तुर्की की सत्ता पर अर्दोआन क़ाबिज रहेंगे या 'गांधी युग' की होगी शुरुआत

आधुनिक तुर्की की नींव रखने वाले तुर्की के पूर्व राष्ट्रपति मुस्तफ़ा कलाम अतातुर्क (1881-1938).

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इमेज कैप्शन, आधुनिक तुर्की की नींव रखने वाले तुर्की के पूर्व राष्ट्रपति मुस्तफ़ा कलाम अतातुर्क (1881-1938).
    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

तुर्की में रविवार को संसद और राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं. इस चुनाव में लंबे समय से सत्ता पर क़ाबिज़ रेचेप तैय्यप अर्दोआन को विपक्षी नेता कमाल कलचदारलू चुनौती दे रहे हैं.

राष्ट्रपति अर्दोआन की पार्टी का नाम एकेपी (जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी) है जबकि प्रमुख विपक्षी दल रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी नेशन अलायंस के तहत पांच अन्य दलों के साथ मिलकर चुनाव मैदान में है.

14 मई के चुनाव के नतीजों से ये साफ़ हो जाएगा कि तुर्की की जनता अर्दोआन के बीस साल में किए काम से ख़ुश है और अभी भी उनके नेतृत्व में भरोसा करती है या सत्ता में बदलाव चाहती है.

तुर्की इस साल अक्तूबर में गणतंत्र की शताब्दी मनाएगा. देश भर में बड़े पैमाने पर जश्न मनाने की तैयारियाँ चल रही हैं.

तुर्की गणराज्य की स्थापना 29 अक्टूबर, 1923 को हुई थी और मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क को पहले राष्ट्रपति के रूप में चुना गया था.

आधुनिक तुर्की के संस्थापक कहे जाने वाले कमाल अतातुर्क ने एक धर्मनिरपेक्ष और तुर्क राष्ट्रवादी राज्य के रूप में तुर्की गणराज्य की नींव रखी थी.

इस तरह से उस ऐतिहासिक 'दौर-ए-उस्मानिया' के तुर्क साम्राज्य का विनाश हो गया जो सैकड़ों सालों से इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ चला आ रहा था.

साढ़े आठ करोड़ की आबादी वाले देश तुर्की के लिए शताब्दी समारोह एक बहुत बड़ा अवसर होगा, लेकिन कहा जाता है कि पिछले 20 सालों में तुर्की कमाल अतातुर्क का बनाया तुर्की नहीं रहा.

लोग कहते हैं कि राष्ट्रपति अर्दोआन के 2003 में सत्ता में आने के बाद से तुर्की को एक रूढ़िवादी सोच वाला देश बनाने की कोशिश में लगे हैं.

2003 में पहली बार तुर्की का नेतृत्व करने के बाद से राष्ट्रपति अर्दोआन की शक्तियों में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई है

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इमेज कैप्शन, 2003 में पहली बार तुर्की का नेतृत्व करने के बाद से राष्ट्रपति अर्दोआन की शक्तियों में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई है

बड़े बदलावों के दौर से गुज़रता देश

अमेरिका की सैन डिएगो स्टेट यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर और तुर्की मूल के अहमत टी. कुरु के मुताबिक़, सत्ता में आते ही अर्दोआन ने अतातुर्क की विरासत को मिटाने की कोशिश शुरू कर दी थी.

वो कहते हैं, "2003 में सत्ता संभालने के बाद से, राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने अतातुर्क की विरासत को चुनौती दी है.

अर्दोआन 2003 से 2014 तक प्रधानमंत्री थे, जिसके बाद वो राष्ट्रपति बने."

वो आगे कहते हैं, "अपने 20 वर्षों के शासन में, अर्दोआन ने अलग-अलग तरीक़ों से ऑटोमन दौर को दोबारा जीवित करने की कोशिश की है. ऐतिहासिक संग्रहालय हाया सोफ़िया को दोबारा मस्जिद में बदलने से लेकर सरकारी टीवी चैनल पर ऑटोमन युग के महिमामंडन के लिए ऐतिहासिक टीवी सीरियल बनाने तक, वे लगातार ऐसे काम करते रहे हैं."

26 मार्च 2023 को इस्तांबुल, तुर्की में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान विपक्षी रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (सीएचपी) के नेता कमाल कलचदारलू

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इमेज कैप्शन, 26 मार्च 2023 को इस्तांबुल, तुर्की में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान विपक्षी रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (सीएचपी) के नेता कमाल कलचदारलू

तुर्की का बँटा हुआ समाज

मैं पिछले कुछ सालों में कई बार तुर्की गया हूँ. इसके कई छोटे-बड़े शहरों को देखा है और लोगों से बातचीत की है. मुझे हमेशा से तुर्की का समाज बँटा हुआ नज़र आया है. एक तरफ़ अर्दोआन के समर्थक हैं तो दूसरी तरफ़ उनके विरोधी हैं.

धर्मनिरपेक्ष और पश्चिमी देशों में पढ़े लोगों के बीच अर्दोआन की आम तौर से आलोचना होती है, लेकिन देश के छोटे शहरों और क़स्बों में उनकी लोकप्रियता साफ़ महसूस होती है.

लेकिन मैंने हाल के सालों में राष्ट्रपति अर्दोआन के समर्थकों को भी उनकी आर्थिक पॉलिसी और बढ़ती बेरोज़गारी पर आलोचना करते सुना.

तानाशाह जैसे शब्दों का इस्तेमाल उनके समर्थक भी करते हैं, विशेषज्ञ कहते हैं कि हाल में आये भयानक भूकंप से हुई ज़बर्दस्त तबाही ने उनकी मुसीबतें और बढ़ा दी हैं.

चैन सेक्चुकि, इस्तांबूल स्थित पोलिंग एजेंसी तुर्किए रेपोरु के मुख्य पोलस्टर हैं. वो कहते हैं कि इस चुनाव में राष्ट्रपति अर्दोआन के ख़िलाफ़ एक ख़ास बात जा रही है और वो है विपक्ष का एकजुट होना और एक साझा उम्मीदवार खड़ा करना.

ये उम्मीदवार हैं रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी के नेता कमाल कलचदारलू.

राष्ट्रपति अर्दोआन पिछले 20 सालों में कई चुनाव जीत चुके हैं, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि रविवार को होने वाले चुनाव में उनकी जीत पक्की नहीं है, इसीलिए लोगों के ज़ेहन में एक बड़ा सवाल ये है कि इन शताब्दी समारोहों का नेतृत्व कौन करेगा?

तुर्की के लोग ख़ुद इसका फ़ैसला इस रविवार को होने वाले चुनाव में करने वाले हैं. छह करोड़ से अधिक तुर्क मतदान में हिस्सा लेने के योग्य हैं. ये चुनाव आधुनिक समय में तुर्की का सबसे अहम चुनाव साबित हो सकता है.

तुर्की चुनाव

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इमेज कैप्शन, राष्ट्रपति अर्दोआन को रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी के नेता कमाल कलचदारलू से कड़ी टक्कर मिल रही है

'तुर्क गांधी' बनाम अर्दोआन

तुर्की में आम सहमति इस बात पर है कि राष्ट्रपति अर्दोआन को इस बार कड़े मुक़ाबले का सामना है. छह विपक्षी दलों ने एक साथ आकर राष्ट्रपति पद के लिए अनुभवी प्रचारक और रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी के नेता कमाल कलचदारलू को अपना उम्मीदवार बनाया है.

'तुर्क गांधी' कहे जाने वाले 74 वर्षीय कमाल कलचदारलू पोल्स में राष्ट्रपति अर्दोआन पर अपनी बढ़त बनाये हुए हैं.

पहले प्रधानमंत्री की हैसियत से और अब राष्ट्रपति के रूप में राष्ट्रपति अर्दोआन 20 सालों से तुर्की पर राज कर रहे हैं. उनके आलोचक कहते हैं कि वह ख़ुद को "एक बुद्धिमान, अनुभवी नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो सब कुछ जानते हैं." उनके विचार में उन्होंने पावर अपने हाथों में समेट लिया है, लेकिन उनके प्रशंसक उन्हें आधुनिक तुर्की का संस्थापक मानते हैं.

चैन सेक्चुकि इस्तांबुल से फ़ोन पर बातें करते हुए कहते हैं कि कमाल कलचदारलू को थोड़ी बढ़त ज़रूर मिली हुई है, लेकिन अभी यह कहना मुश्किल है कि यह पहले दौर में ख़त्म होगा या दूसरे दौर में जाएगा. लेकिन अगर यह पहले दौर में समाप्त होता है तो ऐसा लगता है कि जीत की होगी."

तुर्की की पत्रकार नेवसीन मेंग्यू ने तुर्की चुनाव पर अमेरिकी थिंक टैंक 'ब्रूकिंग्स' की एक बहस में कहा कि दूसरे दौर का मतलब होगा अर्दोआन की जीत.

उन्होंने कहा, "ऐसा लगता है कि चुनाव दूसरे दौर में जा सकता है. अगर ऐसा होता है तो यह अर्दोआन के पक्ष में जा सकता है. वह लोगों को समझाने की कोशिश करेंगे कि केवल वे ही देश को अराजकता से बचा सकते हैं और स्थिरता ला सकते हैं."

पहले दौर में चुनाव जीतने के लिए एक उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से अधिक वोट चाहिए होंगे. ज़रूरत पड़ी तो चुनाव का दूसरा राउंड 28 मई को होगा.

तुर्की में राहत कार्य में देरी के लिए अर्दोआन को दोषी ठहराया गया

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इमेज कैप्शन, तुर्की के भूकंप में राहत कार्य में देरी के लिए अर्दोआन को दोषी ठहराया गया

ये चुनाव कितना महत्वपूर्ण?

20 साल के शासन के बाद राष्ट्रपति अर्दोआन की लोकप्रियता घटती दिखाई देती है. ये चुनाव अर्दोआन के जादू के उतरने की शुरुआत हो सकता है.

चुनाव विशेषज्ञ चैन सेक्चुकि कहते हैं कि लोग बदलाव के लिए तैयार हैं. वो कहते हैं, "पिछले पांच वर्षों में राष्ट्रपति अर्दोआन का समर्थन शहरी इलाक़ों से अधिक ग्रामीण क्षेत्रों में चला गया है, लेकिन अब भी ऐसे लोग हैं जो उनका समर्थन करते हैं. मगर यह शायद जीत के लिए पर्याप्त न हो."

विशेषज्ञ कहते हैं कि यह चुनाव तुर्की के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है क्योंकि विपक्ष संसदीय प्रणाली में लौटने का वादा कर रहा है.

सिनान उलगेन एक पूर्व तुर्की राजनयिक हैं, जो वर्तमान में इस्तांबुल स्थित सेंटर फ़ॉर इकोनॉमिक्स एंड फॉरेन पॉलिसी के अध्यक्ष हैं.

ब्रूकिंग्स संस्था की तरफ़ से आयोजित तुर्की के राष्ट्रपति चुनाव पर एक बहस के दौरान उन्होंने कहा, "दोनों बड़े गठबंधन समाज के दो बहुत अलग दृष्टिकोण पेश कर रहे हैं. एक गठबंधन (अर्दोआन के नेतृत्व में) अब अधिक रूढ़िवादी हो गया है. दूसरा गठबंधन ये बताने की कोशिश कर रहा है कि समाज को कैसे चलाया जाना चाहिए. उसका नज़रिया तुर्की को पश्चिम के क़रीब लाना, नागरिक स्वतंत्रता में सुधार करना, लैंगिक समानता को बढ़ाना और लोकतंत्र की जड़ें मज़बूत करना है."

सैन डिएगो स्टेट यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर अहमत टी. कुरु कहते कि तुर्की का चुनाव वास्तव में ऐतिहासिक है, "यह निर्धारित करेगा कि राष्ट्रपति अर्दोआन ख़ुद को "नए तुर्की" का संस्थापक बनाने में किस हद तक सफल होंगे. अर्दोआन और उनके समर्थकों ने दावा किया है कि वे इस्लामवाद पर आधारित एक नया तुर्की बना रहे हैं. यह अभिजात्यवाद और धर्मनिरपेक्षता के आधार पर 1923 में एक सदी पहले स्थापित "पुराने तुर्की" से बहुत अलग है."

प्रोफ़ेसर अहमत टी. कुरु के मुताबिक़, अगर मुख्य विपक्ष के उम्मीदवार जीत हासिल करते हैं तो राष्ट्रपति अर्दोआन के इस्लामवाद और उनके 'एकाधिकार वाले शासन' का अंत हो जाएगा. इसका परिणाम और असर देश में इस्लाम, राज्य संबंधों, महिलाओं के अधिकार, आर्थिक नीतियों और विदेश नीति सहित कई मामलों पर पड़ेगा.

लेकिन अगर अर्दोआन जीतते हैं तो उन्हें देश की राजनीति और समाज पर अपनी और भी गहरी छाप छोड़ने का मौक़ा मिलेगा. पश्चिमी देशों में डर यह है कि वह देश को धार्मिक रूप से रूढ़िवादी मॉडल की ओर धकेलने की पुरज़ोर कोशिश करेंगे और पश्चिमी देशों से अधिक दूरी बनाने के अपने रास्ते पर बने रहेंगे.

प्रोफ़ेसर अहमत कुरु कहते हैं, "अर्दोआन पहले से ही शक्तिशाली हैं. वह न्यायपालिका, अर्थव्यवस्था और यहां तक कि मीडिया सहित सभी राज्य संस्थाओं को नियंत्रित कर चुके हैं. अगर वह जीत जाते हैं तो वह राजनीतिक क्षेत्र में सियासी पार्टियों और अन्य संगठित विपक्ष के रूप में जो भी विरोध बचा है, उसका सफ़ाया कर देंगे"

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इमेज कैप्शन, तुर्की ने कश्मीर का मुद्दा उठाया जिससे दोनों मुल्कों के रिश्तों में गर्मजोशी कम ही दिखी

भारत-तुर्की के बीच रिश्तों पर क्या असर होगा

राष्ट्रपति अर्दोआन के शासन काल में भारत-तुर्की रिश्तों में गर्मजोशी की कमी दिखाई देती है, बल्कि कश्मीर का मुद्दा उठाने की वजह से दोनों देशों के बीच तनाव भी रहता है.

लेकिन कई राजनीतिक विश्लेषक राष्ट्रपति अर्दोआन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच समानता भी देखते हैं. जैसा कि प्रोफ़ेसर अहमत कुरु कहते हैं, "अर्दोआन के तुर्की और मोदी के भारत में कई बातें समान हैं. दोनों देशों में एक दक्षिणपंथी लोकलुभावन सरकारें हैं, जो धार्मिक रूढ़िवादिता, धर्म पर आधारित राष्ट्रवाद और कथित इलीट वर्ग के ख़िलाफ़ अपने भाषणों से लोकप्रियता हासिल करते हैं.

भारत में विशेषज्ञों की राय ये है कि अगर अर्दोआन जीत कर सत्ता पर लौटे तो भारत-तुर्की रिश्तों में बहुत अधिक सुधार की उम्मीद नहीं है, कम-से-कम उस समय तक जब तक कि अर्दोआन कश्मीर का मुद्दा उठाना बंद न कर दें.

लेकिन अगर जीत उनके प्रतिद्वंद्वी कमाल कलचदारलू की हुई तो रिश्तों में गर्माहट लौट सकती है.

भारत के विदेश मंत्रालय से कभी जुड़े एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "कमाल कलचदारलू डेमोक्रेट हैं, मानवधिकारों के पालन के पक्ष में हैं और सेक्युलर हैं. वो पश्चिमी देशों और भारत दोनों से रिश्तों को मज़बूत करने की कोशिश करेंगे और हमें उम्मीद है कि कश्मीर का मुद्दा उठाने से परहेज़ करेंगे."

तुर्की चुनाव

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इमेज कैप्शन, अर्दोआन की एक रैली में समर्थक. कहा जा रहा है कि तुर्की में भूकंप के बाद जनता के बीच उनका समर्थन कम हुआ है

अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए ये चुनाव कितना अहम

तुर्की अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से बहुत महत्वपूर्ण देश है. यह न केवल नेटो का एक सदस्य है बल्कि पूरब और पश्चिम की संस्कृति का संगम भी है. तुर्की एक क्षेत्रीय शक्ति है और इसकी बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति के बावजूद इसकी अर्थव्यवस्था दुनिया की शीर्ष 20 अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जाती है.

सियासी विश्लेषक कहते हैं कि चुनाव के नतीजे तुर्की के एक महत्वपूर्ण नेटो सदस्य और एक अहम क्षेत्रीय पावर होने के नाते पश्चिमी देशों के साथ उसके संबंधों और पावर के वैश्विक संतुलन दोनों के लिए अहम साबित होंगे.

राष्ट्रपति अर्दोआन पिछले कई सालों से पश्चिमी देशों से दूर जा रहे हैं और उनके शासन में तुर्की में अमेरिका और पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़ माहौल बना है. चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने अपने गठबंधन में जिन पार्टियों को शामिल किया है उनमें से दो को अमेरिका-विरोधी माना जाता है

तुर्की में आम लोगों की धारणा ये है कि विपक्ष के जीतने से भी इसकी विदेश नीतियों में अधिक बदलाव नहीं देखने को मिलेगा.

चैन सेक्चुकि के मुताबिक़, इस बात पर बहस चल रही है कि अर्दोआन के हारने और विपक्ष के जीतने पर विदेश नीति में कितना बदलाव आएगा.

कुछ लोगों का तर्क है कि अर्दोआन का अमेरिका-विरोध जारी रह सकता है. प्रोफ़ेसर अहमत कुरु का भी ख़्याल है कि अगर विपक्षी उम्मीदवार जीतता है तो सबसे कम दिखाई देने वाला परिवर्तन विदेश नीति में होगा.

वो कहते हैं, "तुर्की में आज की तुलना में बहुत अधिक पश्चिमी देशों का समर्थक नहीं होगा. उसकी वजह ये है कि तुर्की के विपक्षी दलों और उनके निर्वाचन क्षेत्रों में पश्चिमी देशों का विरोध गहरा है".

लेकिन पूर्व तुर्क राजनयिक सिनान उलगेन को लगता है कि विदेश नीति में बदलाव गहरा होगा, वे कहते हैं, "ये ज़रूर है कि विपक्षी गठबंधन अधिक स्वतंत्र विदेश नीति के लिए ज़ोर देना जारी रखेगा जो पश्चिमी देशों को नाराज़ किए बिना इसे अधिक कूटनीतिक रूप से कर सकता है."

इस बीच, तुर्की के लोगों को इंतज़ार रहेगा कि अक्टूबर में गणराज्य के शताब्दी समारोह का नेतृत्व एक रूढ़िवादी राष्ट्रपति करेगा जो देश को और भी रूढ़िवादी बनाने की कोशिश कर सकता है.

या फिर एक सेक्युलर राष्ट्रपति करेगा जो तुर्की को उसके संस्थापक कमाल अतातुर्क के आदर्शों पर दोबारा चलने के लिए तैयार करेगा.

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