मस्जिद में महिलाओं के नमाज़ पढ़ने को लेकर बहस क्यों?

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दायर कर कहा है कि मस्जिद में मुसलमान महिलाओं के नमाज़ पढ़ने पर कोई रोक नहीं है लेकिन मस्जिद में महिला और पुरुष को मेल-मिलाप की इजाज़त नहीं है.

पुणे स्थित एक महिला फ़रहा अनवर हुसैन शेख़ ने सुप्रीम कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश और नमाज़ पढ़ने की अनुमति को लेकर याचिका दायर की थी.

इस याचिका में मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश न देने को अवैध और असंवैधानिक बताया गया था. याचिका में इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15,21, 25 और 29 का भी उल्लंघन बताया गया था.

पुणे से फ़ोन पर फ़रहा अनवर बताती हैं, ''मैं रमज़ान के दौरान शॉपिंग के लिए गई थी और उस दौरान नमाज़ का समय हो गया. वहां स्थित मस्जिद में मेरे पति को नमाज़ अदा करने दी गई लेकिन मैं नहीं पढ़ पाई जबकि मेरे घर के पास जो मस्जिद है वहां मैं नमाज़ पढ़ सकती हूं.''

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वे बताती हैं कि इस्लाम में ये कहीं नहीं लिखा कि महिलाएं मस्जिद में नमाज़ नहीं पढ़ सकती हैं.

ये याचिका साल 2020 में दाख़िल की गई थी.

याचिकाकर्ता का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाख़िल करने से पहले उन्होंने पूणे की मस्जिद के अध्यक्ष और सचिव को भी मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए अनुमति मांगी थी लेकिन कोई जवाब न मिलने के कारण उन्होंने कोर्ट का रुख़ किया.

याचिका में क्या कहा गया है?

याचिकाकर्ता के वकील ओम नारायण पांडे बताते हैं, ''याचिकाकर्ता ने महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश की अनुमति के साथ-साथ ये कहा है कि मस्जिद का ढांचा भी पुरुष प्रधान है जहां महिलाओं के अलग से वज़ू की सुविधा नहीं है. न ही महिलाओं के लिए शौच करने का प्रावधान किया गया है.''

वकील ओम नारायण पांडे का कहना है कि हमने सुप्रीम कोर्ट से इस बारे में दिशानिर्देश जारी करने की अपील की है.

साथ ही उनका कहना था कि उन्होंने इस मामले में महिला और बाल कल्याण मंत्रालय, विधि और न्याय मंत्रालय, अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय, राष्ट्रीय महिला आयोग, महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड ऑफ़ वक़्फ़, सेंट्रल वक़्फ़ कॉउंसिल, जमीयत उलेमा-ए-हिंद, दारूल उलूम देवबंद और एआईएमपीएलबी को भी एक पक्ष (रेस्पॉन्डेंट) बनाया है.

वकील बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से इन सब को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा गया है.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड(एआईएमपीएलबी) के कमाल फ़ारूक़ी कहते हैं, ''इस्लाम में मुसलमान महिलाओं के अधिकारों की बात की गई है और उनके बारे में सख़्ती से अमल करने को कहा गया है.''

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उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में दायर किए गए हलफ़नामे के बारे में कहा, ''ऐसा नहीं है कि मस्जिद में महिलाओं के आने को लेकर कोई मनाही है. ख़ाना काबा (मक्का स्थित मुसलमानों का सबसे पवित्र स्थल) में जब परिक्रमा (तवाफ़) करते हैं तो औरत और मर्द एक साथ होते हैं जो कि सही बात है लेकिन वहां महिला केवल महरम के साथ ही जा सकती हैं.''

वे बताते हैं, ''वैसे ही अगर मस्जिद में महिला के लिए अलग से सुविधा है तो ठीक है अगर नहीं है और वो मस्जिद में नमाज़ पढ़ना चाहती हैं तो महरम यानि पति या सगे भाई के साथ वो पढ़ सकती हैं. लेकिन वहां महिला और पुरुष एक दूसरे से घुलमिल नहीं सकते.''

कमाल फ़ारूक़ी बताते हैं, ''महिलाओं को परेशानी न हो इसलिए एक तरफ़ महिला और दूसरी तरफ़ पुरुष नमाज़ पढ़ सकते हैं. इस्लाम मस्जिद में किसी भी काम के लिए महिलाओं और पुरुषों का महरम के बिना घुलने-मिलने की अनुमति नहीं देता है.''

मस्जिद में महिलाओं पर पाबंदी नहीं

हाल ही में दिल्ली की जामा मस्जिद में लड़कियों या महिलाओं पर रोक लगाने की ख़बर आई थी.

दिल्ली की जामा मस्जिद ने अपने एक आदेश में अकेली लड़कियों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया था लेकिन बाद में इस आदेश को बदल दिया गया.

इस नए आदेश में कहा गया था, ''दिल्ली की जामा मस्जिद, ख़ासतौर पर प्रार्थना के लिए ही है. यहां की पवित्रता बनाए रखना हम सभी की ज़िम्मेदारी है. मस्जिद की पवित्रता को भंग करने वाले किसी भी शख़्स या समूह को अंदर प्रवेश नहीं दिया जाएगा.''

जामा मस्जिद के आदेश पर सवाल पूछने पर कमाल फ़ारूक़ी कहते हैं, ''ये ख़बर इसलिए आई थी क्योंकि ग़ैर-इस्लामिक तरीक़े से वहां लड़के और लड़कियों ने फ़ोटो को खींचा और वायरल किया हालांकि ये समझना चाहिए कि मस्जिद कोई घूमने फिरने की जगह नहीं है बल्कि वो इबादत की जगह है.''

मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश पर मिले सुप्रीम कोर्ट के नोटिस का जवाब जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने नहीं दिया है लेकिन बीबीसी से बातचीत में उसी संगठन के नियाज़ फ़ारूक़ी कहते हैं, ''मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश पर कोई पाबंदी नहीं है. अगर ऐसा कहीं हैं जहां महिलाओं को अनुमति नहीं मिलती है तो वो ग़लत है और हम एआईएमपीएलबी के रूख़ से सहमत हैं.''

उनके अनुसार, ''ऐसी ख़बरें इस्लाम को बदनाम करने के लिए दी जाती हैं. केवल पाबंदी नमाज़ के दौरान औरतों और मर्दों के मिक्सअप होने से है. इसका मतलब ये है कि औरत, मर्द और बच्चे अलग-अलग क़तार में नमाज़ पढ़ें.''

साथ ही वे कहते हैं, ''आमतौर पर मर्दों के लिए मस्जिद में जमात के साथ नमाज़ पढ़ना ज़रूरी है लेकिन महिलाओं के पास घर की ज़िम्मेदारी होती है इसलिए उनके लिए ये वैकल्पिक बनाया गया है इसलिए उनके लिए वैसे बंदोबस्त भी नहीं होते जैसे वज़ू की जगह लेकिन अगर महिलाएं जाएंगी तो ये सुविधा दी जानी चाहिए और दी जाएंगी. महिलाओं की सुरक्षा भी अहम है क्योंकि नमाज़ भी तो अलग-अलग समय पर होती है.''

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक ज़िया-उस-सलाम, इस्लाम में महिलाओं के अधिकारों पर कई किताबें लिख चुके हैं.

वे कहते हैं कि फ़रहा के मामले को सुप्रीम कोर्ट पहुंचने की ज़रूरत ही नहीं थी अगर स्थानीय उलेमा उन्हें क़ुरान की रोशनी में सही बातें बताते.

वे कहते हैं, ''क़ुरान किसी भी महिला को मस्जिद जाने से नहीं रोकता. क़ुरान नमाज़ पढ़ने नहीं बल्कि नमाज़ को क़ायम करने के लिए कहता है और वो तभी मुक्कमल होगी जब आप समूह में नमाज़ पढ़ते हैं.''

इस्लाम में क्या कहा गया है?

ज़िया-उस-सलाम बताते हैं, ''इस्लाम, मर्द और महिला दोनों को मस्जिद में आने की अनुमति देता है. फ़र्क़ बस इतना है कि मजबूरी के अलावा मर्द को मस्जिद आने का आदेश दिया गया है वहीं महिला को इजाज़त दी गई है कि चाहे तो वो घर पर ही नमाज़ पढ़ ले या चाहे तो मस्जिद में आकर नमाज़ अदा कर सकती हैं."

लेकिन लखनऊ से शाइस्ता अबंर कहती हैं, ''हर मस्जिद में महिला को नमाज़ पढ़ने की अनुमति नहीं हैं. हक़ीक़त में क्या जुमे के दिन ख़ुतबा (ख़ास भाषण) को क्या महिलाएं सुन पाती हैं?''

वे अपना उदारण देकर बताती हैं, ''ईद का मौक़ा था और मैं बेटे के साथ नमाज़ पढ़ाने के लिए मस्जिद लेकर गई लेकिन मुझे वहां रोक दिया गया. वहां मौजूद व्यक्ति ने मेरे बेटे का हाथ पकड़ पर कहा कि हम नमाज़ पढ़वा देंगे.''

वो बताती हैं कि जबकि क़ुरान में महिलाओं के नमाज़ पढ़ने को लेकर पूरी व्यवस्था देने की बात कही गई है साथ ही ये भी कहा गया है कि अगर वो छोटे बच्चे के साथ आती हैं तो वो लंबी नमाज़ न पढ़ें ताकी बच्चे को परेशानी न हो.

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शाइस्ता लखनऊ में मस्जिद का निर्माण करवा चुकी हैं और कहती हैं,'' काबा शरीफ़ में महिलाओं को जब इतनी अहमियत दी गई है तो किसी को अधिकार नहीं है कि वो ये कहे कि महिला महरम के साथ आए. सोचिए अगर कोई महिला विधवा है या अनाथ है तो क्या उसे इबादत करने से महरूम कर दिया जाएगा.''

उनके अनुसार, ''ये नया इस्लाम पैदा किया जा रहा है. पूरी दुनिया में एक ही क़ुरान है और पैंग़बर की हदीस में उसे ही माना जाना चाहिए. ये फ़र्ज़ी हदीस को हम नहीं मानते.''

वे कहती हैं, ''हमारी मस्जिद का एक दरवाज़ा है और उसके बाद महिलाओं और पुरुषों के नमाज़ अदा करने के लिए दीवार की आड़ दी गई है जिसमें खिड़की भी है. वहीं वज़ू के लिए प्रावधान किए गए हैं. वहीं इस मस्जिद में देवबंदी, शिया, सुन्नी, बरेलवी सब आ सकते हैं और किसी पर कोई रोक नहीं है.

लेखक ज़िया-उस-सलाम समझाते हुए बताते हैं, ''हदीस में ये बताया गया कि अगर तुम्हारी बीवियां या बेटियां मस्जिद जाने की इजाज़त मांगती हैं तो उन्हें रोका नहीं जाना चाहिए.''

वो बताते हैं, ''एक दूसरी हदीस में लिखा गया है कि महिला जब फ़ज्र (सुबह) की नमाज़ पढ़कर आ रही थीं तो उनके साथ अशोभनीय बातें हुईं. उसके बाद भी उनके ऊपर रोक नहीं लगाई गई बल्कि जिन्होंने ग़लत हरकत की उन्हें सज़ा दी गई. लेकिन अब सुरक्षा की बात कहकर कुछ धार्मिक लोग घर में नमाज़ पढ़ने की बात कहते हैं.''

साथ ही वे कहते हैं कि मक्का या मदीना में नमाज़ पढ़ने के लिए मर्दों और औरतों के लिए अलग-अलग हॉल दिए गए हैं. क़ुरान में नमाज़ पढ़ने के लिए महरम की कोई बात नहीं की गई है. ये केवल पितृसत्तात्मक सोच है. इस्लाम में महिला को अपनी पहचान दी गई है.

वे बताते हैं कि सऊदी अरब, मक्का-मदीना, संयुक्त अरब अमीरात में महिलाएं जाती हैं वहीं अमेरिका ,कनाडा में कितनी नई मस्जिदें , इस्लामिक सेंटर बनें है जहां महिलाओं को नहीं रोका जाता है.

मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश को लेकर केवल उपमहाद्धीप यानी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में आपत्तियां जताई जाती हैं.

सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई इस याचिका पर अगली सुनवाई मार्च महीने में होगी.

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