मुसलमान माँ की संपत्ति पर हिंदू बेटियों के हक़ के बारे में क्या कहता है क़ानून?

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गुजरात में अहमदाबाद की एक अदालत ने मुसलमान माँ के रिटायरमेंट बेनिफ़िट में हिंदू बेटियों के दावे को ख़ारिज कर दिया है.

इस महिला की तीन बेटियों ने कोर्ट में दावा किया था कि पिता की मौत के बाद उनकी माँ को अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिली थी.

इसलिए उनकी माँ के रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले बेनिफ़िट में उनका भी अधिकार है.

इन लड़कियों के वकील बीपी गुप्ता अहमदाबाद से इस बारे में जानकारी देते हुए कहते हैं कि लड़कियों की तरफ़ से माँ के रिटायरमेंट बेनिफ़िट में दावा किया गया था.

उन्होंने आगे बताया, ''स्थानीय कोर्ट ने इस पर कहा कि क्योंकि आपकी माँ मुसलमान थीं और उनका बेटा भी मुसलमान है तो उसपर हक़ बेटे का ही है क्योंकि रिटायरमेंट के बाद की संपत्ति भी माँ की थी, तो वो बेटे को ही जाएगी.''

यहाँ ये बता दें कि इस महिला ने अपने सर्विस रिकॉर्ड में अपने बेटे को ही नॉमिनी बनाया था.

वकील बीपी गुप्ता का कहना था कि कोर्ट ने नॉमिनी के बारे में ज़रूर कहा लेकिन ये भी कहा कि बच्चे हिंदू और माँ मुसलमान हैं इसलिए इस महिला की वो बेटियाँ तो हैं, लेकिन क़ानूनी वारिस नहीं हैं.

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क्या है मामला?

इस मामले पर वकील बीपी गुप्ता ने बताया कि इस महिला के पति एक पब्लिक सेक्टर में काम करते थे.

इनकी दो बेटियाँ थीं और ये महिला गर्भवती थीं जब उनके पति की मौत हो गई.

इस महिला को अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिल गई.

लेकिन इसके बाद महिला ने घर छोड़ दिया और तीनों लड़कियों का ख़्याल दादा-दादी ने रखा.

वकील बताते हैं, ''बाद में इस महिला ने इस्लाम धर्म अपनाया और एक मुसलमान व्यक्ति से शादी कर ली.''

इस शादी से उन्हें एक बेटा हुआ.

इसके बाद साल 1990 में तीन बेटियों की तरफ़ से उन्हें त्यागने और मेंटनेंस या रखरखाव को लेकर दावा ठोका गया और मामला उन्होंने जीत लिया.

साल 2009 में इस महिला की मौत हो गई और उन्होंने सर्विस बुक में अपने बेटे को नॉमिनी बनाया था.

इसके बाद बेटियों की तरफ़ से उनकी मां के रिटायरमेंट बेनिफ़िट, प्रोविडेंट फ़ंड, ग्रेच्युटी, इंश्योरेंस और अन्य बेनिफ़िट को लेकर दावा किया गया और कहा गया कि वो उनकी बॉयोलॉजिकल बेटियाँ है और प्रथम श्रेणी उत्ताराधिकारी हैं.

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साथ ही तीनो बेटियों ने अपनी माँ के इस्लाम धर्म को अपनाने और बेटे को उत्तराधिकारी बनाने को भी चुनौती दी.

इस पर कोर्ट ने उनके दावे को ख़ारिज करते हुए महिला के धर्मांतरण, शादी के रजिस्ट्रेशन और सर्विस रिकॉर्ड में नॉमिनी बनाए जाने को लेकर दिए गए दस्तावेज़ों को सही बताया.

साथ ही कोर्ट का कहना था कि अगर मृतक मुसलमान है, तो उनका प्रथम श्रेणी उत्तराधिकारी ग़ैर-मुसलमान नहीं हो सकता.

कोर्ट में दिए गए फ़ैसले पर जानकारी देते हुए वकील बीपी गुप्ता कहते हैं, ''एक मृतक मुसलमान के उत्तराधिकारी मुसलमान ही हो सकते हैं. साथ ही इस मामले में क्योंकि मृतक महिला ने मुसलमान धर्म को अपनाया था और उनकी बेटियाँ हिंदू हैं. हालाँकि वादी मृतक के वारिस हैं लेकिन उनका विरासत में उनका कोई हक़ नहीं है.''

कोर्ट ने इस मामले में गुजरात हाई कोर्ट के नयना फ़िरोज़ख़ान पठान उर्फ़ नसीम फ़िरोज़ख़ान पठान केस का संदर्भ लिया, जिसमें कहा गया था कि सभी मुसलमानों पर मोहम्मदन क़ानून लागू होता है.

वहीं कोर्ट ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार भी एक हिंदू बेटी का मुसलमान माँ की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है.

भारत के जाने-माने संविधान विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का कहना है कि जहाँ भी धर्मानंतरण होगा, वहाँ रिश्ता ही ख़त्म माना जाता है.

वे उदाहरण देकर समझाते हैं, ''मान लीजिए यहाँ माँ अगर हिंदू होती और बेटियाँ मुसलमान हो जाती, तब भी बेटियों का संपत्ति पर अधिकार नहीं होता.''

मुस्लिम लॉ और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 संपत्ति में अधिकार पर क्या कहता है?

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हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में पिता की संपत्ति में बेटी को क़ानूनी अधिकार दिए गए हैं.

ये क़ानून हिंदू धर्म के अलावा सिख, जैन और बौद्ध धर्म पर लागू होता है.

किसी व्यक्ति की मौत के बाद उसकी संपत्ति किस तरह से विभाजित होगी, वो इस क़ानून में बताया गया है. वहीं इसके सेक्शन 14 में महिलाओं को ये अधिकार दिया गया है.

हालाँकि इससे पहले अगर किसी व्यक्ति ने अपनी वसीयत में लड़की या महिला को हिस्सा नहीं दिया होता था, तो ऐसे में उस लड़की या महिला को पैतृक संपत्ति में पुरुषों के मुक़ाबले कम अधिकार मिले थे.

इसके बाद हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 लाया गया और इसके सेक्शन 6 में संशोधन किया गया.

ये संशोधन लाकर संपत्ति में बेटी और पत्नी को बेटों को बराबर अधिकार दिया गया.

साथ ही ये भी कहा गया कि अगर पिता की मौत 2005 से पहले हुई हो, तब भी महिला को संपत्ति में अधिकार मिलेगा.

लेकिन अगर वारिस सिख, बौद्ध और जैन धर्म को छोड़कर कोई अन्य धर्म अपना लेता है, तो उसे भी संपत्ति में कोई अधिकार नहीं मिलेगा.

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लेकिन संपत्ति में क्या आता है?

संपत्ति में चल और अचल दोनों संपत्तियां आती है. इस संपत्ति में पैतृक संपत्ति और वो संपत्ति शामिल होती है, जो व्यक्ति ने ख़ुद ख़रीदी हो. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में सेक्शन 14 के तहत महिलाओं को अधिकार दिया गया.

लेकिन इसके लागू होने के लिए ये ज़रूरी है कि महिला का संपत्ति में या तो मालिकाना हक़ हो, वसीयत में नाम शामिल हो या फिर स्त्री धन के तौर पर शादी से पहले या बाद में मिली हो या ऐसी कोई संपत्ति हो, जो महिला ने ख़ुद अर्जित की हो.

अगर पिता की मृत्यु बिना वसीयत बनाए होती है, तो महिला को पैतृक संपत्ति में जो अधिकार है, वैसे ही उस व्यक्ति द्वारा अर्जित संपत्ति में भी अधिकार मिलेगा.

अगर किसी महिला की मौत बिना वसीयत बनाए हो जाती है तो ऐसे में विभाजन कैसे होगा?

क़ानून में प्रावधान किया गया है कि अगर महिला ने संपत्ति पिता द्वारा अर्जित की है, तो ऐसे में वो उसके बच्चों को दी जाएगी.

अगर इस महिला के अपने बच्चे नहीं है, तो ऐसे में संपत्ति महिला के पिता के अन्य उत्ताराधिकारी को मिल जाएगी और अगर ये संपत्ति पति के ज़रिए मिली है तो संपत्ति पति के उत्तराधिकारियों को मिल जाएगी. ऐसे में क़ानूनी विशेषज्ञ कहते हैं कि हर व्यक्ति को वसीयत बनानी चाहिए.

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मुस्लिम लॉ में वसीयत को लेकर क्या कहा गया है?

मुस्लिम लॉ के बारे में समझाते हुए फ़ैज़ान मुस्तफ़ा बताते हैं कि यहाँ वसीयत का बँटवारा दो अनुपात एक में होता है.

यानी बेटे का शेयर डबल होता है और बेटी का शेयर आधा दिया जाता है.

मान लीजिए कि किसी व्यक्ति के एक बेटा और एक बेटी है और संपत्ति के तीन हिस्से हुए हैं तो उसमें दो हिस्सा लड़के के नाम होगा और एक हिस्सा बेटी को मिलेगा.

वे बताते हैं कि इस्लाम में पैतृक संपत्ति नहीं मानी जाती है और इस्लाम ऐसा पहला धर्म है जिसमें बेटी को भी उत्तराधिकारी माना गया है.

इस्लाम में ये भी कहा गया है कि महिला को अपने पिता, पति और बेटे की संपत्ति में भी शेयर दिया जाता है.

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