उम्मीद और इंतज़ार करेंगे कि विपक्षी गठबंधन सरकार विफल हो जाए. और इसके समर्थकों को भी आशंका है कि विपक्ष देश नहीं चला पाएगा. इसकी एक वजह यह है कि सत्ता में आते ही उसके सामने पहले से मौजूद आर्थिक संकट होगा."

जोनुल टोल का मानना है कि चुनाव लड़ाई का अंत नहीं बल्कि एक नई शुरुआत होंगे.

जोनुल टोल कहती हैं, "भूकंप के पहले अर्दोआन कई समस्याओं का सामना कर रहे थे. अर्थव्यवस्था बिगड़ रही थी, सरकारी संस्थाएं कमज़ोर हो चुकी थीं, देश में लाखों सीरियाई शरणार्थी रह रहे थे. कानून व्यवस्था की समस्याएं थीं जिनसे निपटना मुश्किल है."

"मगर पहली बार तुर्की में विपक्षी दल एकजुट हुए हैं और वो देश की समस्याओं के समाधान भी पेश कर रहे हैं. इसलिए बीस सालों में पहली बार देश की जनता का एक बड़ा हिस्सा उनकी बात ध्यान से सुन रहा है."

मगर क्या विपक्षी गठबंधन में देश को एकजुट कर के समस्याओं का समाधान कर के उसे एक समृद्ध भविष्य की ओर ले जाने की क्षमता है?

इसके जवाब में जोनुल टोल कहती हैं, "छह दलों के विपक्षी गठबंधन में भिन्न विचारधारा के दल शामिल हैं. इसलिए यह आसान तो नहीं होगा. ये पार्टियां अर्दोआन विरोधी मुद्दे पर साथ आयी हैं. सवाल यह है कि क्या चुनाव जीतने के बाद भी वो साथ रह पाएंगे?"

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आख़िरी मौका

मध्यपू्र्व की कूटूनीति में तुर्की की भूमिका महत्वपूर्ण है इसलिए तुर्की के सहयोगी पश्चिमी देश भी सोच रहे हैं कि उनके लिए कौन बेहतर होगा.

जोनुल टोल कहती हैं कि अर्दोआन ने विदेश मंत्रालय को दरकिनार कर के कूटनीति संबंधी सारे फ़ैसले ख़ुद करना शुरू कर दिया था जिससे देश की कूटनीति मे अनिश्चितता भी आ गयी थी.

विपक्षी गठबंधन का कहना है कि वो इसमें सुधार करेगा और अगर यूरोपीय संघ का सदस्य बनने के लिए दोबारा वार्ताएं शुरू करेगा. लेकिन अगर यूरोपीय संघ तुर्की को अपना सदस्य नहीं बनाए तब भी वो देश में लोकतांत्रिक सुधार का काम करते रहेंगे.

साथ ही वो यह भी कह चुके हैं कि सीरियाई शरणार्थियों को वापस भेजने के लिए वो सीरिया के राष्ट्रपति असद से भी समझौता करने को तैयार हैं. उनके इस फ़ैसले पर अमरीका को आपत्ति ज़रूर हो सकती है.

इन चुनावों में देश की जनता को यह फ़ैसला करना है कि देश के नेता की प्राथमिकता जनता का हित है या उसका अपना?

जोनुल टोल का कहना है, "अगर अर्दोआन चुनाव जीतते हैं तो तुर्की तानाशाही के शिकंजे में और फंस जाएगा. और अगर विपक्षी गठबंधन जीतता है तो तुर्की के पास एक मौका होगा. जो लोग लोकतंत्र और समृद्ध भविष्य चाहते हैं उनके लिए यह आख़िरी मौका होगा."

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लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि इस राष्ट्रपति चुनाव का तुर्की के भविष्य के लिए क्या मायने हैं?

इस बार चुनाव को लोकतंत्र और तानाशाही के बीच चुनाव की तरह पेश किया जा रहा है. अगर अर्दोआन चुनाव जीतते हैं तो संभावना यही है कि वहां कुछ ख़ास नहीं बदलेगा.

लेकिन इसकी भी कोई गारंटी नहीं है कि अगर विपक्ष जीतता है तो आने वाले वक़्त में तुर्की बदल सकता है.

हालांकि कई सालों में पहली बार तुर्की की जनता उत्साहित लग रही है और बदलाव के अवसर और बेहतर भविष्य की ओर उम्मीद से देख रहे हैं.

इसलिए सबसे चुनाव के बाद भी सबसे महत्वपूर्ण यही है कि यह आशा बरक़रार रहे.

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