पति पर गर्भवती महिला को जलाने का आरोप, क़ानून में कार्रवाई के लिए क्या हैं प्रावधान

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत की राजधानी दिल्ली में सात महीने की एक गर्भवती महिला को जलाने का मामला सामने आया है.

ये घटना बाहरी दिल्ली के बवाना इलाक़े की है.

आरोप है कि इस महिला को उनके पति ने जलाने की कोशिश की. महिला दिल्ली स्थित सफ़दरजंग अस्पताल में भर्ती है और उनकी हालत स्थिर बताई जा रही है.

पुलिस ने इस मामले में एफ़आईआर दर्ज की है और पति के ख़िलाफ़ 498ए और आईपीसी की धारा 307 (हत्या की कोशिश) लगाई गई है.

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने बीबीसी को बताया कि इस महिला ने पुलिस और एसडीएम के सामने बयान दिया है.

इसमें कहा गया है कि उनके पति दहेज के लिए उन्हें परेशान करते थे. वो शराब भी पीते थे और पिटाई करते थे.

इस महिला का नाम खुशबू सिंह है और उसके पति का नाम वीर प्रताप सिंह बताया गया है.

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क्या है मामला

स्वाति मालीवाल बताती हैं, ''इस महिला ने बताया है कि उनके पति ने शादी के ज़ेवर की मांग की. इसके बाद दोनों के बीच झगड़ा हुआ और फिर पति ने खुशबू को जलाने की कोशिश की. इस मामले में पुलिस ने कम सेक्शन लगाए हैं. हमने इस मामले में दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है और सख़्त कार्रवाई की मांग की है.''

इस मामले से जुड़े एक पुलिस अधिकारी ने बीबीसी को बताया, ''पहले ख़ुशबू ने इसे हादसा बताया था लेकिन परिवार उनकी बेटी को जलाने का आरोप बार-बार लगा रहा था. इस मामले में एसडीएम ने एक्जिक्यूटिव मजिस्ट्रेट की नियुक्ति की और बयान दर्ज किया गया, जहाँ महिला ने पति पर जलाने का आरोप लगाया.''

पुलिस ने बताया कि ख़ुशबू ने जानकारी दी कि उनका पति शादी के गहने की मांग कर रहा था जिसके बाद उनका झगड़ा हुआ.

इसके बाद उनके पति ने थिनर डाल कर जलाने की कोशिश की. जब लोग इकठ्ठा हुए तो पति ने आग बुझाने की कोशिश की जिसमें वो भी थोड़ा जल गया. वहीं परिवार ने दहेज मांगने का भी आरोप लगाया है लेकिन लड़की ने इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा है.

दोनों का इलाज अस्पताल में चल रहा है. ख़ुशबू की हालत स्थिर है.

पुलिस का कहना है कि अस्पताल से डिस्चार्ज के बाद वीर प्रताप की गिरफ़्तारी की जाएगी.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार साल 2012 में एक लाख पर क़रीब 20 महिलाएँ पति की ओर से की गई क्रूरता का शिकार हुईं.

नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे-5 के अनुसार हर तीन में से एक महिला शारीरिक, यौन या भावनात्मक हिंसा का अनुभव करती है.

ये सर्वे 15-49 साल की महिलाओं में किया गया था.

वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन के आँकड़ों की मानें, तो दक्षिण एशिया में भारत चौथा ऐसा देश है, जहाँ महिलाएँ पतियों की हिंसा का अनुभव करती हैं.

ऐसे में भारतीय दंड संहिता में क्या प्रावधान किए गए हैं?

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क्या कहता है क़ानून?

एक महिला के साथ घर के अंदर होने वाली किसी भी प्रकार की हिंसा से सुरक्षा के लिए घरेलू हिंसा से महिला सरंक्षण अधिनियम, 2005 लाया गया.

इस क़ानून के अनुसार ये महिला पत्नी, बहन, बेटी, माँ हो सकती है. लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाली महिला को भी ये अधिकार दिए गए हैं.

ऐसी किसी भी महिला के स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन, उसके शरीर के अंग या उसे किसी प्रकार की मानसिक क्षति नहीं पहुँचाई जा सकती है.

इस क़ानून में शारीरिक, मानसिक, मौखिक, भावनात्मक, यौन हिंसा को भी शामिल किया गया है.

साथ ही किसी महिला को आर्थिक रूप से भी परेशान नहीं किया जा सकता है.

आर्थिक रूप से परेशान करने का मतलब है कि महिला को घरेलू ख़र्च, स्त्रीधन आदि न देने के लिए परेशान नहीं किया जा सकता है.

एक शादीशुदा महिला को दहेज के लिए प्रताड़ित नहीं किया जा सकता है.

साथ ही महिला या उनसे संबंध रखने वाले लोगों को अपशब्दों के ज़रिए नहीं डराया जा सकता है.

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सेक्शन 498ए

इसके अलावा अगर पति या उसके परिवार के सदस्य महिला को दहेज के लिए प्रताड़ित करते हैं, तो भारतीय दंड संहिता की सेक्शन 498 ए के तहत इसे अपराध बताया गया है.

सेक्शन 498ए में शारीरिक या मानसिक तौर पर दी जाने वाली प्रताड़ना को भी शामिल किया गया है.

हालांकि मैरिटल रेप या शादी में पति द्वारा जबरन बनाए गए शारीरिक संबंध को अभी अपराध नहीं माना गया है, लेकिन इस सेक्शन के अंतर्गत जबरन बनाए गए यौन संबंध को क्रूरता माना गया है.

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दहेज निषेध अधिनियम, 1961

ये क़ानून दहेज पर पूरी तरह से रोक लगाता है.

अगर कोई दहेज देता, लेता या उसकी मांग या अप्रत्यक्ष रूप से मांग करता है, तो उसके लिए सज़ा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है.

ये अधिनियम एक तरह से 498ए का विस्तृत रूप है.

इसमें दहेज के ऐसे मामलों को भी शामिल किया गया था, जो 498ए के दायरे में नहीं आते हैं.

दोषी पाए जाने पर कम से कम छह महीने की सज़ा, जिसे बढ़ाकर दो साल किए जाने का प्रावधान है.

वहीं जुर्माने की रक़म 10 हज़ार रुपए तक हो सकती है.

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दक्षिण एशिया क्षेत्र में 15-49 उम्र की महिलाएं जिन्होंने पतियों की हिंसा का अनुभव किया. . .

लेकिन क़ानून की मदद कैसे ले सकती हैं महिलाएँ?

अगर कोई भी महिला इस प्रकार की हिंसा का सामना करती है, तो वो अपने इलाक़े के पुलिस थाने का रुख़ कर सकती है.

पुलिस थाने में घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराई जा सकती है.

अगर थाने में आपको कहा जाता है कि उनके थाने के अंतर्गत आपका इलाक़ा नहीं आता है, तो महिलाएँ उन्हें ज़ीरो एफ़आईआर दर्ज करने के लिए कह सकती हैं.

ज़ीरो एफ़आईआर किसी भी थाने में की जा सकती है और फिर वो उपयुक्त थाने में स्थानांतरित हो जाती है.

अगर आप पुरुष अधिकारी से बात करने में सहज महसूस नहीं कर रही हैं तो आप महिला अधिकारी की मांग कर सकती हैं.

पुलिस आपकी रिपोर्ट/एफ़आईआर दर्ज कर सकती है या ज़िले के सुरक्षा अधिकारी से मिलने में मदद कर सकती है.

इसके अलावा आप अपने इलाक़े की महिला कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकती हैं.

इस कोर्ट में आमतौर पर महिला जज होती हैं और यहाँ दहेज और घरेलू हिंसा के मामले आते हैं.

वहीं आप अपनी एफ़आईआर ऑनलाइन भी दर्ज करा सकती हैं या राष्ट्रीय महिला आयोग की वेबसाइट का भी सहारा ले सकती हैं.

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भारत और दुनिया में घरेलू हिंसा के मामले

  • तीन में से एक महिलादुनिया में शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करती है

  • भारत मेंतीन में से एक शादीशुदा महिला(15-49 उम्र) ने शारीरिक, यौन या भावनात्मक हिंसा का अनुभव किया है.

  • तीन प्रतिशत गर्भवती महिलाओं ने शारीरिक हिंसा का अनुभव किया है

स्रोत: यूएन, एनएफ़एचएस-5

शिकायत दर्ज कराने पर आगे की प्रक्रिया

शिकायत दर्ज करवाने के बाद कोर्ट आपके लिए एक प्रोटेक्शन ऑफ़िसर या सुरक्षा अधिकारी की नियुक्ति करेगा.

वैसे ये अधिकारी आपके घर आकर इस मामले की विस्तृत रिपोर्ट दर्ज करेगा.

इस रिपोर्ट को सुरक्षा अधिकारी कोर्ट में पेश करेगा.

अगर आप अपना केस लड़ने में खुद सक्षम हैं तो आप वो कर सकती हैं, नहीं तो कोर्ट आपके लिए वकील की नियुक्ति कर सकता है.

इसके बाद कोर्ट आपकी सुरक्षा के लिए आदेश दे सकता है.

अगर इस सुरक्षा आदेश की अवहेलना होती है तो व्यक्ति के ख़िलाफ़ एक साल की सज़ा का प्रावधान किया गया है.

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किस महिला पर लागू होगा क़ानून

इस क़ानून का सहारा हर धर्म और जाति से संबंधित महिला ले सकती हैं.

अगर शिकायत दर्ज कराने के बाद आपको घर से निकाले जाने का डर लगता है, तो आप कोर्ट से इस संबंध में ऐसा न करने के लिए अंतरिम आदेश की मांग कर सकती हैं.

वहीं अगर आपको लगता कि शिकायत के बाद आपको आर्थिक तंगी हो सकती है, तो इस सिलसिले में भी आप कोर्ट से जब तक कोर्ट का फैसला न आ जाए, गुज़ारा भत्ता देने के लिए मांग कर सकती हैं.

आपका अगर पति के साथ संयुक्त बैंक अकाउंट है या दोनों के नाम पर संपत्ति है और आपको ये डर है कि पति उसे बेच सकता है तो वो उसे ना बेचे, इसके लिए भी आप कोर्ट से मदद ले सकती हैं.

एक शादीशुदा ज़िंदगी में पति द्वारा पत्नी के साथ जबरन बनाए गए संबंध (मैरिटल रेप) को बलात्कार करार दिए जाने पर याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं.

लेकिन घरेलू हिंसा क़ानून के अंतर्गत एक महिला यौन उत्पीड़न की शिकायत कर सकती है.

अगर आप यौन उत्पीड़न की शिकायत करती हैं, तो अदालत ये आदेश दे सकती है कि आपके पति आपसे संपर्क न करें और जिस घर में आप रहती हैं वहाँ जाने से भी मना कर सकती है.

अगर पति इस आदेश का उल्लंघन करता है तो उसके लिए एक साल तक की सज़ा का प्रावधान भी किया गया है.

हालांकि कई मामलों में ये समझा जाता है कि अगर महिला घरेलू हिंसा का शिकायत कर रही है, तो तलाक़ लेना चाहती है.

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