24 हफ़्ते से पहले जन्मीं, 500 ग्राम से कम वज़न, शिवान्या और जियाना की कहानी

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मेरी बेटी जब पैदा हुई, तो वो हथेली से भी छोटी थी. मैंने जब अपनी बेटी को पहली बार देखा, तो उसकी आँखें खुली हुई थीं और इसी से मुझे ये उम्मीद बंधी कि वो ज़िंदा रहेगी. -उज्ज्वला, शिवान्या की माँ

डॉक्टरों ने कहा था कि जियाना ज़िंदा नहीं बच पाएगी, लेकिन वो चार साल की हो चुकी है और डॉक्टरों की सलाह के अनुसार मैं उसे एक सामान्य बच्चे की तरह ही पाल रही हूँ. दीनल,जियाना की माँ

ये कहानी ऐसी दो बच्चियों की है जिन्होंने दो अलग-अलग कोख से समय से पहले जन्म लिया और उनका ज़िंदा रहना करिश्मे से कम नहीं माना जा रहा है.

दरअसल पिछले साल मई महीने में मुंबई की रहने वाली उज्ज्वला पवार ने गर्भावस्था के 22वें हफ़्ते में शिवान्या को जन्म दिया.

डॉक्टर सचिन शाह ने मुंबई से बीबीसी से बातचीत में कहा कि उज्ज्वला पवार का बाइकोर्नेट यूटेरस था. उनके यूटरेस में बच्चा बढ़ नहीं पा रहा था जिसकी वजह से उन्हें प्रीटर्म लेबर यानी प्रसव पीड़ा शुरू हो गई.

उज्ज्वला को पहले से बेटा है और उसकी डिलिवरी में उन्हें कोई दिक़्क़त नहीं आई, लेकिन जब वे दूसरी बार गर्भवती हुईं यानी शिवान्या जब उनके पेट में आई तो उन्हें परेशानी होने लगी.

यूटेरस में बच्ची का पूरा विकास नहीं हो पा रहा था, इसलिए उज्ज्वला को नौ महीने पूरा करने से पहले प्रसव पीड़ा शुरू हो गई.

बाइकोर्नेट यूटेरस को साधारण शब्दों में समझा जाए तो यूटेरस दो कैविटी में बँट जाता है. ये दुर्लभ प्रकार की विसंगति होती है.

अगर किसी महिला का बाइकोर्नेट यूटेरस होता है, तो कई मामलों में महिला गर्भधारण के नौ महीने पूरा नहीं कर पाती. या तो उसका गर्भपात हो जाता है या ऐसी महिलाओं को समय से पहले प्रसव पीड़ा शुरू हो जाती है और डिलिवरी करवानी पड़ती है.

अगर किसी महिला को 28 हफ़्ते से पहले डिलिवरी होती है तो ऐसी स्थिति को प्रीमैच्योर या समय से पहले डिलिवरी कहा जाता है.

पूणे स्थित सूर्या अस्पताल के नियोनेटल एंड पीडिएट्रिक इन्टेंसिव केयर सर्विस से जुड़े डॉक्टर सचिन शाह बताते हैं कि उज्ज्वला को अस्पताल में भर्ती कराया गया और अल्ट्रासाउंड में ये पता चला था कि बच्चे का वज़न तक़रीबन 500 ग्राम होना चाहिए.

नियोनेटोलॉजिस्ट वो डॉक्टर होते हैं, जो नवजात की पैदाइश के बाद आने वाली दिक़्क़तों का इलाज करते हैं.

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उम्मीद की दो कहानियाँ

जब डिलीवरी हुई तो बच्ची का वज़न 400 ग्राम ही था. वो हथेली के आकार से भी छोटी थी और दोनों माता-पिता चाहते थे किसी भी तरह बच्ची को बचाया जाए.

शिवान्या की माँ उज्ज्वला कहती हैं, ''मैंने अपनी बेटी को देखा तो केवल उसका चेहरा दिखाई दिया और उसकी आँखें खुली हुई थीं और इसी ने मुझे उम्मीद दी कि ये ज़िंदा रहेगी. मैंने अपने दिल में एक भी नकारात्मक भाव नहीं आने दिया और जीवन के प्रति इसी सकारात्मकता ने हमारी मदद की."

पिता शशिकांत पवार कहते हैं, ''शिवान्या के जन्म के बाद जब मुझे उसके क़रीब जाने दिया गया, तो उसकी नन्हीं सी उंगली ने मुझे छुआ. मुझे जो एहसास हुआ, मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता और इसी ने मुझे ये जज़्बा दिया कि मेरी बेटी सही सलामत रहेगी.''

वहीं चार साल पहले गुजरात के सूरत में जियाना 22वें हफ़्ते में पैदा हुईं. पैदाइश के वक़्त जियाना का वज़न 492 ग्राम था.

जियाना साल 2018 में अक्टूबर महीने में पैदा हुई.

अहमदाबाद स्थित अर्पण न्यूबॉर्न केयर सेंटर के निदेशक और चीफ़ नियोनेटोलॉजिस्ट डॉक्टर आशीष मेहता बीबीसी से बातचीत में कहते हैं- जब दीनल का मामला मेरे पास आया, उस समय उनका सैक या वाटर बैग लीक कर रहा था.

वे जुड़वा बच्चों की माँ बनने वाली थीं और उसमें से एक का वाटर बैग लीक कर रहा था.

वे बताते हैं, ''दीनल 21वें हफ़्ते की गर्भवती थीं. ऐसे में जुड़वा बच्चों का बचना बहुत मुश्किल था. वहीं ऑब्स्टेट्रीशियन भी अपने हाथ खड़े कर चुकी थीं क्योंकि 21वें हफ़्ते में डिलिवरी करवा कर मेडिकल इतिहास में किसी बच्चे का ज़िंदा रहने का मामला सामने नहीं आया था.''

वे आगे बताते हैं- मैंने भी कई स्टडी की और ऐसी डिलीवरी के बाद बच्चे के ज़िंदा रहने की आशंका जताई.

दीनल अस्पताल में भर्ती हुईं और इस बीच उनका 22वाँ हफ़्ता पूरा हो गया. परिवार चाहता था कि दीनल बच्चे को जन्म दें.

हालाँकि डॉक्टरों ने बता दिया कि अगर 24वें हफ़्ते से पहले डिलीवरी होती है तो बच्चे में विकार होने की आशंका बढ़ जाती है.

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दीनल बताती हैं, ''हमने डॉक्टरों से कहा कि वो कैसे भी हमारे बच्चे को बचाएं. हालाँकि वो एक ही को बचा सके. ऐसी स्थिति में हिम्मत और संयम की बहुत ज़रूरत होती है.''

मुंबई और सूरत, इन दोनों मामलों में ही बच्चों का जन्म 24वें हफ़्ते से पहले हुआ.

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ऐसे बच्चों पर किन बातों का ख़तराहोता है

डॉक्टर सचिन शाह और आशीष मेहरा बताते हैं कि समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों के जीवित रहने की संभावना पाँच से दस प्रतिशत होती है.

  • ऐसे बच्चों के मस्तिष्क की सोनोग्राफी में अगर ब्लीडिंग नज़र आती है तो आगे जाकर अपंगता होने का ख़तरा बढ़ जाता है
  • बच्चे की पैदाइश के तीन-चार हफ़्ते में आकलन कर लिया जाता है कि बच्चे में क्या दिक़्क़तें पेश आ सकती हैं.
  • आँखें क्योंकि विकसित नहीं हुई होतीं तो आँखों की रोशनी जाने की आशंका रहती है.
  • बहरापन होने का भी ख़तरा रहता है.
  • ऐसे बच्चों में अंगों का पूरी तरह से विकास नहीं होता है, तो प्रतिरोधक क्षमता भी नहीं होती
  • सेप्सिस होने का ख़तरा
  • इन्फ़ेक्शन हो सकता है
  • किडनी फ़ेल होने का ख़तरा भी बना रहता है.

दोनों ही डॉक्टर बताते हैं कि 24वें हफ़्ते या समय से पहले जब भी डिलीवरी होती है तो बच्चा रोता नहीं है और वो ठंडा पड़ जाता है जो हाइपोथर्मिया की स्थिति बताई जाती है.

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इमेज कैप्शन, जियाना अब चार साल की हो चुकी हैं. जियाना अपनी मां के साथ

हाइपोथर्मिया की स्थिति तब होती है, जब वज़न के मुताबिक़ शरीर में चर्बी नहीं होती. ऐसे बच्चे वैसे ही कमज़ोर होते हैं क्योंकि उनका शरीर पूरी तरह से विकसित नहीं होता है.

ऐसे में बच्चे को इन्क्यूबेटर में रखा जाता है और तापमान ऐसे रखा जाता है ताकि बच्चे का शरीर गर्म बना रहे.

डॉक्टर आशीष मेहरा के अनुसार,''ऐसे बच्चों के अंग जैसे फेफड़े, किडनी, आंत, दिल का पूरा विकास नहीं हुआ होता है, तो उनके नाक पर मास्क लगा कर (सीपैप) फेफड़ों तक ऑक्सीजन पहुँचाया जाता है, क्योंकि वो ख़ुद साँस नहीं ले पाते हैं.''

वे आगे बताते हैं, ''बच्चा क्योंकि मुँह से दूध नहीं पी पाता है, तो बच्चे तक सारे पोषक तत्व मिल सकें उसके लिए नाभी में अंबिलिकल कैथेटर के ज़रिए प्रोटीन, फ़ैट्स कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और मिनरल उस तक पहुँचाए जाते हैं.''

''इसके साथ ही मुँह से पेट तक राइलस ट्यूब डालकर दूध पिलाया जाता है और देखा जाता है कि बच्चा कैसे रिऐक्ट कर रहा है, जैसे पेट फूल रहा है, उल्टी कर रहा है या नहीं- ये दोनों प्रक्रिया साथ चलती रहती है.''

डॉक्टर आशीष मेहरा के मुताबिक़, ''जब उन्हें बच्चों में विकास दिखने लगता है और डॉक्टर इस बात को लेकर संतुष्ट हो जाते हैं कि वो दूध पचा पा रहा है तो उसका अंबिलिकल कैथेटर हटा दिया जाता है.

इसके बाद बच्चे का वज़न बढ़ाने पर काम किया जाता है. ऐसी स्थिति में बच्चा को 11-12 हफ़्ते तक इन्क्यूबेटर में रखा जाता है.

34वें हफ़्ते में जाकर बच्चे में हो रहे विकास का आकलन करने के बाद ये देखा-परखा जाता है कि वो माँ का दूध ख़ुद ले पा रहा है या नहीं. अगर वो ऐसा करने में सक्षम हो जाता है तो उसे डिस्चार्ज कर दिया जाता है.

बच्चे का तीन, छह और आठ महीने पर नियमित चेकअप होता रहता है.

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इमेज कैप्शन, शिवान्या पवार अब धीरे-धीरे बढ़ रही है

कैसी हैं बच्चियाँ

शिवान्या अब लगभग चार महीने की हो गई है और जियाना ने हाल ही में अपना चौथा जन्मदिन मनाया है.

शिवान्या के पिता शशिकांत कहते हैं- वो हाथ-पाँव मार रही है, ख़ूब चिल्लाती है और मुस्कराती है और उनका परिवार बहुत ख़ुश है कि वो पल-बढ़ रही है.

दीनल कहती हैं- डॉक्टरों का कहना है कि मैं जियाना के बाद दूसरी बार माँ बनी और मैं नहीं बता सकती वो नौ महीने मैंने किस डर में निकाले हैं. हमें डॉक्टरों ने कहा है कि हम जियाना को सामान्य बच्चे की तरह ही पाले. हम बस वही कर रहे हैं. जियाना अब दीदी बन गई है और छोटी बहन का ख़्याल रखती है. मैं बस इतना कहना चाहूँगी कि हिम्मत नहीं हारनी चाहिए.

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